Bilaspur High Court: पैनल लॉयर: अब फैमिली कोर्ट में रहेगा वकीलों का पैनल, हाई कोर्ट ने प्रदेशभर के फैमिली कोर्ट के लिए जारी किया आदेश
Bilaspur High Court: तलाक के एक मामले की सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी फैमिली कोर्ट के लिए निर्देश जारी किया है। अब सभी फैमिली कोर्ट को अपना खुद का वकीलों का पैनल रखना होगा। जरुरमंद लोगों को नि:शुल्क कानूनी सेवा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
Bilaspur High Court: बिलासपुर। तलाक के एक मामले की सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी फैमिली कोर्ट के लिए निर्देश जारी किया है। अब सभी फैमिली कोर्ट को अपना खुद का वकीलों का पैनल रखना होगा। जरुरमंद लोगों को नि:शुल्क कानूनी सेवा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि जरुरतमंद द्वारा लिखित आवेदन का इंतजार किए बिना मौखिक रूप से मांगी जाने वाली मदद पर तत्काल वकील उपलब्ध कराएं।
परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर जस्टिस संजय के अग्रवाल व जस्टिस संजय कुमार जायसवाल के डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता महिला ने बताया कि फैमिली कोर्ट से अनुरोध किया था कि वह बार-बार ओड़िशा से जांजगीर नहीं आ सकती। आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए अधिवक्ता उपलब्ध कराने की मांग फैमिली कोर्ट से की थी। तब कोर्ट ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष आवेदन पेश करने की बात कह दी थी। समयाभाव और आर्थिक तंगी की वजह से वह पेशी में उपस्थित नहीं हो पाई। अधिवक्ता ना होने के कारण कोर्ट को इसकी जानकारी भी नहीं लग पाई। कोर्ट ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी है।
याचिकाकर्ता महिला की बातों को सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने कहा है कि अगर कोई पक्षकार खासकर महिलाएं या आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष वकील करने में असमर्थ है, तो ऐसी परिस्थिति में फैमिली कोर्ट की जिम्मेदारी बनती है कि आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराए। डिवीजन बेंच ने कहा, फैमिली कोर्ट की जिम्मेदारी केवल मामले निपटाना नहीं, बल्कि महिलाओं और बच्चों को न्याय तक सार्थक पहुंच सुनिश्चित करना है। हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, कानूनी सहायता के लिए लिखित आवेदन अनिवार्य नहीं है; मौखिक रूप से निवेदन करने पर भी कोर्ट को मदद करनी चाहिए। वकील न देना संविधान के अनुच्छेद 2, जीवन और स्वतंत्रता केअधिकार का सीधा-सीधा उल्लंघन है।
इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ फैमिली कोर्ट रूल्स, 2007 के नियम 14 के तहत हर कोर्ट को वकीलों का एक पैनल रखना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर जरुरतमंदों को तत्काल मदद दी जा सके। डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट द्वारा जारी तलाक की डिक्री को रद्द करते हुए मामला दोबारा फैमिली कोर्ट को भेज दिया है। फैमिली कोर्ट ने काे नए सिरे से मामले की सुनवाई का आदेश दिया है।
इस फैसले के साथ ही डिवीजन बेंच ने प्रदेशभर के फैमिली कोर्ट के लिए गाइड लाइन जारी करते हुए सभी फैमिली कोर्ट में वकीलों का अपना अलग पैनल रखने का निर्देश दिया है। जरुरतमंदों को अधिवक्ता कानूनी सहायता पहुंचाएंगे। अधिवक्ताओं की फीस राज्य सरकार द्वारा दी जाएगी।तलाक के एक मामले की सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी फैमिली कोर्ट के लिए निर्देश जारी किया है। अब सभी फैमिली कोर्ट को अपना खुद का वकीलों का पैनल रखना होगा। जरुरमंद लोगों को नि:शुल्क कानूनी सेवा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है।
बिलासपुर। तलाक के एक मामले की सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाई कोर्ट ने प्रदेश के सभी फैमिली कोर्ट के लिए निर्देश जारी किया है। अब सभी फैमिली कोर्ट को अपना खुद का वकीलों का पैनल रखना होगा। जरुरमंद लोगों को नि:शुल्क कानूनी सेवा उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने साफ कहा कि जरुरतमंद द्वारा लिखित आवेदन का इंतजार किए बिना मौखिक रूप से मांगी जाने वाली मदद पर तत्काल वकील उपलब्ध कराएं।
परिवार न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर जस्टिस संजय के अग्रवाल व जस्टिस संजय कुमार जायसवाल के डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता महिला ने बताया कि फैमिली कोर्ट से अनुरोध किया था कि वह बार-बार ओड़िशा से जांजगीर नहीं आ सकती। आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए अधिवक्ता उपलब्ध कराने की मांग फैमिली कोर्ट से की थी। तब कोर्ट ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के समक्ष आवेदन पेश करने की बात कह दी थी। समयाभाव और आर्थिक तंगी की वजह से वह पेशी में उपस्थित नहीं हो पाई। अधिवक्ता ना होने के कारण कोर्ट को इसकी जानकारी भी नहीं लग पाई। कोर्ट ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए तलाक की डिक्री पारित कर दी है।
याचिकाकर्ता महिला की बातों को सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने कहा है कि अगर कोई पक्षकार खासकर महिलाएं या आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष वकील करने में असमर्थ है, तो ऐसी परिस्थिति में फैमिली कोर्ट की जिम्मेदारी बनती है कि आर्थिक रूप से कमजोर पक्ष को तत्काल कानूनी सहायता उपलब्ध कराए। डिवीजन बेंच ने कहा, फैमिली कोर्ट की जिम्मेदारी केवल मामले निपटाना नहीं, बल्कि महिलाओं और बच्चों को न्याय तक सार्थक पहुंच सुनिश्चित करना है। हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट के रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, कानूनी सहायता के लिए लिखित आवेदन अनिवार्य नहीं है; मौखिक रूप से निवेदन करने पर भी कोर्ट को मदद करनी चाहिए। वकील न देना संविधान के अनुच्छेद 2, जीवन और स्वतंत्रता केअधिकार का सीधा-सीधा उल्लंघन है।
इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ फैमिली कोर्ट रूल्स, 2007 के नियम 14 के तहत हर कोर्ट को वकीलों का एक पैनल रखना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर जरुरतमंदों को तत्काल मदद दी जा सके। डिवीजन बेंच ने फैमिली कोर्ट द्वारा जारी तलाक की डिक्री को रद्द करते हुए मामला दोबारा फैमिली कोर्ट को भेज दिया है। फैमिली कोर्ट ने काे नए सिरे से मामले की सुनवाई का आदेश दिया है।
इस फैसले के साथ ही डिवीजन बेंच ने प्रदेशभर के फैमिली कोर्ट के लिए गाइड लाइन जारी करते हुए सभी फैमिली कोर्ट में वकीलों का अपना अलग पैनल रखने का निर्देश दिया है। जरुरतमंदों को अधिवक्ता कानूनी सहायता पहुंचाएंगे। अधिवक्ताओं की फीस राज्य सरकार द्वारा दी जाएगी।