मातृत्व अवकाश को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला: कहा- गोद लेने वाली मां 12 सप्ताह की मातृत्व अवकाश की हैं हकदार, चाहे...

Supreme Court News: एक जनहित याचिका की सुनवाई के बाद गोद लिए मां के मातृत्व अवकाश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने साफ कहा है, गोद लेने वाली मां 12 हफ़्ते की मातृत्व छुट्टी की हकदार होनी चाहिए, चाहे गोद लिए गए बच्चे की उम्र कुछ भी हो।

Update: 2026-03-19 09:19 GMT

इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News

दिल्ली 19 मार्च 2026,  एक जनहित याचिका की सुनवाई के बाद गोद लिए मां के मातृत्व अवकाश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने साफ कहा है, गोद लेने वाली मां 12 हफ़्ते की मातृत्व छुट्टी की हकदार होनी चाहिए, चाहे गोद लिए गए बच्चे की उम्र कुछ भी हो। सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4), को असंवैधानिक करार दिया है। डिवीजन बेंच ने कहा, तीन महीने से ज़्यादा उम्र के बच्चों को गोद लेने वाली माताओं को मातृत्व लाभ से वंचित करना असंवैधानिक है।

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4), में प्रावधान है, किसी गोद लेने वाली मां को मातृत्व लाभ तभी देती है, जब गोद लिए गए बच्चे की उम्र 3 महीने से कम हो। पीआईएल की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है, कोई भी महिला जो कानूनतौर पर किसी बच्चे को गोद लेती है, या कोई कमीशनिंग मां, उस तारीख से 12 हफ़्ते की अवधि के लिए मातृत्व लाभ की हकदार होगी, जिस तारीख को बच्चा गोद लेने वाली मां या कमीशनिंग मां को सौंपा जाता है।

जनहित याचिका की सुनवाई जस्टिस पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, गोद लेने वाली माताएं बच्चों की उम्र की परवाह किए बिना मातृत्व अवकाश की हकदार हैं। कोर्ट ने कहा, सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 60(4) द्वारा किया गया भेदभाव, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं रखता है। गोद लिए गए बच्चे के लिए मां की देखभाल की ज़रूरत में कोई बदलाव नहीं आता है। उम्र के आधार पर किया गया यह भेदभाव कोई तार्किक वर्गीकरण नहीं है, क्योंकि 3 महीने से ज़्यादा उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिला की मां के तौर पर ज़िम्मेदारियां, 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिला की ज़िम्मेदारियों के समान ही होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा, उम्र की यह सीमा इस प्रावधान को बेमानी और व्यावहारिक उपयोग से रहित बना देती है। कोर्ट ने इस प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करने वाला करार दिया। अपने फैसले में कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी आग्रह किया कि वह पिता को मिलने वाली छुट्टी को एक सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने वाला कानून लाए। ऐसी छुट्टी की अवधि इस तरह से तय की जानी चाहिए जो माता-पिता दोनों की ज़रूरतों के अनुरूप हो।

पढ़िए क्या है मामला

यह याचिका 2021 में दायर की गई, जिसमें याचिकाकर्ता ने मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 5(4) को चुनौती दी थी। इस धारा में मातृत्व लाभ अधिनियम, 2017 द्वारा संशोधन किया गया, जिसके तहत गोद लेने वाली मां को 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश केवल तभी दिया जाता है, जब गोद लिया गया बच्चा तीन महीने से कम उम्र का हो। 12 नवंबर, 2024 को कोर्ट ने एक गोद लेने वाली मां द्वारा दायर जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।

याचिकाकर्ता ने कहा, मौजूदा प्रावधान मनमाना है और अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन करता है, यह उन महिलाओं के लिए कानूनी बाधाएं खड़ी करता है, जो शिशुओं को गोद लेना चाहती हैं, विशेष रूप से केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण CARA के नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रियात्मक समय-सीमाओं को देखते हुए।

नियमों का दिया हवाला

याचिका में बताया, छोड़े गए या अनाथ बच्चों के मामलों में बाल कल्याण समिति को बच्चे को गोद लेने के लिए कानूनी रूप से मुक्त घोषित करने में दो से चार महीने लग सकते हैं, जबकि जैविक माता-पिता द्वारा सौंपे गए बच्चों के मामले में 60 दिनों की पुनर्विचार अवधि लागू होती है। याचिकाकर्ता के वकील ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गोद लेने की प्रक्रिया किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 द्वारा नियंत्रित होती है। साथ ही तर्क दिया कि जो गोद लेने वाली माताएं तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चों को गोद लेती हैं, उन्हें मातृत्व लाभों से पूरी तरह वंचित कर दिया जाता है।

मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने तर्क दिया, जैविक मां को 18 सप्ताह का लंबा अवकाश इसलिए दिया जाता है, क्योंकि प्रसव के बाद उन्हें शारीरिक रूप से ठीक होने की आवश्यकता होती है। केंद्र के तर्क को सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने कहा, उसके सामने मुख्य मुद्दा अवकाश की अवधि नहीं, बल्कि गोद लिए गए बच्चे की उम्र के आधार पर लाभ में की गई कटौती का था। बता दें, डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के नियमों को असंवैधानिक करार देते हुए मातृत्व अवकाश को लेकर अपने आदेश में कहा है, गोद लेने वाली मां 12 हफ़्ते की मातृत्व अवकाश की हकदार होनी चाहिए, चाहे गोद लिए गए बच्चे की उम्र कुछ भी हो।

Tags:    

Similar News