Supreme Court News: दुष्कर्म के आरोप से घिरे छत्तीसगढ़ के एक वकील को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत, रेप केस को किया रद्द

Supreme Court News: दुष्कर्म के आरोप से घिरे छत्तीसगढ़ के एक अधिवक्ता को सुप्रीम कोर्ट ने राहत देते हुए रेप केस को रद्द कर दिया है।

Update: 2026-02-06 09:58 GMT

इमेज सोर्स- गूगल, एडिट बाय- NPG News

06 फरवरी 2026|दिल्ली। दुष्कर्म के आरोप से घिरे छत्तीसगढ़ के एक अधिवक्ता को सुप्रीम कोर्ट ने राहत देते हुए रेप केस को रद्द कर दिया है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, यह मानना मुश्किल है, शादीशुदा महिला को शादी के झूठे वादे पर सेक्स के लिए राजी किया गया है। महिला खुद वकील है, जाहिरतौर पर हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों को जानती होंगी। इस प्रकरण में यौन संतुष्टि के लिए धोखा देने के गलत इरादे से किया गया झूठा वादा साबित नहीं होता है।

दुष्कर्म के आरोप से घिरे छत्तीसगढ़ के अधिवक्ता ने हाई कोर्ट के निर्णय को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई को रद्द कर दिया है। याचिकाकर्ता अधिवक्ता पर शादी का झूठा वादा कर एक शादीशुदा महिला सहकर्मी से बार-बार दुष्कर्म करने का आरोप था। महिला सहकर्मी ने अधिवक्ता के खिलाफ मामला दायर किया था। डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि अन्य मामलों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार यह तय किया है, शादी के वादे के बाद शारीरिक संबंध बनाया, हर मामले में इसे रेप नहीं माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि PC की धारा 375 के तहत दुष्कर्म काअपराध तभी बनता है, जब आरोपी ने शादी का वादा सिर्फ़ यौन संबंध बनाने के लिए सहमति लेने के मकसद से किया हो। उस झूठे वादे का महिला की यौन संबंध के लिए सहमति देने पर सीधा असर पड़ा हो।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, शिकायतकर्ता खुद भी 33 साल की वकील और शादीशुदा मां है। शिकायकर्ता का तलाक का मामला फैमिली कोर्ट में पेंडिंग है। उसने आरोप लगाया कि आरोपी अधिवक्ता ने सितंबर, 2022 में शादी का आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। महिला ने दावा किया कि यह रिश्ता जनवरी, 2025 तक चला। इस दौरान वह गर्भवती हो गई और उसे जबरन अबॉर्शन करवाना पड़ा। परिवार के साथ टकराव के बाद फरवरी 2025 में IPC की धारा 376(2)(n) के तहत FIR दर्ज कराई। दर्ज कराई गई धाराओं में एक ही महिला के साथ बार-बार किए गए रेप के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान है।

हाई कोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी अधिवक्ता ने इसे चुनौती देते हुए दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने याचिका को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद आदेश को रद्द कर दिया है। डिवीजन बेंच ने कहा, कथित रिश्ते की पूरी अवधि के दौरान शिकायतकर्ता कानूनी रूप से शादीशुदा थी। तलाक का मामला अभी भी पेंडिंग था। आरोपी द्वारा एक शादीशुदा महिला से किया गया शादी का कोई भी वादा शुरू से ही कानूनी रूप से पूरा करना असंभव था, क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(i) के तहत अगर किसी भी पक्ष का पति या पत्नी जीवित है, तो ऐसी स्थिति में दूसरी शादी अमान्य मानी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कानून दो शादियों पर रोक लगाता है। इसलिए दोनों ही पक्षों को पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी करने की इजाज़त नहीं देता। इसलिए यह मानना ​​मुश्किल है कि शिकायतकर्ता, जो खुद एक वकील हैं, कानून की इस तय स्थिति से अनजान थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, इस प्रकरण में यौन संतुष्टि के लिए धोखा देने के गलत इरादे से किया गया झूठा वादा साबित नहीं होता है। इसके बजाय यह दो समझदार, पढ़े-लिखे वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने रिश्ते की ओर इशारा करता है जो बाद में कड़वा हो गया। इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द कर दिया है।

Tags:    

Similar News