अवैध संबंध से मां बनी पत्नी, फिर पहुंची अदालत: हाई कोर्ट ने कहा: मर्दों की भी गरिमा होती है

High Court News: पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते के बीच वो की एंट्री हो गई। पत्नी ने प्रेमी के बच्चे को जन्म दिया। बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र में कानूनी पति के बजाय प्रेमी का नाम दर्ज कराने पत्नी और प्रेमी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

Update: 2026-03-05 08:28 GMT

फोटो सोर्स- इंटरनेट, एडिट, npg.news

कोच्चि 05 मार्च 2026, पति-पत्नी के पवित्र रिश्ते के बीच वो की एंट्री हो गई। पत्नी ने प्रेमी के बच्चे को जन्म दिया। बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र में कानूनी पति के बजाय प्रेमी का नाम दर्ज कराने पत्नी और प्रेमी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद केरल हाई कोर्ट ने बर्थ सर्टिफिकेट में कानूनी पति की जगह पत्नी के प्रेमी का नाम बच्ची के पिता के रूप में दर्ज करने की अनुमति दी है।

याचिका की सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, पुरुषों की भी गरिमा और आत्म ससम्मान होता है। पत्नी के धोखे के मामलों में समाज को उनके साथ भी खड़ा होना बाहिए।

पुरुषों के अधिकारों की पैरवी करते हुए केरल हाई कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि पुरुषों की भी अपनी गरिमा, गर्व, आत्म सम्मान और एक सामाजिक पहचान होती है।

कोर्ट ने यह टिप्पणी एक विवाहित महिला और उसके प्रेमी को उनके रिश्ते से पैदा हुई बच्ची के बर्थ सर्टिफिकेट में पिता का नाम बदलने की अनुमति देते हुए की। कोर्ट ने बच्ची के जैविक पिता का नाम, महिला के कानूनी पति के नाम की जगह दर्ज करने का आदेश दिया है।

हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

याचिका की सुनवाई सिंगल बेंच में हुई। कोर्ट ने कहा, यह उस व्यक्ति की दुखद कहानी है,जिसकी पत्नी ने वैवाहिक जीवन में रहते हुए किसी अन्य पुरुष के साथ संबंध में रही और एक बच्ची को जन्म दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में समाज के दोहरे रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा, आमतौर पर अगर किसी पति के किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध होते हैं, तो पत्नी तथा उसके रिश्तेदारों द्वारा उस व्यक्ति को हर संभव तरीके से अपमानित किया जाता है। बेशक, ऐसे मामलों में पत्नी की शिकायतें जायज हो सकती हैं और पति इसका हकदार भी हो सकता है। कोर्ट ने है, मेरी राय में अगर, ऐसी स्थिति में (जब पत्नी गलत हो), तो समाज को पुरुषों के साथ भी खड़ा होना चाहिए, क्योंकि उनकी भी गरिमा, गर्व, आत्मसम्मान और सामाजिक पहचान होती है।

कोर्ट ने कहा, हमारी संस्कृति में वैवाहिक निष्ठा का बहुत महत्व है। ऐसे में, जब कोई पत्नी ऐसा कदम उठाती है, तो पति सार्वजनिक रूप से खुद को अपमानित महसूस कर सकता है, मानो उसके पौरुष और प्रतिष्ठा का मज़ाक उड़ाया गया हो।

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता महिला की पहली शादी से एक बेटा है। उसका पति बेंगलुरु में एकाउंटेंट का काम करता है। पत्नी का आरोप है, पति परिवार की ठीक से देखभाल नहीं कर रहा था और उसकी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहा था।

आपसी सहमति से ले लिया तलाक

वैवाहिक रिश्तों में रहने के दौरान महिला ने एक अन्य पुरुष के साथ संबंध बनाए, जिससे एक बच्ची का जन्म हुआ। हालांकि, बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र पर कानूनी पति का नाम ही पिता के तौर पर दर्ज किया गया और बच्ची उसी के साथ रहने लगी।

जब सच्चाई सामने आई और पति ने बच्ची के जैविक पिता होने से इंकार किया, तो विवाद की स्थिति बनी और दोनों के संबंध में दूरी भी बढ़ी। इसके बाद महिला घर छोड़कर चली गई और बाद में पति-पत्नी ने आपसी सहमति से तलाक ले लिया।

बर्थ सर्टिफिकेट में नाम के लिए पहुंचे हाई कोर्ट

तलाक के बाद, बच्ची की मां और उसका प्रेमी त्रिशूर नगर निगम गए, ताकि बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र पर असली पिता (प्रेमी) का नाम दर्ज कराया जा सके। नगर निगम ने उनका अनुरोध खारिज कर दिया। इसके बाद मां और प्रेमी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बच्ची के पिता के रूप में नाम दर्ज कराने की गुहार लगाई।

पहले पति के व्यवहार की कोर्ट ने की सराहना

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया, यह जानने के बावजूद, बच्ची का पिता कोई और है, पहले पति ने कभी बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र से अपना नाम हटाने के लिए कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने इसे पहले पति का 'सज्जनतापूर्ण व्यवहार' और बच्ची के प्रति उसका गहरा लगाव बताया।

हाई कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, नाबालिग बच्ची के भविष्य को देखते हुए इस याचिका को खारिज नहीं कर सकते। कोर्ट नहीं चाहता कि बालिग होने पर बच्ची को किसी तरह की कानूनी या सामाजिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़े। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ बच्ची के जन्म प्रमाण पत्र में पिता के नाम को सुधारने की अनुमति दे दी।

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