Bilaspur High Court: हाई कोर्ट ने SECL के विवादित आदेश को किया रद्द: जानिए कोर्ट ने क्या कहा..
Bilaspur High Court: भूविस्थापितों की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने SECL के विवादित आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा ने अपने फैसले में कहा है, भूमि अधिग्रहण से प्रभावित भूमि स्वामियों को पुनर्वास व रोजगार से वंचित नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को भूमि अधिग्रहण की तिथि पर लागू राज्य पुनर्वास नीति का पालन करने का निर्देश एसईसीएल को दिया है।
SECL Ka Vivadit Adesh: बिलासपुर। भूविस्थापितों काे राहत देते हुए हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा, भूमि अधिग्रहण से प्रभावित भूमि स्वामियों को पुनर्वास व रोजगार से वंचित नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है।हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को भूमि अधिग्रहण की तिथि पर लागू राज्य पुनर्वास नीति का पालन करने का निर्देश एसईसीएल को दिया है।
बिलासपुर हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा, भूमि अधिग्रहण से प्रभावित व्यक्तियों को पुनर्वास और रोजगार का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ है। इस अधिकार से मनमाने ढंग से वंचित किया जाना संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन है। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रविंद्र कुमार वर्मा ने कहा, भूविस्थापितों को पुनर्वास नीति के तहत रोजगार दिया जाना महत्वपूर्ण अधिकार है। भूमि अधिग्रहण की तिथि से यह नीति लागू हो जाती है। इस नीति की भूमि अधिग्रहण करने वाली कंपनी या संस्था अनदेखी नहीं कर सकती। एसईसीएल के भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास को लेकर दायर याचिका पर कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा, पुनर्वास और रोजगार का अधिकार अनुच्छेद 21 का तार्किक परिणाम है और रोजगार से इनकार करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के साथ-साथ अनुच्छेद 21 का भी उल्लंघन करता है।
यह है मामला
याचिकाकर्ताओं की कृषि भूमि वर्ष 2009 में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड SECL द्वारा अधिग्रहित की गई थी।
भूमि अधिग्रहण के समय अफसरों ने भूविस्थापितों को आश्वासन दिया था कि प्रभावित परिवारों को पुनर्वास नीति के अंतर्गत रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। इसके बावजूद, जब याचिकाकर्ताओं ने राज्य पुनर्वास नीति के तहत रोजगार के लिए आवेदन किया, तो एसईसीएल द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। एसईसीएल की अनदेखी को लेकर भूविस्थापितों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अपने 20 दिसंबर 2019 के आदेश में एसईसीएल को निर्देश दिया था कि वह याचिकाकर्ताओं के दावों पर लागू नीति के अनुसार विचार करे। हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी वर्ष 2020 में एसईसीएल ने यह कहते हुए याचिकाकर्ताओं के दावे को खा रिज कर दिया कि याचिकाकर्ताओं के पास दो एकड़ से कम भूमि थी, जो एसईसीएल की आंतरिक नीति के अनुरूप नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा कि एसईसीएल की यह शर्त राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के विपरीत है और सरकारी नीति पर एसईसीएल के दिशा-निर्देश हावी नहीं हो सकते। याचिकाकर्ताओं भूविस्थापितों ने कहा कि भूमि अधिग्रहण के साथ ही रोजगार व पुनर्वास का उनका अधिकार सामने है।
SECL ने कुछ इस तरह की दी दलीलें
एसईसीएल की ओर से पैरवी करते अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, याचिकाकर्ता भूमि अधिग्रहण के समय नाबालिग था। भूमि उसके पूर्वजों के नाम पर थी और परिवार के एक अन्य सदस्य को पहले ही रोजगार दिया जा चुका है। यह भी आरोप लगाया गया कि शेष भूमि को कृत्रिम रूप से टुकड़ों में बांटकर कई रोजगार प्राप्त करने का प्रयास किया गया। एसईसीएल की दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा, केवल इस आधार पर रोजगार से इनकार नहीं किया जा सकता कि परिवार के किसी अन्य सदस्य को पहले ही रोजगार दिया गया है। इन दलीलों से याचिकाकर्ता के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।
हाई कोर्ट ने एसईसीएल को दिया निर्देश, छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति का करे पालन
हाई कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन नीति, 2007 का अवलोकन करते हुए पाया कि इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके अनुसार रोजगार के लिए न्यूनतम दो एकड़ भूमि होना अनिवार्य हो। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की पुनर्वास नीति एसईसीएल या कोल इंडिया लिमिटेड की आंतरिक नीतियों पर प्रधानता रखेगी।
हाई कोर्ट ने एसईसीएल के विवादास्पद आदेश को किया निरस्त
हाई कोर्ट ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण रोजगार उपलब्ध कराने के स्पष्ट आश्वासन पर किया गया है। सीआईएल द्वारा नई योजना लाकर प्रभावित व्यक्तियों को रोजगार से वंचित किया गया, जो मनमाना, अनुचित है। हाई कोर्ट ने एसईसीएल के विवादित आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ताओं को भूमि अधिग्रहण की तिथि पर लागू राज्य पुनर्वास नीति का पालन करने का निर्देश दिया है।