BMC Election Results 2026 : मुंबई की बादशाहत से ठाकरे बंधुओं की छुट्टी : आखिर क्यों फेल हुआ उद्धव-राज का साथ? जानें महायुति की बंपर जीत की 5 इनसाइड स्टोरी
BMC Election Results 2026 : सपनों की नगरी मुंबई की सियासत में आज एक नया इतिहास रच दिया गया है, दशकों तक जिस बीएमसी की सत्ता पर शिवसेना और ठाकरे परिवार का राज रहा, वहां आज बीजेपी का भगवा लहरा रहा है
BMC Election Results 2026 : मुंबई की बादशाहत से ठाकरे बंधुओं की छुट्टी : आखिर क्यों फेल हुआ उद्धव-राज का साथ? जानें महायुति की बंपर जीत की 5 इनसाइड स्टोरी
BMC Election Results 2026 : मुंबई : सपनों की नगरी मुंबई की सियासत में आज एक नया इतिहास रच दिया गया है, दशकों तक जिस बीएमसी की सत्ता पर शिवसेना और ठाकरे परिवार का राज रहा, वहां आज बीजेपी का भगवा लहरा रहा है, और उस पर नाम महायुति का है, 2026 के इस चुनावों ने साबित कर दिया की मुंबई अब सिर्फ इमोशनल नारों पर नहीं, बल्कि काम के दम पर चलती है, सबसे चौंकाने वाली बात यह रही की पहली बार भारतीय जनता पार्टी ने उद्धव ठाकरे की मदद के बिना अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा छू लिया है, यह सिर्फ एक जीत नहीं, बल्कि ठाकरे परिवार के लिए एक बड़ा सियासी मात भी है
आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर वो कौन से 5 बड़े कारण थे, जिसकी वजह से मुंबई की जनता ने ठाकरे भाइयों को बाये बाये कह दिया और महायुति पर भरोसा जताया
1. विकास का नया आयाम नारों से ज्यादा काम पर फोकस
मुंबई का आम आदमी अब पुरानी वाली घिसी-पिटी राजनीति से ऊब चुका है बीजेपी और शिंदे गुट की महायुति सरकार ने अपना पूरा फोकस विकास के काम पर रखा, कोस्टल रोड, मेट्रो नेटवर्क का विस्तार, धारावी पुनर्विकास और सड़कों को गड्ढा मुक्त करने जैसे प्रोजेक्ट्स को जनता के सामने पेश किया गया, लोगों को लगा की अगर बीएमसी में भी वही सरकार होगी जो राज्य में है, तो शहर का विकास शायद डबल स्पीड से होगा, युवाओं और मिडिल क्लास वोटर्स ने मराठी अस्मिता की इमोशनल अपील के बजाय प्रोफेशनल मैनेजमेंट को चुना, जनता अब सिर्फ राजनीति वादों भर नहीं, बल्कि चमचमाती सड़कें और बेहतर सुविधाएं चाहती थी, जो महायुति के वादों में उनको दिखी
2. उद्धव-राज फ्लॉप, देरी से मिलाया हाथ, नहीं बनी बात
इस चुनाव की सबसे बड़ी बात ये थी की 20 साल बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक साथ आना, राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी की जब दोनों साथ आएंगे, तो मराठी वोटर्स की सुनामी आ जाएगी,लोगो का साथ मिल जायेगा, लेकिन सही मायने में यह दांव उल्टा पड़ गया, मुंबई की जनता को लगा की यह गठबंधन विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ सत्ता बचाने की मजबूरी में किया गया है, लोगों के मन में सवाल था की जो भाई सालों तक एक-दूसरे के कट्टर विरोधी थे, वे अचानक बीएमसी कैसे चलाएंगे, उनकी इमोशनल अपील इस बार जनता के गले से नहीं उतरी, मतदाता यह समझ गए कि सिर्फ चेहरा बदलने से काम नहीं चलता, विजन नाम की भी कोई चीज होनी चाहिए
3. मराठी मानुस के वोटों में सेंधमारी, बिखर गया कोर वोट बैंक
शिवसेना की सबसे बड़ी ताकत हमेशा से मराठी वोट रहा है, लेकिन इस चुनाव में यह वोट बैंक बुरी तरह बिखर गया, कुछ हिस्सा उद्धव के साथ गया, कुछ राज ठाकरे के पास, तो एक बड़ा हिस्सा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और बीजेपी के पाले में चला गया, महायुति ने बड़ी चतुराई से यह मैसेज दिया की असली शिवसेना यानि शिंदे गुट उनके साथ है, इसके अलावा, गैर-मराठी वोटर्स जैसे हिंदी भाषी, गुजराती और दक्षिण भारतीय ने एकमुश्त होकर बीजेपी को वोट दिया, जब मराठी वोट बंटा और बाकी वोट एकजुट हुए, तो महायुति की जीत का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया
4. बीजेपी का मैनेजमेंट, एक एक बूथ पर तगड़ी घेराबंदी
चुनाव जीतने के लिए सिर्फ रैलियां काफी नहीं होती, और यह बात बीजेपी बहुत अच्छे से जानती है जहां ठाकरे बंधु रैलियों और भाषणों में व्यस्त थे, वहीं बीजेपी ने जमीन पर माइक्रो मैनेजमेंट किया, हर बूथ पर उनकी टोली तैयार थी, जो डेटा के आधार पर कैंपेन चला रही थी, उन्होंने स्थानीय मुद्दों जैसे पानी की किल्लत, ड्रेनेज और लोकल टैक्स पर फोकस किया, बीजेपी की संगठन की ताकत इतनी जबरदस्त थी की उन्होंने विपक्ष को संभलने का मौका ही नहीं दिया, उनका हर कार्यकर्ता यह जानता था की उसे किस घर में जाकर क्या बात करनी है, मतलब हर चीज का ध्यान रखा गया
5. बिखरा विपक्ष बिना कप्तान की टीम जैसा हाल
लोकसभा 2024 में हमने देखा था की जब उद्धव, शरद पवार और कांग्रेस साथ आए थे, तो उन्होंने कमाल ही कर दिया था, लेकिन बीएमसी चुनाव में यह एकता कही नजर ही नही आई, विपक्षी दल आपस में ही उलझते रह गए, उद्धव और राज ठाकरे एक साथ तो आए, लेकिन कांग्रेस और शरद पवार का गुट अलग-थलग पड़ गया, इस बिखराव का सीधा फायदा महायुति को मिला, विपक्ष के पास न तो कोई साझा एजेंडा था और न ही कोई ऐसा चेहरा जो पूरे मुंबई को एक साथ कर सके, जनता के सामने एक तरफ महायुति का स्पष्ट नेतृत्व था और दूसरी तरफ बिखरा हुआ विपक्ष, इसलिए जनता ने महायुति को चुनना जयादा सही समझा
बीएमसी 2026 के नतीजे यह साफ इशारा कर रहे हैं की अब मुंबई की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है, यह चुनाव इमोशन और पहचान की राजनीति का अंत और परफॉर्मेंस की राजनीति की शुरुआत है, अब देखना यह होगा कि क्या महायुति मुंबई की उम्मीदों पर खरी उतर पाती है या नही