मौत के बाद मिला न्याय, धोया बदनामी का दाग....फर्जी वेतन आहरण के आरोप में निचली अदालत ने CMHO, अकाउंटेंट व 10 कर्मियों को सुनाई थी सजा....
Bilaspur High Court: मौत के बाद ही सही, पांच सरकारी कर्मचारियों को हाई कोर्ट से न्याय मिला है। मौत के बाद परिवार वालों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर निचली अदालत और जांच एजेंसियों के फैसले को चुनौती दी थी। याचिका की सुनवाई के बाद कोर्ट ने CMHO, अकाउंटेंट सहित 10 कर्मचारियों को दोष मुक्त कर दिया है।
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बिलासपुर|31 मार्च 2026| मौत के बाद ही सही, पांच सरकारी कर्मचारियों को हाई कोर्ट से न्याय मिला है। मौत के बाद परिवार वालों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर निचली अदालत और जांच एजेंसियों के फैसले को चुनौती दी थी। याचिका की सुनवाई के बाद कोर्ट ने CMHO, अकाउंटेंट सहित 10 कर्मचारियों को दोष मुक्त कर दिया है। सफाई कर्मियों के नाम पर फर्जी तरीके से वेतन आहरण का आरोप लगाते हुए लोकायुक्त भोपाल ने स्पेशल कोर्ट में चालान पेश किया था। मामले की सुनवाई के बाद स्पेशल कोर्ट ने सभी आरोपियों को दो- दो साल की सजा और जुर्माना ठोका था।
सजा भुगतने के बाद पांच कर्मचारियों की मौत हो गई थी। इनके पत्नी व बच्चों ने लोकायुक्त जांच और विशेष अदालत द्वारा दिए गए फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील पेश की थी। अपील पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, साजिश का आरोप साबित करने के लिए, अभियोजन पक्ष को यह सिद्ध करना होगा, दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच किसी अवैध कार्य को करने के लिए, या किसी वैध कार्य को अवैध साधनों से करने के लिए, कोई समझौता या आपसी सहमति मौजूद थी। ऐसा समझौता या तो प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा, या फिर ऐसी परिस्थितियों द्वारा सिद्ध किया जाना चाहिए जो स्पष्ट रूप से किसी साझा योजना की ओर संकेत करती हो।
लोकायुक्त भोपाल ने दर्ज किया था मामला
लोकायुक्त ने सीआर मलिक, बीएस मौर्य, टीकेसी बोस, केआरसी पिल्ले, जीआर संभलकर, पीएल बिल्लरे, सी बनर्जी, एमपी पांडेय एवं एसआर देवांगन को आरोपी बनाने के बाद विशेष न्यायालय में चालान पेश किया था। मामले में सीएमएचओ डॉ. सेन ने सजा के खिलाफ कोई अपील पेश नहीं की थी, उनकी वर्ष 2003 में मौत हो गई। अपील लंबित रहने के दौरान एमआर मलिक, बीएस मौर्य, टीकेसी बोस, केआरसी पिल्ले, जीआर संभलकर की मौत हो गई। इनकी मौत के बाद विधिक वारिसों ने अदालती लड़ाई लड़ी।
पढ़िए क्या था मामला
डॉ. आरके सेन, तत्कालीन सीएमएचओ (मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी) जगदलपुर के पद पर 1979 में कार्यरत थे। आरोप था, तीन स्वीपर जयसिह, लालमणि और मायाराम को अलग-अलग प्राइमरी हेल्थ सेंटर पर अस्थाईतौर पर नियुक्त किया गया था। उन्हें अस्पताल की जगह जुलाई 1979 से तकरीबन एक साल तक सीएमएचओ ने अपने घर पर घरेलू नौकर के तौर पर रखा। इसके बाद, तीनों स्वीपरों ने नौकरी छोड़ दी। स्वीपरों के नौकरी छोड़ने के बाद भी, सीएमएचओ डॉ. सेन ने दूसरे आरोपियों के साथ साजिश करके, जुलाई 1979 से मई 1985 तक उनके नाम पर फर्जी बिल तैयार करना जारी रखा और उनके नाम पर सैलरी निकालते रहे। सैलरी बिल पर उन स्वीपरों के अंगूठे के नकली निशान लगाए गए थे, जबकि वे पढ़े-लिखे थे और हस्ताक्षर कर सकते थे। फर्जी तरीके से तीनों स्वीपर के नाम पर बतौर वेतन 42,04035 रुपए निकाल लिए। सरकारी खजाने काे नुकसान पहुंचाने का काम किया गया।
शक, चाहे कितना भी मजबूत हो, कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, अभियोजन, अपील करने वालों के खिलाफ आरोपों को बिना किसी शक के साबित करने में नाकाम रहा है। रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत, ज्यादा से ज्यादा, शक पैदा करते हैं। हालांकि, यह अच्छी तरह से तय है, शक, चाहे कितना भी मजबूत हो, कानूनी सबूत की जगह नहीं ले सकता। अपीलकर्ता अधिनस्थअधिकारी होने के नाते, अपने वरिष्ठ अधिकारी, यानी डॉ. आरके सेन के निर्देशों का पालन करते हुए काम करते थे। उनकी तरफ से किसी भी तरह की मिलीभगत, बेईमानी का इरादा, या गलत फायदा उठाने का कोई सबूत पेश नहीं किया गया है। जिन अपराधों का आरोप लगाया गया है, उनके जरूरी तत्व साबित नहीं हुए हैं। हाई कोर्ट इस टिप्पणी के साथ सभी अपीलकर्ताओं की सजा को रद्द करते हुए दोषमुक्त करने का आदेश जारी किया है।