Bilaspur High Court: हाई कोर्ट ने शासकीय सेवक के खिलाफ विभागीय जांच के निर्देश पर लगाई रोक, कहा- रेवेन्यू बोर्ड को शासकीय सेवक के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करने.....

Bilaspur High Court: हाई कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, रेवेन्यू बोर्ड को अपील पर सुनवाई के दौरान किसी शासकीय सेवक के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करने और विभागीय जांच का निर्देश देने का अधिकार नहीं है। एक पटवारी की याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने रेवेन्यू बोर्ड के विभागीय जांच संबंधी आदेश पर रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मतीन सिद्धीकी व अधिवक्ता सिबाशिष मिश्रा ने पैरवी की।

Update: 2026-01-10 08:56 GMT

Bilaspur High Court: बिलासपुर। हाई कोर्ट ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, रेवेन्यू बोर्ड को अपील पर सुनवाई के दौरान किसी शासकीय सेवक के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करने और विभागीय जांच का निर्देश देने का अधिकार नहीं है। एक पटवारी की याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने रेवेन्यू बोर्ड के विभागीय जांच संबंधी आदेश पर रोक लगा दी है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता मतीन सिद्धीकी ने कोर्ट को बताया कि रेवेन्यू बोर्ड को पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र में रहते हुए इस प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणी करने अथवा विभागीय कार्यवाही निर्देशित करने का अधिकार नहीं है।

पटवारी सच्चिदानंद साहू के खिलाफ नामांतरण के एक प्रकरण में पेश की गई अपील पर सुनवाई करते हुए रेवेन्यू बोर्ड ने प्रतिकूल टिप्पणी करते हुए विभागीय जांच का निर्देश दिया है। रेवेन्यू बोर्ड के आदेश को चुनौती देते हुए पअवारी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। रेवेन्यू बोर्ड के आदेश पर रोक लगाते हुए हाई कोर्ट ने राज्य शासन, सिकरेट्री व बोर्ड ऑफ रेवेन्यू, आयुक्त राजस्व बिलासपुर संभाग, कलेक्टर रायगढ़, अनुविभागीय अधिकारी राजस्व रायगढ़ एवं तहसीलदार पुसौर को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

यह है मामला

याचिकाकर्ता सच्चिदानंद साहू को 02 नवंबर 2015 को पटवारी के पद पर नियुक्त किया गया था। तहसील पुसौर, जिला रायगढ़ में पदस्थ थे। 12 अक्टूबर 2020 को पंचनामा तैयार कर 26 अक्टूबर 2020 को जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया था, जो ग्राम पुसौर स्थित खसरा नंबर 16 2 बी, रकबा 0.121 हेक्टेयर से संबंधित था। स्थल निरीक्षण के दौरान ग्राम कोटवार तथा ग्रामवासियों की उपस्थिति में प्रतिवेदन तैयार किया गया था, जिसके आधार पर तहसीलदार पुसौर ने 28 अक्टूबर 2020 को नामांतरण आदेश पारित किया। उक्त भूमि को लेकर बाद में पक्षकारों के मध्य दीवानी एवं राजस्व विवाद उत्पन्न हुआ। जिसके संबंध में सिविल न्यायालय, एसडीएम कोर्ट, अतिरिक्त आयुक्त तथा बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के समक्ष मामले की सुनवाई हुई।

मामले की सुनवाई के दौरान राजस्व बोर्ड ने तहसीलदार द्वारा जारी नामांतरण आदेश को निरस्त कर दिया। रेवेन्यू बोर्ड ने तहसीलदार एवं पटवारी के विरुद्ध तल्ख टिप्पणी करते हुए विभागीय जांच का निर्देश जारी किया था। रेवेन्यू बोर्ड के फैसले को चुनौती देते हुए सच्चिदानंद साहू ने अधिवक्ता अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी एवं सिबाशिष मिश्रा के माध्यम से हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।

मामले की सुनवाई जस्टिस पीपी साहू के सिंगल बेंच में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता मतीन सिद्धीकी ने कहा कि रेवेन्यू बोर्ड ने फैसला सुनाने से पहले याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना प्रतिकूल टिप्पणियां एवं विभागीय जांच के निर्देश देना विधि विरुद्ध है। अधिवक्ता सिद्धीकी ने कहा कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू को पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र में रहते हुए प्रतिकूल टिप्पणी करने अथवा विभागीय कार्यवाही निर्देशित करने का अधिकार नहीं है। अधिवक्ता के तर्कों से सहमति जताते हुए कोर्ट ने रेवेन्यू बोर्ड द्वारा जारी विभागयी जांच के निर्देश पर रोक लगा दी है।

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