Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: बयाना राशि की जब्ती है अनुचित! याचिकाकर्ता को तीन करोड़ वापस लौटाने दिया आदेश

Supreme Court News: खरीदार और विक्रेता के बीच विवाद की स्थिति का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने कहा, जब किसी अनुबंध के निष्पादन में खरीदार और विक्रेता, दोनों ही पक्ष दोषी हों, तो खरीदार द्वारा जमा की गई बयाना राशि की ज़ब्ती का आदेश देना उचित नहीं होगा।

Update: 2026-01-07 05:33 GMT

 Supreme Court News: दिल्ली। खरीदार और विक्रेता के बीच विवाद की स्थिति का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने कहा, जब किसी अनुबंध के निष्पादन में खरीदार और विक्रेता, दोनों ही पक्ष दोषी हों, तो खरीदार द्वारा जमा की गई बयाना राशि की ज़ब्ती का आदेश देना उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है,प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर खरीदार को 3 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान करना होगा। बता दें कि यह विवाद बीते 10 साल से चला आ रहा था।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की डिवीजन बेंच ने उस खरीदार की अपील पर निर्णय सुनाया, जिसने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें ट्रायल कोर्ट ने पारित विशिष्ट निष्पादन के डिक्री को रद्द करते हुए बयाना राशि की ज़ब्ती की अनुमति दी थी।

यह विवाद 22 जनवरी 2008 के एक समझौते से जुड़ा था, जिसके तहत अशोक विहार, दिल्ली स्थित 300 वर्ग गज संपत्ति 6.11 करोड़ में बेचने का अनुबंध हुआ था। खरीदार ने 60 लाख रुपये बयाना के रूप में और बाद में 30 लाख रुपये अतिरिक्त भुगतान किया था। ट्रायल कोर्ट ने फरवरी 2021 में विशिष्ट निष्पादन का डिक्री पारित किया था। हाई कोर्ट ने सितंबर 2025 में फैसला पलटते हुए कहा कि खरीदार शेष 5.21 करोड़ चुकाने की वित्तीय क्षमता साबित नहीं कर सका, और बयाना राशि ज़ब्त करने की अनुमति दे दी, जबकि अतिरिक्त 30 लाख रुपये ब्याज सहित लौटाने का निर्देश दिया।

आंशिक रूप से अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस नाथ द्वारा लिखित निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने readiness and willingness के संबंध में हाई कोर्ट के निष्कर्ष को बरकरार रखा, लेकिन बयाना राशि ज़ब्त करने के निर्देश से असहमति जताई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले ने कहा कि इस मामले में दोनों पक्ष दोषी थे। खरीदार अपनी वित्तीय तत्परता साबित नहीं कर सका, वहीं विक्रेता संपत्ति के म्यूटेशन और लीज़ होल्ड से फ्री होल्ड में परिवर्तन संबंधी संविदात्मक दायित्व पूरा नहीं कर पाया है। ऐसे में न्यायसंगत समाधान यही होगा जो किसी एक पक्ष को अनुचित लाभ न दे।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, न्याय और इक्विटी का सिद्धांत यह मांग करता है कि जहां दोनों पक्ष दोषी हों, वहां पक्षकारों को यथासंभव उनकी मूल स्थिति में लौटाया जाए और किसी को भी अनुचित समृद्धि का लाभ न मिले। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि “पूर्ण न्याय” करने और पक्षकारों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर खरीदार को 3 करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि का भुगतान करना होगा।

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