हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नाबालिग के स्तन को दबाना यौन हमला, भले ही सीधे स्किन-टू स्किन संपर्क के बिना किया गया हो...
High Court News: ओड़िशा हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, किसी नाबालिग लड़की के स्तन को दबाना या खींचना यौन हमला माना जाएगा, भले ही वही सीधे स्किन-टू-स्किन संपर्क के बिना किया गया हो।

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कटक।09 मार्च 2026| ओड़िशा हाई कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, किसी नाबालिग लड़की के स्तन को दबाना या खींचना यौन हमला माना जाएगा, भले ही वही सीधे स्किन-टू-स्किन संपर्क के बिना किया गया हो। पाक्सो एक्ट की धारा सात के तहत इसे यौन हमला माना जाएगा। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है, ऐसी घटनाओं में आरोपी की मंशा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होती है ना कि शरीर का सीधा स्पर्श।
अब पढ़िए क्या है मामला?
घटना अगस्त 2021 की है, एक नाबालिग लड़की बस से यात्रा कर रही थी। बस एक स्टॉपेज पर रुकी, तब आरोपी ने बस की खिड़की के बाहर से हाथ डालकर लड़की के साथ छेड़छाड़ की और उसके स्तन को दबाया। नाबालिग पीड़िता के शोर मचाने पर उसके पिता ने आरोपी का पीछा किया, इस दौरान आरोपी ने उनके साथ मारपीट की। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को आरोपी ने दी थी हाई कोर्ट में चुनौती
ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील पेश की थी। याचिका की सुनवाई डॉ. जस्टिस संजीव कुमार पाणिग्रही के सिंगल बेंच में हुई। याचिका की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा, धारा 7 के तहत 'यौन हमले' की परिभाषा में वे सभी कृत्य शामिल हैं, जो यौन मंशा के साथ किए जाते हैं। जस्टिस पाणिग्रही ने अपने फैसले में साफ कहा है, यह तर्क कि 'स्किन-टू-स्किन' संपर्क के अभाव में यह कृत्य यौन हमला नहीं माना जाएगा, अब कानूनी रूप से मान्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही साफ कर दिया है, POCSO एक्ट की धारा 7 की संकीर्ण व्याख्या कानून के मूल उद्देश्य और भावना को ही विफल कर देगी।"
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया जिक्र
कोर्ट ने पीड़िता के मैट्रिक सर्टिफिकेट के आधार पर यह भी पुख्ता किया कि घटना के समय उसकी आयु 17 वर्ष 5 महीने थी जिससे वह कानूनन नाबालिग की श्रेणी में आती है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के इस दलील को खारिज करते हुए, कपड़ों के ऊपर से किया गया स्पर्श यौन हमला नहीं है, हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले अटॉर्नी जनरल बनाम सतीश, का हवाला दिया। उस फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट के विवादास्पद स्किन-टू-स्किन वाले फैसले को पलटते हुए कहा गया था "अगर ऐसी संकीर्ण व्याख्या स्वीकार की जाती है तो दस्ताने पहनकर या कपड़ों के माध्यम से किसी बच्चे के यौन अंगों को छूना भी अपराध की श्रेणी से बाहर हो जाएगा, जो एक खतरनाक स्थिति होगी।
क्या है पाक्सो एक्ट की धारा सात में
POCSO एक्ट की धारा 7 में साफ लिखा है, मुख्य तत्व यौन मंशा है न कि त्वचा का स्पर्श। हाई कोर्ट ने माना कि आरोपी का कृत्य न केवल POCSO एक्ट के तहत यौन हमला है बल्कि यह भारतीय दंड संहिता IPC की धारा 354 के तहत नाबालिग की लज्जा भंग करने का भी गंभीर अपराध है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, बस की खिड़की से हाथ डालकर किया गया यह कृत्य न केवल अभद्र था बल्कि एक युवती की शारीरिक अखंडता पर सीधा प्रहार था। ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए हाई कोर्ट ने आरोपी की याचिका को खारिज कर दिया है।
