Raipur Police Commissoner: पुलिस कमिश्नर का नोटिफिकेशन पर ब्रेक! नवा रायपुर समेत ग्रामीण के कुछ और हिस्सा जुड़ेंगे...21 को कैबिनेट की बैठक में लगेगी मुहर

Raipur Police Commissioner: रायपुर पुलिस कमिश्नर का नोटिफिकेशन जारी होने से ऐन पहले रोक दिया गया। खबर है कि रायपुर पुलिस कमिश्नर के एरिया में नवा रायपुर ग्रामीण का कुछ हिस्सा जोड़ उसे और मजबूत बनाया जाएगा। 21 जनवरी को होने वाली मीटिंग में इस पर मुहर लग जाएगी। बता दें, NPG.NEWS के साप्ताहिक तरकश कॉलम में सबसे पहले लिखा गया था कि आधे-अधूरे पुलिस कमिश्नर से पोलिसिंग और डिरेल्ड होगी।

Update: 2026-01-19 16:19 GMT

Raipur Police Commissioner: रायपुर। रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम लागू करने का नोटिफिकेशन बीते शुक्रवार को ही जारी हो गया होता। मगर ऐन वक्त पर कुछ चकरी चली और नोटिफिकेशन जारी होने से पहले उसे रोक दिया गया। बताते हैं, शुक्रवार को सुबह लॉ डिपार्टमेंट ने नोटिफिकेशन के ड्राफ्ट को अनुमोदित कर दिया था। उसके बाद गृह विभाग से भी उसे हरी झंडी मिल गई। गृह विभाग से जैसे ही राजस्व विभाग भेजा गया ताकि उसे राजपत्र में प्रकाशित कर जारी कर दिया जाए, तभी उसे कुछ समय तक के लिए रोकने का फरमान आ गया। सूत्रों का कहना है कि गृह मंत्री चाहते हैं कि नोटिफिकेशन अभी रुककर जारी किया जाए। खबर है, सरकार भी पुलिस कमिश्नर का एरिया बढ़ाने पर तैयार हो गई है। 21 जनवरी को कैबिनेट की बैठक में इसे पारित किया जाएगा।

पिछले कैबिनेट में पुलिस कमिश्नर सिस्टम का ड्राफ्ट पारित किया गया था, उसमें रायपुर पुलिस कमिश्नर को सिटी पुलिस जैसा बना दिया गया था। मगर सरकार अब चाहती है कि पुलिस कमिश्नर का दायरा बढ़ाकर उसे पूरे जिले में शामिल किया जाए।

एनपीजी न्यूज के तरकश स्तंभ में पिछले महीने लिखा गया था कि आउटर के इलाको में सबसे अधिक अपराधिक घटनाएं होती हैं। नवा रायपुर में मंत्रालय, विधानसभा समेत एयरपोर्ट आता है। मगर उसे पुलिस कमिश्नरेट का हिस्सा की बजाए ग्रामीण जिला में शामिल किया गया था। सरकार में इस बात को लेकर भी विचार चल रहा कि पुलिस कमिश्नर सिस्टम को और मजबूत किया जाए। इसमें हो सकता है कि पुलिस कमिश्न को कुछ और अधिकार मिल जाए। इनमें शस्त्र और आबकारी लायसेंस भी हो सकता है।

ओएसडी की नियुक्ति क्यों?

गृह विभाग के नोटिफिकेशन के बाद आईजी स्तर के आईपीएस अधिकारी को विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी अपाइंट किया जाएगा। पुलिस कमिश्नरेट प्रारंभ होने से पहले ओएसडी की नियुक्ति इसलिए की जाती है, ताकि पुलिस कमिश्नर ऑफिस के साथ सेटअप का पूरा ब्यौरा तैयार कर सकें। ऑफिस में फर्नीचर से लेकर प्यून, स्टॉफ जैसी व्यवस्थाएं करनी होगी। 23 जनवरी को पुलिस कमिश्नरेट शुरूआत के मौके पर एक बड़ा जलसा आयोजित किया जाएगा। उसका भी दायित्व ओएसडी के उपर होगी। 22 जनवरी को ओएसडी को ही पुलिस कमिश्नर में कंटिन्यू करने का आदेश निकल जाएगा।

फर्स्ट पुलिस कमिश्नर की अटकलें

रायपुर के प्रथम पुलिस कमिश्नर के लिए आईजी पुलिस मुख्यालय अजय यादव, बद्रीनारायण मीणा, रायपुर आईजी अमरेश मिश्रा, बिलासपुर आईजी संजीव शुक्ला, राजनांदगांव आईजी अभिषेक शांडिल्य, सरगुजा आईजी दीपक झा के नामों की चर्चाएं पिछले महीने भर से पब्लिक डोमेन में है। इसी तरह पुलिस कमिश्नरेट के सेकेंड लेफ्टिनेंट के लिए कई डीआईजी के नाम गिनाए जा रहे हैं। इनमें अभी प्रमोट होकर डीआईजी बनने वाले कई एसएसपी के नाम भी शामिल हैं।

रामगोपाल फर्स्ट पुलिस कमिश्नर?

