हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: मध्यस्थता अवार्ड की प्रति पक्षकार को देना आवश्यक है, अगर ऐसा नहीं किया गया है तो यह प्रावधानों के विपरीत है...
Bilaspur High Court: मध्यस्थता के बाद पारित कि गए अवार्ड को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यदि हस्ताक्षरित मध्यस्थता अवार्ड की प्रति पक्षकार को स्वयं नहीं दी जाती है, तो यह मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 31(5) के प्रावधानों का अनुपालन नहीं माना जाएगा।
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बिलासपुर। 1 March 2026|मध्यस्थता के बाद पारित कि गए अवार्ड को लेकर बिलासपुर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, यदि हस्ताक्षरित मध्यस्थता अवार्ड की प्रति पक्षकार को स्वयं नहीं दी जाती है, तो यह मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 31(5) के प्रावधानों का अनुपालन नहीं माना जाएगा। लिहाजा धारा 34(3) के तहत 90 दिनों की सीमा उस तारीख से गिनी जाएगी जिस दिन पक्षकार को अवार्ड की हस्ताक्षरित प्रति प्राप्त हुई थी। इस फैसले के साथ हाई कोर्ट ने दोबारा सुनवाई के लिए मामले को वापस जिला कोर्ट भेज दिया है।
मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के अंतर्गत यह अपील द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, दुर्ग द्वारा 05 नवंबर 2022 को पारित आदेश के विरुद्ध दायर की गई है, कोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत दायर आवेदन को समय सीमा के आधार पर खारिज कर दिया था और विलंब को माफ करने से इंकार करते हुए एकमात्र मध्यस्थ द्वारा 18 अगस्त 2016 को पारित अवार्ड की पुष्टि कर दी थी। इस फैसले को याचिकाकर्ता डीके भुइया ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता डीके भुइया ने 19 दिसंबर.2007 के समझौते के अनुसार प्रतिवादी, डेवलपर एके सिन्हा से "कंचनपुरम अपार्टमेंट" की दूसरी मंजिल पर स्थित फ्लैट संख्या 21 को कुल ₹16,50,000/- के विक्रय मूल्य पर खरीदा था। जिसका भुगतान चेक के माध्यम से किया गया था। बाद में, इंटीरियर, फर्नीचर, पुट्टी का काम आदि के कारण यह राशि बढ़कर ₹25,00,000/- हो गई।
याचिकाकर्ता के अनुसार, पूरी राशि प्राप्त करने के बावजूद, प्रतिवादी डेवलपर, वादे के अनुसार सुविधाएं प्रदान करने में विफल रहा और उसने फ्लैट को गंभीर निर्माण दोषों से ग्रस्त हालत में सौंप दिया, जिसमें अपर्याप्त फिनिशिंग कार्य, खराब लिफ्ट सुविधा आदि शामिल है। याचिकाकर्ता ने सेवा में कमी और अनुचित व्यापार व्यवहार का आरोप लगाते हुए 12 मार्च 2014 को दुर्ग स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम के समक्ष उपभोक्ता शिकायत दर्ज कराई थी।
उपभोक्ता फोरम के फैसला
जिला उपभोक्ता फोरम ने रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री का मूल्यांकन करने के बाद, 22.अगस्त 2015 के आदेश द्वारा शिकायत को स्वीकार कर लिया और अपीलकर्ता के पक्ष में ₹24,55,000/- का मुआवजा प्रदान करने का आदेश दिया। फैसले के खिलाफ डेवलपर ने राज्य उपभोक्ता आयोग में मामला दायर किया था। मामले की सुनवाई के बाद आयोग ने प्रकरण को तकनीकी निरीक्षण के लिए वापस भेज दिया। पुनर्विचार करने और निरीक्षण रिपोर्ट के आलोक में, जिला उपभोक्ता फोरम ने अपने पूर्व के फैसले को दोहरात हुए ₹4,55,000/- की समान राशि का मुआवजा प्रदान किया।
राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने सुनाया ऐसा फैसला
19 दिसंबर 2016 को प्रतिवादी डेवलपर ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील पेश कर दी। मामले की सुनवाई के बाद राज्य आयोग ने 22 अप्रैल 2017 को आंशिक रूप से अवार्ड को संशोधित करते हुए इसे घटाकर ₹3,23,000/- कर दिया। इस फैसले को चुनौती देते हुए डेवलपर ने राष्ट्रीय आयोग, नई दिल्ली के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर की। याचिकाकर्ता ने अपने वकील के माध्यम से आयोग को बताया, दोनों पक्षों के बीच ₹2,23,000/- की राशि पर सौहार्दपूर्ण समझौता हो गया था, और समझौते के अनुसार 06.फरवरी 2018 को कार्यवाही का अंतिम निपटारा कर दिया गया, जिससे दोनों पक्षों के बीच उपभोक्ता विवाद का अंत हो गया।
