ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम का मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, अधिनियम को चुनौती देते हुए दो ट्रांसजेंडर ने दायर की याचिक, कहा- खुद की पहचान को मिटाना या हटाना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन

Supreme Court News: ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। दो ट्रांसजेंडरों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधन को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में कहा है, खुद की पहचान को हटाना या फिर मिटाना संविधान के अनुच्छेद 21 में दी गई व्यवस्थाओं का सीधेतौर पर उल्लंघन है।

Update: 2026-04-05 03:38 GMT

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दिल्ली। ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। दो ट्रांसजेंडरों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर केंद्र सरकार द्वारा किए गए संशोधन को चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में कहा है, खुद की पहचान को हटाना या फिर मिटाना संविधान के अनुच्छेद 21 में दी गई व्यवस्थाओं का सीधेतौर पर उल्लंघन है।

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत, संशोधन अधिनियम को चुनौती देते हुए दो ट्रांसजेंडर महिलाओं लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और ज़ैनब जावेद पटेल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। एक याचिकाकर्ता किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर, भरतनाट्यम नृत्यांगना, लेखिका, सोशल एक्टिविस्ट और 'अस्तित्व ट्रस्ट' की संस्थापक हैं। दूसरी याचिकाकर्ता KPMG इंडिया में निदेशक (समावेशन और विविधता) और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय परिषद (पश्चिमी क्षेत्र) की सदस्य हैं।

ट्रांसजेंडर संशोधन अधिनियम जिसे 30 मार्च, 2026 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली थी,इस पर आपत्ति दर्ज कराते हुए याचिका दायर की गइ्र है। याचिका में संवैधानिक व्यवस्थाओं का हवाला देते हुए कहा है, संशोधन से संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को अपूरणीय संवैधानिक क्षति पहुंचेगा।

याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में कहा है, इस तरह के संशोधन से जेंडर की स्व-पहचान के उस सिद्धांत को खत्म करते हैं, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक 'राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण NALSA बनाम भारत संघ' के फैसले में एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी। याचिका में कहा है संसद ने अपनी विधायी शक्ति से उस वैधानिक अधिकार को निरस्त किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार माना था।

इसलिए याचिकाकर्ताओं ने किया विरोध

याचिका में विशेष रूप से 2019 अधिनियम की धारा 2(k) के तहत "ट्रांसजेंडर व्यक्ति" की परिभाषा में किए गए बदलाव को चुनौती दी है। इसमें कहा गया है, जहां पूर्व परिभाषा में लैंगिक पहचान को व्यक्ति के व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित माना गया, वहीं संशोधित प्रावधान इस ढांचे को सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और मेडिकल रूप से सत्यापित जैविक स्थितियों की सूची से बदल देता है। याचिका में तर्क दिया गया कि इस बदलाव से स्व-पहचान का आधार समाप्त हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्तियों को कानूनी मान्यता से वंचित किया जा सकता है, जो स्वयं को ट्रांसजेंडर मानते हैं लेकिन निर्दिष्ट श्रेणियों में नहीं आते हैं।

इस पर भी जताई आपत्ति

0 संशोधन में यह भी शर्त रखी गई है, जिला मजिस्ट्रेट को किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की पहचान का प्रमाण पत्र जारी करने के लिए चिकित्सा बोर्ड की सिफारिश की जांच करना अनिवार्य है। याचिका में कहा गया कि यह उन मेडिकल प्रमाणन आवश्यकताओं को पुनः लागू करता है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने NALSA फैसले में निजता और गरिमा के अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था।

0 याचिका उस संशोधन को भी चुनौती देती है, जिसके तहत जेंडर चेंज सर्जरी कराने वाले व्यक्तियों के लिए संशोधित लिंग प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करना अनिवार्य है। याचिका में तर्क दिया गया कि एक अनुमेय प्रावधान को अनिवार्य दायित्व में बदलना व्यक्तिगत स्वायत्तता में हस्तक्षेप करता है। याचिका में मेडिकल इंस्टिट्यूट पर ऐसी सर्जरी कराने वाले व्यक्तियों का विवरण सरकारी अधिकारियों को उपलब्ध कराने की अनिवार्यता का भी विरोध किया गया। याचिका में कहा गया कि इससे चिकित्सा निगरानी की एक प्रणाली बनती है, जो मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त निजता और मेडिकल गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन करती है।

0 संशोधन अधिनियम में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ यौन शोषण जैसे अपराधों के लिए अधिकतम सज़ा अपेक्षाकृत कम रखी गई है।

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