Bilaspur High Court: चुनाव याचिका में राजनीतिक दलों काे नहीं बना सकते पक्षकार, विधायक के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका पर हाई कोर्ट ने दी व्यवस्था

Bilaspur High Court: जैजैपुर के कांग्रेस विधायक बालेश्वर साहू के खिलाफ दायर चुनाव याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। जस्टिस एन. के चंद्रवंशी ने कहा कि चुनाव याचिकाओं में राजनीतिक दलों को पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। याचिकाकर्ताओं काे एक सप्ताह के भीतर राजनीतिक दलों के नाम को पक्षकारों की सूची से हटाने का निर्देश दिया है। चुनाव याचिका की अगली सुनवाई के लिए कोर्ट ने 20 जनवरी की तिथि तय कर दी है।

Update: 2026-01-10 08:08 GMT

Bilaspur High Court: बिलासपुर।जैजैपुर के कांग्रेस विधायक बालेश्वर साहू के खिलाफ दायर चुनाव याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। जस्टिस एन. के चंद्रवंशी ने कहा कि चुनाव याचिकाओं में राजनीतिक दलों को पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। याचिकाकर्ताओं काे एक सप्ताह के भीतर राजनीतिक दलों के नाम को पक्षकारों की सूची से हटाने का निर्देश दिया है।जैजैपुर के कांग्रेस विधायक बालेश्वर साहू के खिलाफ दायर चुनाव याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। जस्टिस एन. के चंद्रवंशी  ने कहा कि चुनाव याचिकाओं में राजनीतिक दलों को पक्षकार नहीं बनाया जा सकता। याचिकाकर्ताओं काे एक सप्ताह के भीतर राजनीतिक दलों के नाम को पक्षकारों की सूची से हटाने का निर्देश दिया है।

जैजैपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक बालेश्वर साहू के खिलाफ सरोज कुमार चंद्रा व अन्य ने चुनाव याचिका दायर की है। दायर याचिका में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी व प्रदेश कांग्रेस कमेटी को पक्षकार बनाया है। एआईसीसी व पीसीसी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता संदीप दुबे ने कोर्ट को बताया कि चुनाव याचिकाओं में राजनीतिक दलों को पक्षकार बनाने का कोई नियम नहीं है। अधिवक्ता दुबे ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए चुनाव याचिका से अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नाम को पक्षकार की सूची से हटाने की मांग की।

अधिवक्ता संदीप दुबे ने कहा कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 82 में यह निर्दिष्ट है कि चुनाव याचिकाओं में कौन-कौन से पक्षकार आवश्यक हैं। इसमें राजनीतिक दलों को चुनाव याचिकाओं में पक्षकार के रूप में शामिल करने का प्रावधान नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने इन याचिकाओं को नियमों के अनुपालन न होने के आधार पर दायर किया है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य (2019) 3 एससीसी 224 मामले में जारी निर्देशों का हवाला देते हुए अधिवता संदीप दुबे ने कहा कि उपर्युक्त मामले में या किसी अन्य मामले में भी, सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं माना है कि कोई राजनीतिक दल चुनाव याचिका का अनिवार्य पक्षकार होगा। रामबाबू सिंह ठाकुर बनाम सुनील अरोरा और अन्य (2020) 3 एससीसी 733 मामले में,सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि किसी उम्मीदवार के आपराधिक इतिहास का खुलासा न करना सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना ​​होगी। लेकिन केवल इसी आधार पर किसी राजनीतिक दल को अनिवार्य पक्षकार नहीं माना जा सकता। जैजैपुर विधायक बालोश्वर साहू की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव श्रीवास्तव ने अधिवक्ता संदीप दुबे द्वारा दिए गए तर्कों का समर्थन किया।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन (उपरोक्त) मामले में जारी निर्देशों का पालन राजनीतिक दलों को भी करना था और इनका पालन न करना भ्रष्टाचार का अपराध माना जाएगा। अधिवक्ताओं ने कृष्णमूर्ति बनाम शिवकुमार और अन्य (2015) 3 एससीसी 467 मामलों का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।

मामले की सुनवाई जस्टिस एनके चंद्रवंशी के सिंगल बेंच में हुई। जस्टिस चंद्रवंशी ने अपने फैसले में कहा है, भारतीय जनवादी अधिनियम, 1951 की धारा 82 में यह स्पष्ट प्रावधान है कि चुनाव याचिका में प्रतिवादी के रूप में कौन शामिल होगा। भारतीय जनवादी अधिनियम, 1951 की धारा 82 में यह स्पष्ट है कि जहां याचिकाकर्ता, सभी या किसी भी निर्वाचित उम्मीदवार के चुनाव को अमान्य घोषित करने के अलावा, यह घोषणा भी चाहता है कि वह स्वयं या कोई अन्य उम्मीदवार विधिवत निर्वाचित हुआ है, तो याचिकाकर्ता के अलावा सभी चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार; और जहां ऐसी कोई अतिरिक्त घोषणा नहीं मांगी जाती है, तो सभी निर्वाचित उम्मीदवार;कोई अन्य उम्मीदवार जिसके खिलाफ याचिका में किसी प्रकार के भ्रष्ट आचरण के आरोप लगाए गए हों।

उपरोक्त प्रावधान का सरसरी तौर पर अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि प्रतिवादी उम्मीदवारों के राजनीतिक दलों को पक्षकार के रूप में शामिल किए जाने का प्रावधान नहीं किया गया है।

पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 116 में विभिन्न निर्देश जारी किए हैं और राजनीतिक दलों द्वारा चयनित उम्मीदवारों के आपराधिक इतिहास को लेकर भी गहरी चिंता व्यक्त की है। हालांकि उपरोक्त निर्देशों का पालन किया जाना चाहिए था।

राजनीतिक दलों के संबंध में और रामबाबू सिंह ठाकुर (उपरोक्त) के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा है कि राजनीतिक दलों द्वारा उपरोक्त का अनुपालन न करना सुप्रीम कोर्ट के आदेशों, निर्देशों की अवमानना ​​के समान हो सकता है, लेकिन याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता इस अदालत को सुप्रीम कोर्ट का ऐसा कोई निर्णय नहीं बता सके जिसमें यह कहा गया हो कि राजनीतिक दल चुनाव याचिकाओं में आवश्यक पक्षकार होंगे। इसलिए, आर.पी. अधिनियम, 1951 की धारा 82 के प्रावधान पर विचार करते हुए और चूंकि चुनाव याचिकाओं में राजनीतिक दल को आवश्यक पक्षकार बनाने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का कोई विशिष्ट निर्णय नहीं है, इसलिए न्यायालय दोनों मामलों में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए याचिका से पक्षकारों से सूची से नाम हटाने निर्देश दिया जाता है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अपनी याचिकाओं से पक्षकारों के रूप में शामिल किए गए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी और प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नाम हटा दें। इसके लिए याचिकाकर्ताओं को कोर्ट ने एक सप्ताह का समय दिया है। चुनाव याचिका की अगली सुनवाई के लिए कोर्ट ने 20 जनवरी की तिथि तय कर दी है।

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