Bilaspur High Court: CGMSC पर हाई कोर्ट ने ठोका जुर्माना: निविदा में भारी गड़बड़ी का आरोप, हाई कोर्ट ने जताई नाराजगी....

Bilaspur High Court: विवादों से घिरे CGMSC के अफसरों की कार्यप्रणाली को लेकर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने जमकर फटकार लगाई है।

Update: 2026-02-06 07:32 GMT

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06 फरवरी 2026|बिलासपुर। विवादों से घिरे CGMSC के अफसरों की कार्यप्रणाली को लेकर हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच ने जमकर फटकार लगाई है। सीजीएमएससी के अफसरों ने ठेके में इस बार गड़बड़ी की है। निविदा जारी करते समय कम रेट वाले ठेकेदार के बजाय अधिक रेट वाले टेंडर को अनुमति दे दी। मामले की सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने बतौर क्षतिपूर्ति याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश सीजमीएससी को दिया है।

छत्तीसगढ़ राज्य चिकित्सा सेवा निगम लिमिटेड ने 23 सितंबर.2025 को "जिला जशपुर के पत्थलगांव ब्लॉक में प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्र से 50 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण, जिसमें आंतरिक जल आपूर्ति, स्वच्छता फिटिंग और विद्युतीकरण कार्य शामिल हैं" के कार्य के लिए ई-निविदा आमंत्रित की। अनुमानित परियोजना लागत ₹400.98 लाख थी। निविदा जमा करने की अवधि 30 सितंबर 2025 को शाम 5:30 बजे से शुरू हुई और 23.अक्टूबर.2025 को शाम 5:30 बजे समाप्त हुई। निविदाएंखोलने की निर्धारित तिथि 24 अक्टूबर 2025 थी। याचिकाकर्ता ने निविदा की शर्तों और नियमों का पूर्णतया पालन करते हुए, सभी आवश्यक दस्तावेजों, प्रमाण पत्रों और पात्रता प्रमाण पत्रों के साथ 13 अक्टूबर 2025 को अपनी निविदा विधिवत जमा की। याचिकाकर्ता ने अनुमानित लागत से 9.9% कम बोली लगाई, जिससे उसने राज्य को सबसे प्रतिस्पर्धी और आर्थिक रूप से लाभप्रद बोली की पेशकश की।

सीजीएमससी के इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए दुर्गा मेडिकल, घरघोड़ा जिला रायगढ़ निवासी नटवर लाल अग्रवाल ने अपने अधिवक्ता आशुतोष मिश्रा के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने उसकी बोली को अयोग्य घोषित करने और 23 सितंबर 2025 के तहत अनुबंध हितेश सूर्यवाणी को प्रदान करने के संबंध में सीजीएमसी की कार्रवाई को रद्द करने की मांग की थी। याचिका के अनुसार वह बी-श्रेणी का पंजीकृत सिविल ठेकेदार है, जो सार्वजनिक सहयोग के माध्यम से सरकारी निर्माण कार्य करते आ रहे हैं।

निविदा खोलने में की गड़बड़ी

05 जनवरी 2026 को लगभग 17:14:14 बजे, जब वित्तीय बोलियां खोली गईं, तो पोर्टल पर यह प्रदर्शित हुआ कि हितेश सूर्यवंशी को 9.2200% कम बोली दर के साथ सबसे कम बोलीदाता घोषित किया गया, जबकि उसने 9.9% कम बोली लगाई थी, जो सरकार के लिए कम और अधिक लाभकारी थी। उसे यह जानकर गहरा सदमा और आश्चर्य हुआ कि सबसे कम बोलीदाता होने के बावजूद याचिकाकर्ता की वित्तीय बोली कभी खोली ही नहीं गई थी। याचिका के अनुसार 05.जनवरी 2026 को शाम लगभग 05:40 बजे, उसे सीजीएससी व स्वास्थ्य विभाग की ओर से एक ईमेल प्राप्त हुआ जिसमें कहा गया था कि बोलीदाता द्वारा स्पष्टीकरण नहीं दिए जाने का हवाला देते हुए उसकी बोली को इस अस्पष्ट और भ्रामक आधार पर अयोग्य/अस्वीकृत करने की जानकारी दी गई।

विभाग भी एक और दस्तावेज भी समान, फिर किस आधार पर किया रद्द?

