Resham ke kide se dhaga kaise banaya jata hai: छत्तीसगढ़ के जंगलों में कैसे पाले जाते है रेशम के कीड़े; जानिए चांपा के टसर सिल्क से बनी साड़ियों का पूरा प्रोसेस

Resham ke kide se dhaga kaise banaya jata hai: छत्तीसगढ़ की धरती सिर्फ धान और खनिज संसाधनों के लिए ही फेमस नहीं है बल्कि यहां टसर सिल्क कोसा का भी उत्पादन किया जाता है जो पूरे देश में विख्यात है। लेकिन क्या आपको पता है कि रेशम के कीड़े से किस प्रकार धागा निकाला जाता है और साड़ियां किस प्रकार बनाई जाती हैं तो चलिए जानते हैं पूरा प्रोसेस।

Update: 2026-02-25 12:28 GMT

Resham ke kide se dhaga kaise banaya jata hai: छत्तीसगढ़ की धरती सिर्फ धान और खनिज संसाधनों के लिए ही फेमस नहीं है बल्कि यहां टसर सिल्क कोसा का भी उत्पादन किया जाता है जो पूरे देश में विख्यात है। यहां रेशम के कीड़ों का पालन फिर उनसे रेशम निकालकर कपड़े बनाने की इस पूरी प्रक्रिया ने छत्तीसगढ़ को एक अलग ही आयाम दिया है। लोगों में रोजगार के साधन तो निर्मित हुए ही हैं साथ ही आय में भी वृद्धि हुई है। छत्तीसगढ़ में जांजगीर चांपा जिला कोसा उत्पादन और इससे खूबसूरत साड़ियां बनाने में सबसे आगे है। लेकिन क्या आपको पता है कि रेशम के कीड़े से किस प्रकार धागा निकाला जाता है और साड़ियां किस प्रकार बनाई जाती हैं तो चलिए जानते हैं पूरा प्रोसेस।

रेशम के कीड़ों का उत्पादन

छत्तीसगढ़ में कोरबा, अंबिकापुर और बस्तर के घने जंगलों में अर्जुन और शहतूत जैसे पेड़ों पर रेशम के कीड़ों/कोसा की खेती की जाती है और यह कीड़े इसी पेड़ पर ही पाए जाते हैं। यह छोटे-छोटे कीड़े पेड़ों की पत्तियों को खाकर अपने बाहरी आवरण में एक खोल बना लेते हैं जिसे कोकून भी कहा जाता है और फिर यहां के लोग एक-एक करके सभी कोकून को इकट्ठा करते हैं फिर इसे आगे प्रोसेस करने के लिए फैक्ट्री में भेज दिया जाता है।

फिर इन कीड़ों को बहुत ही दर्दनाक मंजर से गुजरना पड़ता है अर्थात इन्हें खौलते हुए पानी में काफी समय तक उबाला जाता है फिर कोकून से धागा निकालने की प्रक्रिया शुरू होती है। उबले हुए कोकून के बाहरी परत को निकाला जाता है और फिर अंदर से एक बारिक धागा निकलने लगता है। यह धागा इतना पतला होता है कि कई बार दिखता भी नहीं है इसलिए 5 से 10 को कोकून के रेशे को मिलाकर एक धागा बनाया जाता है। एक स्वस्थ व सामान्य कोकून से 1 से 1.5 किलोमीटर लंबा रेशा निकाला जा सकता है।

रेशों से कपड़ा बुनने की प्रक्रिया

जब कोकून से पूरी तरह रेशा निकाल कर धागा तैयार हो जाता है तो उसे धागों से कपड़े बनाने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। इस कार्य के लिए छत्तीसगढ़ का जांजगीर चांपा जिला नंबर एक पर आता है। यहां देवांगन/कोस्टा समुदाय के लोग यह कार्य करते हैं। इनके घरों में ही हथकरघे लगे होते है और कई मशीनों से भी धागों का ताना-बाना बुनकर कपड़े तैयार किए जाते हैं। पारंपरिक तरीके से एक पूरी साड़ी को बनने में लगभग 10 से 12 घंटे का समय लग जाता है।

चांपा की फेमस कोसा साड़ियां

चांपा की कोसा साड़ियां पूरे भारत में प्रसिद्ध है क्योंकि यहां कारीगर अपने हाथों का ही इस्तेमाल करके साड़ियों को बुनते हैं और डिजाइन देते हैं। यहां आपको कोसा सिल्क से बनी शॉल, कुर्ती, जैकेट शर्ट और भी बहुत कुछ मिल जाएगी। छत्तीसगढ़ का राजकीय गमछा भी चांपा के टसर सिल्क से ही बनाया जाता है। यदि आपको भी ओरिजिनल कोसा साड़ियां खरीदनी है तो चांपा के लायंस चौक का रुख किया जा सकता है।

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