धर्मांतरण और आरक्षण का लाभ: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, SC व्यक्ति मूल धर्म में वापसी करता है तो इन शर्तों के आधार पर मिलेगा आरक्षण का लाभ..

Supreme Court News: धर्मांतरण और उसके बाद मूल धर्म में वापसी और आरक्षण के लाभ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोट ने अपने फैसले में कहा है, यदि SC वर्ग का व्यक्ति धर्मांतरण के बाद मूल धर्म में वापसी करता है तो उसे कड़े नियमों व शर्तों का पालन करना होगा, इन्ही शर्तों व कड़े नियमों के आधार पर ही आरक्षण का लाभ मिलेगा अन्यथा इससे वंचित होना पड़ेगा।

Update: 2026-03-27 10:59 GMT

इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News

दिल्ली।27 मार्च  2026| धर्मांतरण और उसके बाद मूल धर्म में वापसी और आरक्षण के लाभ को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोट ने अपने फैसले में कहा है, यदि SC वर्ग का व्यक्ति धर्मांतरण के बाद मूल धर्म में वापसी करता है तो उसे कड़े नियमों व शर्तों का पालन करना होगा, इन्ही शर्तों व कड़े नियमों के आधार पर ही आरक्षण का लाभ मिलेगा अन्यथा इससे वंचित होना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण का लाभ प्राप्त करने के लिए मापदंड तय कर दिया है।

एक पादरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की डिवीजन बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, यदि कोई अनुसूचित जाति SC का व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म में परिवर्तित होता है, तो वह तुरंत अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है और ऐसी स्थिति में उसे आरक्षण का लाभ भी नहीं मिलेगा। एससी का दर्जा खोने के साथ ही आरक्षण की सुविधा से वह बाहर हो जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, यदि ऐसा व्यक्ति पुनः हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में वापसी करता है, तो उसे SC का दर्जा दोबारा पाने के लिए कड़े शर्तों का पालन करना होगा और यह साबित करने के लिए स्पष्ट्र प्रमाण देना होगा, संबंधित व्यक्ति मूल रूप से संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के तहत अधिसूचित जाति से संबंधित था। कोर्ट ने साफ कहा, विश्वसनीय और ठोस सबूत पेश करनी होगी, उसने वास्तविक रूप से अपने मूल धर्म में पुनः प्रवेश किया है, और जिस धर्म में उसने पहले परिवर्तन किया था, उसे पूरी तरह त्याग दिया है।

यह प्रमाण देना होगा, उसके बाद मिलेगी आरक्षण की सुविधा

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा है, उसे अपने मूल जाति के रीति-रिवाज, परंपराएं और धार्मिक प्रथाएं अपनानी होंगी। यह संतोषजनक प्रमाण होना चाहिए कि संबंधित समुदाय और जाति के लोग उसे स्वीकार करते हैं और उसमें उसका समावेश हो चुका है।

कोर्ट की साफ हिदायत, खुद का दावा पर्याप्त नहीं, समुदाय की सहमति और स्वीकृत जरुरी

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कड़ी हिदायत देते हुए कहा, ये तीनों शर्तें अनिवार्य हैं और इन्हें साबित करने का पूरा दायित्व दावा करने वाले व्यक्ति पर ही होगा। यदि इनमें से किसी एक शर्त को भी साबित नहीं किया जाता है, तो दावा अस्वीकार्य हो सकता है।

पढ़िए क्या है मामला, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का आया महत्वपूर्ण फैसला

याचिकाकर्ता पादरी, मूल रूप से अनुसूचित जाति वर्ग से था, लेकिन बाद में उसने ईसाई धर्म अपना लिया था और फिर अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत संरक्षण की मांग की। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता पादरी के दावे को खारिज करते हुए कहा, ईसाई धर्म संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में शामिल नहीं है, इसलिए धर्म परिवर्तन के साथ ही उसका SC का दर्जा समाप्त हो गया। कोर्ट ने साफ कहा, इस आदेश की धारा 3 के अनुसार केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के लोग ही अनुसूचित जाति के रूप में मान्य हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जनजाति ST के संदर्भ में कहा, वहां धर्म परिवर्तन निर्णायक कारक नहीं है, लेकिन यह साबित करना होगा कि व्यक्ति अब भी जनजातीय जीवनशैली अपनाए हुए हैं और उसे जनजातीय समुदाय द्वारा स्वीकार किया गया है।

Tags:    

Similar News