याचिकाकर्ता ने बताया कि उसी विभाग के एक अन्य निविदा में भी उसने भाग लिया था, जो रायगढ़ जिले के 100 बिस्तरों वाले एमसीएच भवन में स्टाफ क्वार्टर के निर्माण कार्य के लिए थी। यह निविदा उसी तिथि, 13 अक्टूबर 2025 को प्रस्तुत की गई थी, जिसमें उसने दस्तावेजों, प्रमाण पत्रों और पात्रता संबंधी समान प्रमाण पत्रों का उपयोग किया था। उक्त निविदा में उसकी बोली तकनीकी रूप से वैध पाई गई, उसकी वित्तीय बोली खोली गई और उसे अयोग्य घोषित नहीं किया गया, जिससे यह स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि उसके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज पूर्ण, वैध और निविदा की शर्तों के अनुरूप थे।

उसे अवैध रूप से बाहर किए जाने के कारण, विभागीय अफसरों ने अनुबंध एक उच्च बोलीदाता को दे दिया है, जिससे सार्वजनिक खजाने को प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान हुआ है, निविदा जमा करने वाले को अनुचित लाभ हुआ है और उसे गंभीर हानि हुई है।

सबसे कम बोली लगाने वाले वैध बोलीदाता को बाहर करना और उससे अधिक बोली लगाने वाले को काम सौंपना सार्वजनिक अनुबंधों को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत के स्पष्ट रूप से विपरीत है। यह विवादित कार्रवाई स्पष्ट रूप से विवेकहीन, मनमानी और पक्षपातपूर्ण है, जिसके लिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत इस न्यायालय द्वारा अपने असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए हस्तक्षेप करना आवश्यक है।

हाई कोर्ट ने कहा, समान अवसर के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन है

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल ने अपने फैसले में कहा है, यह सर्वविदित कानून है कि यद्यपि निविदा मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है और न्यायालय प्रशासनिक निर्णयों पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में कार्य नहीं करता है, फिर भी न्यायालय निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच करने के लिए बाध्य है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि यह मनमानी, दुर्भावना, भेदभाव और प्रक्रियात्मक अनियमितताओं से मुक्त है। वर्तमान मामले में, जिस प्रकार से याचिकाकर्ता को विचार से बाहर रखा गया है, वह सार्वजनिक खरीद में निष्पक्षता के सिद्धांतों और समान अवसर के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन दर्शाता है।

डिवीजन बेंच ने जनहित का रखा ध्यान

डिवीजन बेंच ने कहा, यह न्यायालय इस तथ्य से अवगत है कि निविदा के अनुसार अनुबंध पहले ही दिया जा चुका है और यह कार्य अभी क्रियान्वित होने की स्थिति में है। इस स्तर पर निविदा प्रक्रिया या दिए गए अनुबंध को रद्द करके हस्तक्षेप करना व्यापक जनहित में नहीं होगा और इससे सार्वजनिक कार्यों के निष्पादन में और अधिक जटिलताएं और देरी हो सकती है। अतः न्यायालय याचिकाकर्ता के लिए न्याय और जनहित के परस्पर विरोधी हितों को संतुलित करते हुए राहत प्रदान करना उचित समझता है।

CGMSC ने किया मनमाना और अनुचित व्यवहार

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, न्यायालय का यह मत है कि याचिकाकर्ता के साथ सीजीएमएससी द्वारा मनमाना और अनुचित व्यवहार किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप उसे वित्तीय बोली में भाग लेने का उचित अवसर नहीं मिला और उसे नुकसान हुआ है। इस प्रकार के अनुचित बहिष्कार के लिए क्षतिपूर्ति का प्रावधान है। रिट याचिका का निपटारा करते हुए, सीजीएमएससी को याचिकाकर्ता को मुआवजे के रूप में 1,00,000/- रुपये (एक लाख रुपये मात्र) का भुगतान करने का निर्देश दिया जाता है। उक्त राशि का भुगतान इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत किए जाने की तिथि से चार सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाएगा। भुगतान में चूक होने की स्थिति में, निर्धारित अवधि की समाप्ति तिथि से वास्तविक भुगतान तक 6% प्रति वर्ष की दर से ब्याज लगेगा।

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