Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने कहा: केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी अंडरट्रायल को हिरासत में रखना उचित नहीं....

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है, बिना मुकदमे की शुरुआत या उसकी सार्थक प्रगति के, एक आरोपी को लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रखना, पूर्व-विचारण बंदी को दंड का रूप दे देता है। हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है।

Update: 2026-01-07 13:42 GMT

Supreme Court News: दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने साफ कहा है, बिना मुकदमे की शुरुआत या उसकी सार्थक प्रगति के, एक आरोपी को लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रखना, पूर्व-विचारण बंदी को दंड का रूप दे देता है। हाई कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर रिहाई के दौरान ट्रायल कोर्ट को शर्त तय करने की छूट दी है। शीर्ष अदालत ने अमटेक ऑटो के पूर्व प्रवर्तक अरविंद धाम को मनी-लॉन्ड्रिंग PMLA मामले में जमानत दे दी है।

सुप्रीम कोर्ट ने जावेद गुलाम नबी शेख बनाम महाराष्ट्र राज्य के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि यदि राज्य, जांच एजेंसी या अदालत स्वयं आरोपी के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई के मूल अधिकार की रक्षा करने में सक्षम नहीं है, तो केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर जमानत का विरोध नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को रिहा करने का आदेश दिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने अपराध की गंभीरता का हवाला देते हुए जमानत देने से इंकार कर दिया था। याचिकाकर्ता धाम 9 जुलाई 2024 से हिरासत में थे। अदालत ने नोट किया कि अभियोजन शिकायतें दायर हो चुकी हैं, परंतु अभी संज्ञान नहीं लिया गया है और मामला दस्तावेजों की जांच के चरण में ही है। मामले में 210 गवाह सूचीबद्ध हैं, और निकट भविष्य में ट्रायल शुरू होने की संभावना भी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, आर्थिक अपराधों को एक समान श्रेणी मानकर जमानत से इंकार नहीं किया जा सकता। पीएमएलए के तहत अधिकतम 7 वर्ष की सजा है, ऐसे में संवैधानिक अधिकारों के विपरीत अनिश्चितकालीन पूर्व-विचारण हिरासत स्वीकार्य नहीं हो सकती। डिवीजन बेंच ने कहा कि जब अधिकांश साक्ष्य दस्तावेजी स्वरूप में हों और पहले से ही अभियोजन के पास उपलब्ध हो, तो लंबी न्यायिक हिरासत जमानत के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कारक बन जाती है।

विलंब के लिए ED ज़िम्मेदार

सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पाया कि कार्यवाही में हुई देरी प्रवर्तन निदेशालय के कारण हुई। सितंबर 2024 में स्पेशल कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद ED ने स्पेशल कोर्ट के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी, इसके चलते पूरे 8 महीने तक कार्यवाही स्थगित रही। मई 2025 में याचिका वापस ले ली गई, पर तब तक ट्रायल ठप हो चुका था। कोर्ट ने यह भी माना कि गवाहों को प्रभावित करने या अपराध की आय छुपाने का आरोप रिकॉर्ड पर किसी विश्वसनीय सामग्री से समर्थित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा, यदि न्याय व्यवस्था समयबद्ध ट्रायल सुनिश्चित नहीं कर पा रही है, तो केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी अंडरट्रायल को हिरासत में रखना उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता धाम को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने पासपोर्ट सरेंडर करने का आदेश भी दिया है।

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