Bilaspur High Court: हाई कोर्ट का फैसला: बच्चे की कस्टडी को लेकर हाई कोर्ट ने सुनाया महत्वपूर्ण फैसला, पिता की याचिका को कोर्ट ने इस आधार पर किया खारिज

Bilaspur High Court: माता-पिता के बिना अनबन और बच्चों की कस्टडी को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। पिता विवाहित पत्नी काे छोड़कर बिना तलाक दूसरी पत्नी के साथ रहने लगा। बच्चे की कस्टडी को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर किया था। हाई कोर्ट ने कुछ इस तरह का फैसला सुनाया है।

Update: 2026-01-22 13:05 GMT

Bilaspur High Court: बिलासपुर। बच्चे की कस्टडी को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि बिना तलाक लिए दूसरी पत्नी के साथ रह रहे पिता को बच्चे की कस्टडी नहीं दी जा सकती, कस्टडी में लेने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने साफ कहा, बच्चे का हित आर्थिक क्षमता से कहीं ऊपर है।

बिलासपुर हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने परिवार न्यायालय के फैसले को सही ठहराते हुए कहा, बिना तलाक लिए दूसरी पत्नी के साथ रहे रहे पिता को बच्चे की कस्टडी लेने का अधिकार नहीं है। सात वर्षीय बच्चा अपने मां के साथ रह रहा है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामले में बच्चों का सर्वांगीण कल्याण सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय के अग्रवाल व जस्टिस अरविंद वर्मा की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने कहा कि चूंकि बच्चा जन्म से ही अपनी मां के साथ रह रहा है। उसे आवश्यक प्रेम, स्नेह व देखभाल मिल रहा है, लिहाजा उसकी कस्टडी बदलना उचित नहीं होगा।

डिवीजन बेंच ने कहा, बच्चे के भविष्य को देखना आवश्यक है। यह भी निश्चित नहीं है कि बच्चे को सौतेली मां के साथ ही वैसा ही प्रेम, दुलार और अनुकूल वातावरण मिलेगा, जैसा उसे अपनी मां से मिलते आ रहा है। पिता ने अपनी याचिका में कहा कि वह आर्थिक रूप से सक्षम है, बच्चे की जरुरतों को बेहतर तरीके से पूरी कर सकता है। पिता के तर्कों को सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 13(1) का हवाला देते हुए कहा कि अभिभावक नियुक्त करते समय सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का कल्याण होता है।

आर्थिक सम्पन्नता के आधार पर नहीं दी जा सकती कस्टडी

मामले की सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच ने कहा, केवल आर्थिक संपन्नता को आधार बनाकर कस्टडी नहीं दी जा सकती। बच्चे का हित, शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सभी पहलुओं को संतुलित रूप से देखकर तय किया जाना चाहिए। डिवीजन बेंच ने साफ कहा, बच्चे का कल्याण ना तो केवल आर्थिक समृद्धि से तय होता है और ना ही केवल भावनात्मक जुड़ाव से। इसका निर्धारण सभी कारकों के संतुलन से होता है, जिससे बच्चे का समग्र विकास सुनिश्चित हो सके।

क्या है मामला

पति-पत्नी का विवाह वर्ष 2013 में हुआ था और उनके दो पुत्र हैं। पति पत्नी के बीच विवाद के बाद वर्ष 2021 में पत्नी अपने छोटे बेटे के साथ मायके चली गई। बाद में बड़ा बेटा भी मां के पास रहने लगा। इसके बाद पिता ने हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 के तहत बड़े बेटे की कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन किया। फैमिली कोर्ट ने पहली पत्नी से तलाक लिए बिना दूसरी पत्नी के साथ रहने को क्रूरता और कदारण की श्रेणी में मानते हुए याचिका को कस्टडी देने से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। फैमिली कोर्ट के आदेश को पिता ने चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। दायर याचिका में कहा कि पत्नी आर्थिक रूप से कमजोर है, इसलिए वह बच्चे की परवरिश ठीक ढंग से नहीं कर पाएगी। लिहाजा बच्चे की कस्टडी उसे दिया जाए।

मामले की सुनवाई के बाद डिवीजन बेंच ने कहा, भले ही कानून के तहत पिता को प्राकृतिक संरक्षक माना गया हो, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। हर मामले में बच्चे के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इस टिप्पणी के साथ फैमिली कोर्ट के फैसीले को सही ठहराते हुए डिवीजन बेंच ने पिता की याचिका खारिज कर दी है।

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