Bilaspur High Court: कर्मचारियों की खबर: न्यायालयीन कर्मचारी की याचिका पर हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, ACR में प्रतिकूल टिप्पणी के आधार पर...

Bilaspur High Court: न्यायालयीन कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा, ACR वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में बिना बताए गए प्रतिकूल टिप्पणी के आधार पर संबंधित कर्मचारी को अनिवार्य सेवानिवृति देने पर विचार किया जा सकता है। इस फैसले के साथ ही हाई कोर्ट ने कर्मचारी की याचिका को खारिज कर दिया है।

Update: 2026-01-10 10:02 GMT

Bilaspur High Court: बिलासपुर। न्यायालयीन कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा, ACR वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में बिना बताए गए प्रतिकूल टिप्पणी के आधार पर संबंधित कर्मचारी को अनिवार्य सेवानिवृति देने पर विचार किया जा सकता है। इस फैसले के साथ ही हाई कोर्ट ने कर्मचारी की याचिका को खारिज कर दिया है।

न्यायालयीन कर्मचारी राजेंद्र कुमार वैद ने अनिवार्य सेवानिवृति देने के आदेश को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस बीडी गुरु की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, कर्मचारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट ACR में बिना बताई गई प्रतिकूल प्रविष्टियों पर अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश पारित करने के लिए विचार किया जा सकता है।

राजेंद्र वैद को 1995 में जगदलपुर जिला कोर्ट में प्रोसेस राइटर के पद पर नियुक्त किया गया था। पदोन्नति के बाद 2018 में बीजापुर कोर्ट में सहायक ग्रेड-II के पद पर पदस्थापना दी गई। ऐसे न्यायालयीन कर्मचारी जिन्होंने 50 वर्ष की आयु या 20 वर्ष की सेवा पूरी कर ली थी, कामकाज की समीक्षा के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया गया था। वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में प्रतिकूल प्रविष्टियों के आधार पर उसे अनिवार्य सेवानिवृति दे दी गई।

अनिवार्य सेवानिवृति के फैसले को चुनौती देते हुए राजेंद्र वैद ने हाई कोर्ट के सिंगल बेंच में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में बताया कि एसीआर में प्रतिकूल टिप्पणियां या तो उन्हें बताई नहीं गईं या अस्पष्ट थीं। इसके अलावा, पूरे सेवा रिकॉर्ड पर विचार नहीं किया गया। अनिवार्य सेवानिवृति को सही ठहराते हुए सिंगल बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया था।

सिंगल बेंच के फैसले को चुनौती देते हुए राजेंद्र ने डिवीजन बेंच में याचिका दायर की थी। डिवीजन बेंच में दायर रिट याचिका में याचिकाकर्ता ने बताया कि 2011 और 2014 की उनकी गोपनीय रिपोर्ट में प्रतिकूल टिप्पणियां लगभग सभी अधीनस्थों के खिलाफ मनमाने तरीके से दर्ज की गईं थी। याचिका के अनुसार 2016 की उनकी गोपनीय रिपोर्ट में संदिग्ध सत्यनिष्ठा की हानिकारक टिप्पणी उन्हें कभी नहीं बताई गई। उनको सुनवाई का अवसर भी नहीं दिया गया।

कर्मचारी राजेंद्र कुमार वैद ने अपनी याचिका में कहा, जिला जज ने स्क्रीनिंग कमेटी का गठन किया था। बाद में खुद को कमेटी का अध्यक्ष बना लिया। इसके अलावा, जिला जज ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी के रूप में भी काम किया, जिसने अंतिम रिटायरमेंट आदेश पारित किया, जो अनुचित था। प्रतिवादियों ने कहा, स्क्रीनिंग कमेटी का निर्णय कर्मचारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड के मूल्यांकन पर आधारित था, जिससे उनके प्रदर्शन और सत्यनिष्ठा में लगातार गिरावट का पता चला। यह बात साल 2011, 2014 और 2016 की उनकी सालाना गोपनीय रिपोर्ट में दर्ज खराब एंट्रीज़ से साबित हुई।

मामले की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पाया, कर्मचारी की ग्रेडिंग कुछ सालों तक अच्छी या बहुत अच्छी थी, लेकिन 2010 से उनका परफॉर्मेंस, चरित्र और ईमानदारी लगातार खराब होती गई। यह बात भी सामने आई कि चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की स्पेशल रिपोर्ट में निर्देशों का पालन न करने और ड्यूटी में लापरवाही की बात कही गई। डिवीजन बेंच ने माना कि स्क्रीनिंग कमेटी का फैसला और उसके बाद अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश पर्याप्त सबूतों पर आधारित था और इसे मनमाना या गलत नहीं कहा जा सकता।

याचिकाकर्ता कर्मचारी की यह दलील कि खराब एंट्रीज़ याचिकाकर्ता को नहीं बताई गईं, इसे भी कोर्ट ने खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए डिवीजन बेंच ने माना कि अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश पारित करने के लिए बिना बताई गई खराब एंट्रीज़ पर भी विचार किया जा सकता है। सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

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