बिहार में नया सीएम चुनना आसान नहीं...बीजेपी बड़ी मुश्किल में, एक को बनाया तो दूसरा रूठ जाएगा
Bihar New CM : बिहार में 20 साल बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) खुद का सीएम दे सकती है। इस रेस में कई नाम हैं। मगर, BJP के लिए यह इतना आसान नहीं है।
Bihar New CM News : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधान परिषद (MLC) के पद से इस्तीफा दे दिया है। अब बिहार में नीतीश युग का अंत करीब है। ऐसा इस मायने में कि जल्द प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कोई और बैठेगा। यह तय माना जा रहा कि नया सीएम बीजेपी से होगा। मगर, बिहार में नया मुख्यमंत्री चुनना बीजेपी के लिए आसान नहीं होगा।
यहां की राजनीति में जाति ही इकलौता सच
कहा जाता है कि सारे राजनीतिक पंडितों के अनुमान बिहार में धरे के धरे रह जाते हैं। आप कई चुनावों के एग्जिट पोल में यह देखे होंगे। इसे खासियत कहें या दुर्भाग्य, बिहार में हार-जीत का फैसला जाति ही करती है। यहां जब भी चुनाव होते हैं तो जाति ही इकलौता सच होता है। राजनीतिक पार्टियां भी सत्ता में आने पर जो फैसले लेती है, उस पर जातियों के हिसाब से वोट बैंक की छाप दिखती है। कुल मिलाकर बिहार की सियासत में अटल सत्य सिर्फ जाति है।
डिप्टी सीएम चुनने में था आराम
बिहार में जब दो डिप्टी सीएम चुनने थे तो बीजेपी की राह आसान थी। नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री के रूप में एनडीए में सर्वमान्य थे। बिहार में 2024 में जब नीतीश कुमार ने महागठबंधन का साथ छोड़ा तो बीजेपी ने चुनावी माहौल देख दो डिप्टी सीएम दिए। एक कुशवाहा समाज से सम्राट चौधरी और दूसरे भूमिहार समाज से विजय कुमार सिन्हा। चुनाव में बंपर जीत के बाद भी बीजेपी ने फॉर्मूला नहीं बदला। दरअसल, पार्टी को पता था कि ऐसे ही बिहार में जातीय समीकरणों को साधा जा सकता है।
सीएम तो होगा, पर किस जाति का?
अब बीजेपी के सामने सबसे बड़ी मुश्किल है। अब मुख्यमंत्री एक ही बनेगा, लेकिन किस जाति का। यही बीजेपी के सामने बड़ा पेच है। यूपी में भी जाति की सियासत है, लेकिन वहां जात न पूछो साधु की तर्ज पर योगी आदित्यनाथ को सीएम बनाने में बीजेपी को परेशानी नहीं आई। बिहार में बीजेपी के पास कोई 'साधु' नहीं है। ऊपर से दिक्कत है कि बीजेपी लाख कहे, मगर बिहार में कोई एक चेहरा नहीं है, जिस पर पार्टी नेताओं से कार्यकर्ताओं तक दिल की एक राय बन पाए। पॉलिटिकल एक्सपर्ट डॉ. संजय कुमार का कहना है कि बिहार राजनीति की फैक्ट्री कही जाती है। यहां समीकरण दिखते आसान हैं, लेकिन जमीन पर उन्हें उतारना बड़ा मुश्किल होता है।
एक को बनाया तो दूसरा रूठेगा
बड़ी बात यहै कि बीजेपी ने पारंपरिक वोट बैंक सवर्ण में से मुख्यमंत्री चुना तो उसके दलित और ओबीसी वोट बैंक को पाले में करने की योजना पर पलीता लग जाएगा। बीजेपी की राजनीति दलित और ओबीसी की धुरी पर घूम रही है। दूसरी तरफ बीजेपी सवर्णों को छोड़कर दलित, अतिपिछड़ा या ओबीसी से मुख्यमंत्री का चेहरा लाती है तो सवर्ण वोट बैंक दरकने की संभावना है। वैसे भी यूजीसी एक्ट को लेकर सवर्ण पहले से भाजपा की लानत मलामत करने में कसर नहीं छोड़ रहे।