पंचायत कोई अदालत नहीं है: शादी का वादा, इस अपराध का समझौता नहीं हो सकता, पढ़िए हाई कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है
High Court News: दुष्कर्म के एक मामले में हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला आया है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, पंचायत कोई अदालत नहीं है, ना ही सरंपच को मजिस्ट्रेट....
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कटक।09 मार्च 2026| दुष्कर्म के एक मामले में हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला आया है। ओड़िशा हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, पंचायत कोई अदालत नहीं है, ना ही सरंपच को मजिस्ट्रेट जैसा कानूनी अधिकार प्राप्त है। बाल यौन शोषण जैसे गंभीर अपराध को पंचायत के जरिए शादी के वादे के साथ निपटाया नहीं जा सकता। हाई कोर्ट के सिंगल बेंच में नाबालिग के साथ बार-बार दुष्कर्म का मामला आया था। जिसमें एक युवक को दोषी ठहराया गया है। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपी की याचिका को खारिज कर दिया है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को लेकर भी चिंता जताई है, जिसमें गांव के प्रभावशाली लोग पंचायत बैठाकर नाबालिग से यौन शोषण जैसे गंभीर अपराध को समझौते और शर्तों के जरिए सुलझाने की कोशिश करते हैं। इस तरह के मामले में आमतौर पर देखा गया है कि आरोपी से शादी का वादा कर मामले को थाना व कोर्ट तक पहुंचने नहीं दिया जाता और गांव में ही दबा दिया जाता है। कोर्ट ने साफ कहा, कोई भी पंचायत कानून की अदालत नहीं है,ना ही सरपंच को मजिस्ट्रेट जैसा कानूनी अधिकार प्राप्त है। अपराध का फैसला केवल न्यायिक व्यवस्था और इससे ताल्लुक रखने वाले संस्थानों के माध्यम से ही हो सकता है।
क्या है मामला
यह मामला कंधमाल जिले के फिरिंगिया क्षेत्र का है। वर्ष 2016 में आरोपी ने कथित रूप से एक नाबालिग लड़की के घर में उसके माता-पिता की अनुपस्थिति में जबरन दुष्कर्म किया और उसे किसी को न बताने की धमकी दी। लड़की ने बाद में अपनी मां को घटना की जानकारी दी। इसके बाद गांव में पंचायत बुलाई गई, जिसमें आरोपी ने कथित रूप से लड़की के साथ संबंध बनाने की बात स्वीकार की। पंचायत में यह तय किया गया कि लड़की के बालिग होने के बाद आरोपी उससे करेगा।
साल 2021 में दोनों की शादी भी हुई लेकिन शादी के 10-15 दिन बाद ही आरोपी ने लड़की को छोड़ दिया और उससे संपर्क खत्म कर दिया। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया, आरोपी के परिवार ने उसकी हत्या करने की कोशिश की। इसके बाद वर्ष 2024 में मामला दर्ज कराया। आरोपी की अणिवक्ता ने कोर्ट के समक्ष दलील दी, घटना के आठ साल बाद FIR दर्ज कराना अभियोजन के मामले को कमजोर करता है। हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज किया। आरोपी ने यह भी तर्क दिया कि उसने बाद में पीड़िता से शादी कर ली, इसलिए उसके खिलाफ आपराधिक मामला खत्म माना जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा, यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा, “यदि अपराध उस समय हुआ जब पीड़िता 18 वर्ष से कम उम्र की थी तो बाद में हुआ विवाह उस अपराध को समाप्त नहीं कर सकता और न ही आपराधिक कानून के लागू होने से रोक सकता है।
कोर्ट ने पंचायतों को दी हिदायत और ये कहा
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पंचायतों को सख्त निर्दश देते हुए कहा है, बाल यौन शोषण जैसे गंभीर अपराधों को गांव की बैठकों में निपटाने की कोशिश कानून के अधिकार क्षेत्र की अवहेलना है। सरपंच या गांव के बुजुर्गों की जिम्मेदारी कानून को रोकना नहीं बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ऐसे मामलों की सूचना तुरंत पुलिस या संबंधित अधिकारियों को दी जाए। कोर्ट ने जिला प्रशासन और पुलिस को निर्देश दिया, गांव स्तर पर सरपंचों और स्थानीय प्रतिनिधियों को संवेदनशील बनाया जाए ताकि वे समझ सकें कि नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराध किसी निजी समझौते का विषय नहीं हैं। ऐसे मामलों की तुरंत कानून के अनुसार रिपोर्ट करना अनिवार्य है।