याचिकाकर्ता खरीदार का कहना है कि उपरोक्त कार्यवाही के बावजूद, 19 दिसंबर 2007 के उसी समझौते से उत्पन्न हुए विवादों को मध्यस्थता के लिए भेजा गया था, और एकमात्र मध्यस्थ ने एकतरफा कार्यवाही करते हुए 18 अगस्त 2016 को एक निर्णय पारित किया, जिसमें याचिकाकर्ता को प्रतिवादी/डेवलपर को 18% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित 4,03,000/- रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।
याचिकाकर्ताकर्ता का ऐसा दावा
याचिकाकर्ताकर्ता का दावा है कि अधिनियम, 1996 की धारा 31(5) के तहत निर्धारित तरीके से मध्यस्थता निर्णय की कोई हस्ताक्षरित प्रति उसे कभी नहीं दी गई और वह उक्त निर्णय से अनभिज्ञ रहा। उसके अनुसार, उसे निर्णय की जानकारी पहली बार प्राप्त हुई। 23.जुलाई 2019 को अधिनियम की धारा 36 के तहत प्रतिवादी द्वारा निष्पादन मामले में शुरू की गई निष्पादन कार्यवाही के दौरान इस जानकारी के प्राप्त होते ही, याचिकाकर्ता ने सद्भावनापूर्वक और जानकारी प्राप्त होने की तिथि से निर्धारित वैधानिक अवधि के भीतर, 07.सितंबर 2019 को अधिनियम, 1996 की धारा 34 के तहत एक आवेदन दायर किया। हालांकि, यह आवेदन गलती से लंबित निष्पादन कार्यवाही में दायर कर दिया गया, न कि एक स्वतंत्र आवेदन के रूप में।
बाद में, 21।दिसंबर 2021 को आवेदन वापस ले लिया गया, और उसके बाद 04 जनवरी.2022 को धारा 34 के तहत विधिवत रूप से गठित आवेदन, विलंब की क्षमा के लिए परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत एक आवेदन के साथ, सद्भावनापूर्ण परिस्थितियों को स्पष्ट करते हुए दायर किया गया। उक्त आवेदन को द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, दुर्ग ने विवादित आदेश द्वारा विलंब और लापरवाही के आधार पर खारिज कर दिया। अतः, वर्तमान अपील दायर की गई है।
हाई कोर्ट की टिप्पणी
मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34(3) में यह प्रावधान है कि मध्यस्थता निर्णय को रद्द करने के लिए आवेदन उस तिथि से तीन माह की समाप्ति के बाद नहीं किया जाएगा जिस तिथि से आवेदन करने वाले पक्ष को मध्यस्थता निर्णय प्राप्त हुआ था। इसके प्रावधान के तहत न्यायालय को 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि के भीतर आवेदन पर विचार करने का अधिकार है, यदि विलंब का पर्याप्त कारण बताया गया हो, लेकिन उसके बाद नहीं। धारा 34(3) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति "मध्यस्थता निर्णय प्राप्त हुआ था" को अधिनियम की धारा 31(5) के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो प्रत्येक पक्ष को निर्णय की हस्ताक्षरित प्रति सौंपने का आदेश देती है।
यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक है कि जब हस्ताक्षरित निर्णय की प्रति पक्षकार को ही नहीं दी जाती है, तो यह अधिनियम, 1996 की धारा 31 की उपधारा (5) के प्रावधानों का अनुपालन नहीं माना जाएगा। धारा का उचित अनुपालन पक्षकार को मध्यस्थता निर्णय की हस्ताक्षरित प्रति की सुपुर्दगी से होगा, जो अधिनियम, 1996 की धारा 34 की उपधारा (3) के तहत कार्यवाही करने का अधिकार प्रदान करता है।
वर्तमान मामले में, याचिकाकर्ता का स्पष्ट मत है कि 18 अगस्त 2016 के अवार्ड की कोई हस्ताक्षरित प्रति उसे कभी नहीं दी गई और उसे अवार्ड की जानकारी पहली बार 23 जुलाई 2019 को प्रतिवादी द्वारा अधिनियम, 1996 की धारा 36 के तहत निष्पादन कार्यवाही के दौरान प्राप्त हुई। अभिलेख से पता चलता है कि इसके तुरंत बाद, 07 सितंबर .2019 को, अपीलकर्ता ने धारा 34 के तहत एक आवेदन दायर किया, हालांकि निष्पादन कार्यवाही लंबित थी। उक्त आवेदन बाद में 21 दिसंबर 2021 को वापस ले लिया गया और धारा 34 के तहत विधिवत गठित आवेदन के साथ एक विलंब की माफी की मांग करते हुए परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के तहत आवेदन 04 जनवरी 2022 को दायर किया गया था।
हाई कोर्ट ने वापस भेजा मामला,
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, 05 नवंबर 2022 को पारित विवादित आदेश को वैध नहीं ठहराया जा सकता है और तदनुसार इसे रद्द किया जाता है। मामले को द्वितीय अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, दुर्ग को पुनः भेजा जाता है ताकि वे अधिनियम, 1996 की धारा 34 के अंतर्गत याचिकाकर्ता, खरीददार द्वारा दायर आवेदन पर विधि के अनुसार और उसके गुण-दोष के आधार पर, विलंब के प्रश्न पर जोर दिए बिना, पुनर्विचार करें।