एनपीजी न्यूज के पास रायपुर के फर्स्ट पुलिस कमिश्नर को लेकर जो जानकारी है, उसके मुताबिक दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग, बिलासपुर आईजी संजीव शुक्ला, राजनांदगांव आईजी अभिषेक शांडिल्य और सरगुजा आईजी दीपक झा के नाम पर सरकार के भीतर मंथन हुआ है। रायपुर आईजी अमरेश मिश्रा रायपुर पुलिस कमिश्नरेट के लिए बेस्ट च्वाइस माने जा रहे थे। मगर उनके पास ईओडब्लू और एसीबी में कई अहम केसेज होने की वजह से सरकार उन्हें फिलहाल डिस्टर्ब नहीं करना चाह रही। ऐसे में, रामगोपाल गर्ग का पलड़ा काफी भारी हो गया है।

रामगोपाल का नाम क्यों?

पंजाब में पैदा हुए रामगोपाल गर्ग छत्तीसगढ़ कैडर के 2007 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। वे करीब सात साल सीबीआई में रहे हैं। इसमें से ज्यादातर वक्त चंडीगढ़ में सीबीआई एसपी रहे। रामगोपाल की छबि साफ-सुथरी है, साथ ही पोलिसिंग के नियम-कायदों की उन्हें खासी जानकारी है। सरकार के साथ पुलिस मुख्यालय के साथ उनकी ट्यनिंग अच्छी है। ट्यूनिंग मतलब सिस्टम उन पर भरोसा करता है। सूत्रों ने एनपीजी से बातचीत में तस्दीक की है कि पुलिस कमिश्नर की दौड़ में रामगोपाल सबसे आगे हैं। एक तरह से कहा जाए तो सत्ता के अंदरखाने में उनके नाम पर सहमति बन चुकी है।

लाल उमेद को ज्वाइंट कमिश्नर क्यों?

ऐसी चर्चाएं हैं कि रायपुर के आखिरी एसएसपी लाल उमेद सिंह रायपुर कमिश्नरेट में ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर बनाए जाएंगे। वे पिछले साल डीआईजी पदोन्नत हुए थे। हालांकि, उनका कार्यक्षेत्र कम हो जाएगा। पूरे जिले के कप्तान रहने के बाद उन्हें सिर्फ सिटी एरिया का दायित्व होगा। हालांकि, लाल उमेद सिंह को ट्रांसपोर्ट में जाने की अटकले चल रही थीं। मगर अब सुनने में आ रहा, वे पुलिस कमिश्नरेट में अपाइंट होंगे। लाल उमेद सिंह को ज्वाइंट पुलिस कमिश्नरेट बनाने का उद्ेदश्य यह है कि रायपुर के बारे में उन्हें काफी तजुर्बा है। रायपुर में वे एडिशनल एसपी रह चुके हैं और अब एसएसपी हैं। रामगोपाल गर्ग कभी रायपुर में पोस्ट नहीं रहे, इसलिए उन्हें साथ लाल उमेद सिंह को पोस्ट किया जा रहा है।

रामगोपाल का उतार-चढ़ाव वाला कैरियर

रामगोपाल गर्ग सीबीआई में रहने के दौरान कई बड़े खुलासे किए मगर छत्तीसगढ़ में उनकी पोस्टिंग उतार-चढ़ाव वाली रही। एसपी के तौर पर गरियाबंद उनका पहला जिला रहा। कोरिया में छह महीने और बालोद में तीन महीने एसपी रहे। पिछली सरकार में उन्हें सरगुजा पुलिस रेंज का प्रभारी आईजी बनाकर भेजा गया। फिर डिमोशन करके रायगढ़ के नए डीआईजी रेंज में भेज दिया गया। इसके बाद विधानसभा चुनाव के दौरान दुर्ग के एसएसपी बनाए गए। दुर्ग में वे डीआईजी रहते कप्तान रहे और अब वहीं पर आईजी हैं।

गुरमीत राम रहीम को भेजा जेल

सीबीआई में पोस्टिंग के दौरान उन्हें डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम प्रकरण की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। बताते हैं, रामगोपाल गर्ग ने ऐसे दबाकर जांच कराई कि राम रहीम को इस केस में सजा हो गई।

नाम का पुलिस कमिश्नर

पता चला है, एक जनवरी से रायपुर में पुलिस कमिश्नर सिस्टम प्रारंभ हो जाएगा। मगर इसके साथ यह भी जानकारी मिली है कि सोशल मीडिया और मीडिया में जो बातें चल रही हैं, उससे उलट सिर्फ नाम के लिए पुलिस कमिश्नर होगा। उसे प्रतिबंधात्मक धारा याने 151 के अलावा और कोई अधिकार देने के पक्ष में सिस्टम नहीं है।

