AP High Court: सड़क दुर्घटना में पिता की मृत्यु पर बेटी मांग सकती है मुआवजा: चाहे वह विवाहित ही क्यों ना हो..

AP High Court: मोटर वाहन दुर्घटना दावा को लेकर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का यह फैसला छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में भी प्रभावी हो सकता है। बीमा कंपनियों की ना नुकूर और कानूनी अड़चनों के बीच पीड़ितों और प्रभावितों के लिए यह फैसला राहत देने वाला साबित होगा। बहरहाल आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि सड़क दुर्घटना में पिता की मृत्यु पर बेटी अपनी वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बना मुआवजा मांग सकती है। विवाहित बेटी मुआवजे की हकदार है। पढ़िए हाई कोर्ट ने बीमा कंपनी और वाहन मालिक को क्या आदेश जारी किया है।

Update: 2025-03-31 10:35 GMT
AP High Court: सड़क दुर्घटना में पिता की मृत्यु पर बेटी मांग सकती है मुआवजा: चाहे वह विवाहित ही क्यों ना हो..
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AP High Court: नईदिल्ली। सड़क दुर्घटना में पिता की मृत्यु होने पर कौन मुआवजा मांगने का हकदार है,इसे लेकर आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। खासकर विवाहित बेटी की कानूनी अधिकार को लेकर कोर्ट ने स्थिति को स्पष्ट किया है। जस्टिस वीआरके कृपा सागर के सिंगल बेंच ने अपने फैसले में लिखा है कि सिंगल बेंच ने अपने फैसले में लिखा है कि बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित कानूनी उत्तराधिकारी होती है। इसलिए एक विवाहित बेटी मोटर वाहन दुर्घटना के कारण अपने पिता की मृत्यु पर मुआवज़े के लिए दावा करने की हकदार है। कोर्ट ने कहा है कि हर उत्तराधिकारी आश्रित नहीं हो सकता। गैर-उत्तराधिकारी भी आश्रित हो सकते हैं। सिर्फ़ इसलिए कि एक बेटी विवाहित है वह पूरी तरह से आश्रित नहीं रह जाती। वह किस हद तक अपने पिता पर निर्भर है, यह एक तथ्य है और यह वह तथ्य है, जिसे ऐसे दावों में दलील देने साबित करने और विचार करने की आवश्यकता होती है।

दूसरी पत्नी और विवाहित बेटी ने अलग-अलग दायर किया था दावा

मृतक सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता के पद पर 6728 रुपये मासिक वेतन पर नौकरी कर रहा था। दूध की गाड़ी ने उसे कुचल दिया था। मृतक की विवाहित बेटी और दूसरी पत्नी ने वाहन मालिक और बीमा कंपनी के खिलाफ मामला दायर कर बतौर मुआवजा चार लाख रुपये की मांग की थी। मामले की सुनवाई के बाद ट्रिब्यनूल ने विवाहित बेटी और मृतक की दूसरी पत्नी को साढ़े सात फीसदी ब्याज के साथ तीन लाख 77 हजार रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया था। यह राशि वाहन मालिक और बीमा कंपनी को चुकानी थी।

ट्रिब्यूनल के फैसले को बीमा कंपनी ने दी थी चुनौती

ट्रिब्यूनल के फैसले को मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 173 के तहत चुनौती देते हुए बीमा कंपनी ने याचिका दायर की थी। बीमा कंपनी ने अपनी याचिका में कहा था कि एक्सीडेंट के समय वाहन चालक के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था। विवाहित बेटी को पिता का आश्रित ना होने का दावा करते हुए मुआवजे की हकदार ना होन की बात कही थी।

हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला

मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा है कि मोटर दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु पर दिया जाने वाला मुआवजा मृतक की संपत्ति बन जाता है। कोर्ट ने कहा कि इसी तरह विवाहित बेटी अपने पिता की मृत्यु के कारण मुआवजे में हिस्सेदारी की हकदार है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला दिया है। नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम बीरेंद्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि कानूनी प्रतिनिधि वह है जो मोटर वाहन दुर्घटना के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु से पीड़ित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के साथ दावा न्यायाधिकरण को निर्देशित किया कि सबूतों पर विचार करे और निर्भरता की सीमा निर्धारित करे। बीमा कंपनी की याचिका को खारिज हुए हाई कोर्ट ने चार लाख 40 रुपये का मुआवजा भुगतान का निर्देश दिया है। ट्रिब्यूनल द्वारा तय राशि में हाई कोर्ट में 63 हजार रुपये की वृद्धि कर दी है। मुआवजे का भुगतान वाहन मालिक और बीमा कंपनी द्वारा दिया जाना है।

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