CEC Gyanesh Kumar: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव खारिज: दोनों सदनों के स्पीकर का बड़ा फैसला, 193 सांसदों ने दिया था नोटिस, जानें विपक्ष ने क्यों लगाए थे आरोप

CEC Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लोकसभा और राज्यसभा में लाया गया महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो गया है। 193 विपक्षी सांसदों ने SIR विवाद को लेकर यह नोटिस दिया था।

Update: 2026-04-07 06:03 GMT

CEC Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ लाया गया महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो गया है। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने विपक्ष के इस नोटिस को अस्वीकार कर दिया है। देश के संसदीय इतिहास में यह पहला मौका था जब किसी मौजूदा चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए 193 सांसदों ने एक साथ नोटिस सौंपा था।

लोकसभा और राज्यसभा में प्रस्ताव नामंजूर

राज्यसभा के महासचिव पीसी मोदी ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया कि उच्च सदन के सभापति ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ विपक्षी सदस्यों द्वारा दिए गए नोटिस को खारिज कर दिया है। इसी तरह लोकसभा सचिवालय ने भी स्पष्ट किया है कि अध्यक्ष ने 130 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित नोटिस का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करने के बाद इसे अस्वीकार कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति दोनों ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह अहम फैसला लिया।

12 मार्च को लाया गया था 10 पेज का नोटिस

विपक्षी दलों ने 12 मार्च 2026 को यह प्रस्ताव पेश किया था। इस प्रस्ताव पर लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे। विपक्ष ने अपने 10 पेज के विस्तृत नोटिस में मुख्य चुनाव आयुक्त पर कार्यपालिका के प्रति आज्ञाकारी होने और संवैधानिक पद व शक्तियों के जानबूझकर दुरुपयोग करने के गंभीर आरोप लगाए थे।

एसआईआर (SIR) को लेकर शुरू हुआ था विवाद

यह पूरा सियासी विवाद एसआईआर (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा है। विपक्षी दलों का लगातार आरोप रहा है कि इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य उनके समर्थकों को मतदान के अधिकार से वंचित करना है। इसी विरोध के चलते विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उन्हें पद से हटाने की मांग तेज कर दी थी।

संविधान और कानून के तहत लिया गया फैसला

लोकसभा सचिवालय के अनुसार यह नोटिस संविधान के अनुच्छेद 324(5), मुख्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम 2023 की धारा 11(2) और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के तहत सौंपा गया था। सभी प्रासंगिक पहलुओं और संवैधानिक मुद्दों पर गहन विचार विमर्श के बाद दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने इस महाभियोग प्रस्ताव को अमान्य करार दिया है।

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