ओड़िसा सबसे बेस्ट

देश में चूकि ओड़िसा में पुलिस कमिश्नर सिस्टम ताजा लागू हुआ है, इसलिए उसका सिस्टम भी काफी तगड़ा है। ओड़िसा ने एक्ट बनाकर उसे क्रियान्वित किया है। लेकिन, छत्तीसगढ़ में एक वर्ग मध्यप्रदेश से ज्यादा अधिकार पुलिस कमिश्नर को देना नहीं चाहता। जाहिर है, एमपी में आईएएस लॉबी के तगड़े विरोध के चलते दंतविहीन पुलिस कमिश्नर सिस्टम बनाया गया, जिसका प्रदेश को कोई लाभ नहीं मिल रहा। वहां के मुख्यमंत्री मोहन यादव अब ओड़िसा की तत्कालीन नवीन पटनायक सरकार द्वारा बनाए गए सिस्टम को फॉलो करने पर मंत्रणा कर रहे हैं।

अंग्रेजी शासन काल से पुलिस कमिश्नर

पुलिस कमिश्नर सिस्टम अंग्रेजों के समय से चला आ रहा है। आजादी के पहले कोलकाता, चेन्नई और मुंबई जैसे देश के तीन महानगरों में लॉ एंड आर्डर को कंट्रोल करने के लिए अंग्रेजों ने वहां पुलिस कमिश्नर सिस्टम प्रभावशील कर रखा था। आजादी के बाद देश को यह वीरासत में मिली। चूकि बड़े महानगरों में अपराध बड़े स्तर पर होते हैं, इसलिए पुलिस को पावर देना जरूरी समझा गया। लिहाजा, अंग्रेजों की व्यवस्था आजाद भारत में भी बड़े शहरों में लागू रही। बल्कि पुलिस अधिनियम 1861 के तहत लागू पुलिस कमिश्नर सिस्टम को और राज्यों में भी प्रभावशील किया गया।

कमिश्नर को दंडाधिकारी पावर

वर्तमान सिस्टम में राज्य पुलिस के पास कोई अधिकार नहीं होते। उसे छोटी-छोटी कार्रवाइयों के लिए कलेक्टर, एसडीएम और तहसीलदार, नायब तहसीलदारों का मुंह ताकना पड़ता है। दरअसल, भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 के धारा 4 में जिले के कलेक्टरों को जिला दंडाधिकारी का अधिकार दिया गया है। इसके जरिये पुलिस उसके नियंत्रण में होती है। बिना डीएम के आदेश के पुलिस कुछ नहीं कर सकती। सिवाए एफआईआर करने के। इसके अलावा पुलिस अधिनियम 1861 में कलेक्टरों को सीआरपीसी के तहत कई अधिकार दिए गए हैं। पुलिस को अगर लाठी चार्ज करना होगा तो बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के वह नहीं कर सकती। कोई जुलूस, धरना की इजाजत भी कलेक्टर देते हैं। प्रतिबंधात्मक धाराओं में जमानत देने का अधिकार भी जिला मजिस्ट्रेट में समाहित होता है। कलेक्टर के नीचे एडीएम, एसडीएम या तहसीलदार इन धाराओं में जमानत देते हैं।

त्काल फैसला लेने का अधिकार

महानगरों या बड़े शहरों में अपराध भी उच्च स्तर का होता है। उसके लिए पुलिस के पास न बड़ी टीम चाहिए बल्कि अपराधियों से निबटने के लिए अधिकार की भी जरूरत पड़ती है। धरना, प्रदर्शन के दौरान कई बार भीड़े उत्तेजित या हिंसक हो जाती है। पुलिस के पास कोई अधिकार होते नहीं, इसलिए उसे कलेक्टर से कार्रवाई से पहले इजाजत मांगनी पड़ती है। पुलिस कमिश्नर लागू हो जाने के बाद एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के अधिकार पुलिस कमिश्नर को मिल जाएंगे। इससे फायदा यह होगा कि पुलिस विषम परिस्थितियों में तत्काल फैसला ले सकती है। हालांकि, इससे पुलिस की जवाबदेही भी बढ़ जाती है।

शास्त्र और बार लायसेंस

पुलिस कमिश्नर सिस्टम में पुलिस को धरना, प्रदर्शन की अनुमति देने के साथ ही शस्त्र और बार का लायसेंस देने का अधिकार भी मिल जाता है। अभी ये अधिकार कलेक्टर के पास होते हैं। कलेक्टर ही एसपी की रिपोर्ट पर शस्त्र लायसेंस की अनुशंसा करता है। बार का लायसेंस भी कलेक्टर जारी करता है।

मगर छत्तीसगढ़ में नहीं

पुलिस कमिश्नर सिस्टम में उक्त सभी अधिकारी पुलिस को होते हैं मगर छत्तीसगढ़ में जो सिस्टम लागू होने जा रहा, वो सिर्फ रस्मी होगा। याने पुलिस कमिश्नर बनकर भी उसे एसपी से खास ज्यादा कोई अधिकार नहीं होगा। वो न तो बार का लायसेंस देखेगा और न ही शास्त्र लायसेंस। उसके पास जिला बदर के अधिकार भी नहीं होंगे।

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