समुद्र की 40–50 फीट ऊंची लहरों में भी जहाज क्यों नहीं डूबते? जानिए बैलास्ट टैंक, बॉयेंसी और एडवांस टेक्नोलॉजी का पूरा विज्ञान!
Samudra ki badi laharon mein jahaj kyon nahin dubte: क्या आपने कभी सोचा है कि समुद्र में उठने वाली 40–50 फीट की लहरों से बड़ी-बड़ी जहाजे बच कैसे जाती हैं? समुद्र की लहरों में तो इतनी ताकत होती है कि वे हजारों टन वजनी जहाज को भी आसानी से डूबा दे लेकिन विज्ञान और इंजीनियरिंग के अनोखे आविष्कार ने इस चीज को संभव बनाया है।
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Samudra ki badi laharon mein jahaj kyon nahin dubte: क्या आपने कभी सोचा है कि समुद्र में उठने वाली 40–50 फीट की लहरों से बड़ी-बड़ी जहाजे बच कैसे जाती हैं? समुद्र की लहरों में तो इतनी ताकत होती है कि वे हजारों टन वजनी जहाज को भी आसानी से डूबा दे लेकिन विज्ञान और इंजीनियरिंग के अनोखे आविष्कार ने इस चीज को संभव बनाया है। इनके खास डिजाइन और बॉयेंसी’ (Buoyancy) जैसे तकनीक के वजह से ही ये समुद्र की बड़ी-बड़ी लहरों को भी पार कर जाती है। आज हम समझने वाले हैं कि जब भी समुद्र में बड़ी लहरें उठती हैं तो जहाज उसका सामना कैसे कर पाती है!
जहाज के नीचे बना खुफिया बैलास्ट टैंक
तूफान के दौरान जहाज को स्टेबिलिटी प्रदान करने के लिए जहाज के नीचे वाले हिस्से में एक विशाल खाली टैंक बनाया जाता है। यह टैंक हमें ऊपर से दिखाई नहीं देता क्योंकि यह पानी के अंदर डूबा होता है। जब भी जहाज शांत समुद्र में चलता है तो इस खाली टैंक में कम पानी भरते हैं लेकिन जब तूफान जैसी स्थिति होती है तब इस टाइम को पानी से पूरी तरह भर दिया जाता है। ऐसा करने के पीछे यह विज्ञान है कि जब पानी के वजन से जहाज का गुरुत्वाकर्षण नीचे की ओर शिफ्ट होता है तो जहाज का आधार काफी मजबूत हो जाता है और ऐसे में जहाज थोड़ा बहुत हिलने के बाद भी वापस अपने स्थिति में आ जाती है।
एंटी-रोलिंग स्टेबलाइजर्स
जिस प्रकार से पक्षियों के पंख होते हैं जो उन्हें उड़ने में मदद करती हैं वैसे ही जहाज के दोनों तरफ पंखों की तरह स्टेबलाइजर लगे होते हैं। जब भी कोई बड़ी लहर जहाज को एक तरफ झुका देती है तो इन स्टेबलाइजर के फिंस उल्टी दिशा में मुड़ जाते हैं और पानी के दबाव से जहाज फिर से अपनी स्थिति में आ जाती है।
‘सेल्फ-राइटिंग’ डिजाइन की मदद
जहाज को संतुलन प्राप्त करने में इस तकनीक का भी बहुत बड़ा योगदान होता है। सेल्फ-राइटिंग’ तकनीक में जहाज को ऐसे डिजाइन किया जाता है जिसमें ऊपर का हिस्सा हल्का और नीचे का हिस्सा बहुत भारी होता है। इसी वजह से लहरों के कारण यदि जहाज पूरी तरह भी पलट जाए तो उसका निचला हिस्सा भारी होने की वजह से गुरुत्वाकर्षण के कारण फिर से सीधा हो जाएगा।
वॉटरटाइट कंपार्टमेंट्स का होना
जहाज के न डूबने में यह तकनीक बहुत ही काम की है। अगर यह टाइटेनिक जहाज में होती तो शायद आज वह हमारे बीच होता। वॉटरटाइट कंपार्टमेंट्स जहाज में बने ऐसे कमरे होते हैं जो पूरी तरह से एयर टाइट और सील बंद कमरे हैं। कई बार जहाज में छोटे से छेद के वजह से पानी भरने लगता है तो इन वाटर टाइट कमरों के वजह से जहाज पूरी तरह नहीं डूबती और तैरती रहती है।