Bilaspur High Court: बिलासपुर हाई कोर्ट का अहम फैसला, आंगनबाड़ी सहायिका की बर्खास्तगी रद्द, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन मानते हुए पुनर्नियुक्ति का दिया आदेश

Bilaspur High Court: आंगनबाड़ी सहायिका की बर्खास्तगी आदेश को नियम विरुद्ध बताते हुए हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने शासन के आदेश को रद्द कर दिया है।

Update: 2026-02-15 04:29 GMT

Bilaspur High Court: आंगनबाड़ी सहायिका की बर्खास्तगी आदेश को नियम विरुद्ध बताते हुए हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने शासन के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता को उसी स्थान पर दोबारा नियुक्ति देने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्राची तरुणधर दीवान ने पैरवी की।

बिलासपुर। आंगनबाड़ी सहायिका की बर्खास्तगी आदेश को नियम विरुद्ध बताते हुए हाई कोर्ट के सिंगल बेंच ने शासन के आदेश को रद्द कर दिया है। जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता को उसी स्थान पर दोबारा नियुक्ति देने का आदेश दिया है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्राची तरुणधर दीवान ने पैरवी की। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कहा,राजनीतिक विद्वेषवश की गई शिकायत के आधार पर नियमों का बगैर पालन किए विभागीय अधिकारियों ने एकतरफा कार्रवाई की थी। अफसरों ने प्राकृतिक न्याय सिद्धांत का सीधेतौर पर उल्लंघन कर दिया है।

याचिकाकर्ता मुरली यादव ने अधिवक्ता प्राची तरुणधर दीवान के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बर्खास्तगी आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में बताया है, जनपद पंचायत शंकरगढ़ जिला बलरामपुर के आंगनबाड़ी केंद्र समुद्री में 19 अगस्त 2023 को आंगनबाड़ी सहायिका के पद पर हुई थी। तब से लेकर लगातार वह अपना कामकाज ईमानदारी के साथ कर रही थी। केंद्र व राज्य शासन की महत्वाकांक्षी योजनाओं का सफलतापूर्वक क्रियान्वयन करते आ रही थी।

24 सितंबर 2022 को विधायक आपके द्वार कार्यक्रम में उनके विरुद्ध शिकायत की गई। यह शिकायत पूरी तरह राजनीतिक दुर्भावना के चलते की गई थी। विधायक से की गई शिकायत के आधार पर विधायक के निर्देश पर विभागीय अधिकारियों ने उनकी 19 साल की ईमानदारी के साथ किए जा रहे कार्य को दरकिनार करते हुए विधायक से की गई शिकायत के महज 13 दिन बाद सेवा से बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया। याचिका की सुनवाई जस्टिस एके प्रसाद के सिंगल बेंच में हुई।

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता प्राची तरुणधर दीवान ने कहा कि राजनीतक दुर्भावना और महज शिकायत के आधार पर किसी शासकीय सेवक को एक झटके में कैसे सेवा से बाहर किया जा सकता है। अधिवक्ता प्राची दीवान ने सेवा भर्ती नियमों का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय अधिकारियों से सेवा से बर्खास्तगी का आदेश जारी करने से पहले सेवा भर्ती नियमों को ना केवल दरकिनार कर दिया है वरन सेवा भर्ती नियमों का खुलकर उल्लंघन भी किया है।

क्या है नियम

अधिवक्ता प्राची तरुणधर दीवान ने कोर्ट को बताया कि आंगनबाड़ी सहायिकाओं की नियुक्ति और कार्रवाई के दौरान सेवा भर्ती नियमों का पालन करना जरुरी है। नियमों का हवाला देते हुए अधिवक्ता प्राची ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत मिलती है तो नियमानुसार शोकॉज नोटिस जारी कर जवाब के लिए 15 दिन का दिया जाता है। इसके बाद भी संबंधित की ओर से जवाब पेश नहीं किया जाता, तब ऐसी स्थिति में दोबारा 15 दिन का समय दिया जाता है। इसके बाद जनपद पंचायत स्तर पर जांच कमेटी का गठन किया जाता है। जांच कमेटी की सिफारिश और रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाती है।

याचिकाकर्ता के प्रकरण में सेवा नियमों का सीधतौर पर उल्लंघन किया गया है। अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि बर्खास्तगी आदेश जारी करने से पहले याचिकाकर्ता को प्राकृतिक न्याय सिद्धांत के आधार पर सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया है। विभागीय अधिकारियों ने प्राकृतिक न्याय सिद्धांत का अवहेलना कर दिया है। अधिवक्ता के तर्कों से सहमत होते हुए हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया है। याचिकाकर्ता को उसी स्थान पर पुन: नियुक्ति करने का आदेश जारी किया है।

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