पुलिस भर्ती, सुप्रीम फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सरकारी नौकरी में दया या सहानुभूति के लिए कोई जगह नहीं होती
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने एक युवक की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें सर्दी, खांसी व बुखार के कारण पुलिस भर्ती के लिए आखिरी टेस्ट फिजिकल दोबारा कराने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है, सरकारी नौकरी में दया व सहानुभूति जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है। अवसर मिलता है तो उसे हर हाल में भुनाने की कोशिश होनी चाहिए।
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दिल्ली। 6 अप्रैल 2026| सुप्रीम कोर्ट ने एक युवक की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें सर्दी, खांसी व बुखार के कारण पुलिस भर्ती के लिए आखिरी टेस्ट फिजिकल दोबारा कराने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है, सरकारी नौकरी में दया व सहानुभूति जैसे शब्दों के लिए कोई जगह नहीं है। अवसर मिलता है तो उसे हर हाल में भुनाने की कोशिश होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, पुलिस भर्ती प्रक्रिया में तय फिजिकल टेस्ट में शामिल न हो पाने वाला उम्मीदवार सिर्फ इसलिए टेस्ट को दोबारा कराने का अधिकार नहीं मांग सकता, टेस्ट को स्थगित करने के लिए उसके आवेदन का जवाब नहीं दिया गया। कोर्ट ने साफ कहा है, सरकारी नौकरी के मामलों में दया और अपनी मर्ज़ी से फैसले लेने की गुंजाइश बहुत कम होती है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें ट्रिब्यूनल के उस फैसले को सही ठहराया था, जिसमें दिल्ली पुलिस कांस्टेबल भर्ती के लिए फिजिकल एंड्योरेंस और मेज़रमेंट टेस्ट (PE&MT) में शामिल होने के लिए उम्मीदवार को मौका देने कहा गया था।
पढ़िए क्या है मामला
उत्तम कुमार ने दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भर्ती प्रक्रिया का पहला चरण पास कर लिया था। 14 जनवरी, 2024 को आयोजित PE&MT के लिए उपस्थित होना था, बीमार होने की वजह से वह टेस्ट में शामिल नहीं हुआ। बाद में उसने दावा किया कि उसने टेस्ट को दोबारा कराने के लिए तीन अर्जियां दी थीं। ट्रिब्यूनल ने पुलिस विभाग के अफसरों को दोबारा परीक्षा को निर्देश दिया था, इसके बाद भी परीक्षा का आयोजन नहीं किया गया।
पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दी थी चुनौती
ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। दिल्ली पुलिस की अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल की याचिका को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, सरकारी नौकरी के मामलों में, जहां लाखों उम्मीदवार प्रतिस्पर्धा में शामिल होते हैं, जब भी मौका मिले उसे तुरंत भुना लेना चाहिए। आमतौर पर दूसरा मौका मिलने की कोई गुंजाइश नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि भर्ती के विज्ञापन में साफ तौर पर बताया गया कि PE&MT का शेड्यूल अंतिम है और किसी भी हाल में इसे बदला नहीं जा सकता। कोर्ट ने यह भी पाया कि भर्ती प्रक्रिया के लिए लगभग एक लाख उम्मीदवारों ने रजिस्ट्रेशन कराया और उम्मीदवार अकेला ऐसा व्यक्ति था, जिसने टेस्ट को दोबारा कराने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवार के इस दावे को संदिग्ध पाया, उसकी अर्जियों को नज़रअंदाज़ किया गया। इस बात का कोई सबूत नहीं था कि अर्जियां मिली थीं। कोर्ट ने कहा, सर्दी, खांसी और बुखार जैसी बीमारियों से पीड़ित होने के बावजूद, उम्मीदवार कम से कम टेस्ट वाली जगह पर जाकर अधिकारियों को अपनी असमर्थता के बारे में बता सकता था और टेस्ट को दोबारा कराने का अनुरोध कर सकता था; कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसा न करना उसकी ओर से पहल और गंभीरता की कमी को दर्शाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी उत्तम कुमार के इस तर्क को खारिज कर दिया, आरक्षित श्रेणी से संबंधित होने के नाते वह सहानुभूति के आधार पर एक और मौका पाने का हकदार है। कोर्ट ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि कोई पिछड़े समुदाय से आता है, यह फैसला पलटने का निर्णायक कारक नहीं हो सकता। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यदि सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है, तो सरकारी नौकरी से जुड़े मामलों में कृपा, दान या सहानुभूति को दूर ही रखना चाहिए।