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Chhattisgarh Tarkash 20250: पोस्टिंग की गजब परंपरा

Chhattisgarh Tarkash 20250: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के. दीक्षित का पिछले 17 बरसों से निरतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश।

Chhattisgarh Tarkash 2025: रोलर युग में कड़ी और चांदा
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By Sanjay K Dixit

तरकश, 18 जनवरी 2025

संजय के. दीक्षित

पोस्टिंग की गजब परंपरा

छत्तीसगढ़ में चना-मुर्रा टाईप आयोगों में सरकार बनने के साल-डेढ़ साल के भीतर नियुक्तियां हो जाती हैं, मगर राज्य वित्त आयोग के साथ कुछ ऐसी विडंबना रही कि 25 साल में सिर्फ एक बार पांच साल के लिए वीरेंद्र पाण्डेय इसके अध्यक्ष रहे। वरना, हर सरकार में, तीसरे साल ही अध्यक्ष की नियुक्ति हो पाती है। अजीत जोगी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान लगभग आखिरी समय याने विधानसभा चुनाव से जस्ट पहले टीएस सिंहदेव को इस आयोग का अध्यक्ष बनाया गया था। मगर दिसंबर 2003 में सरकार बदल गई। हालांकि, संवैधानिक पद होने के चलते सिंहदेव इस्तीफा ना भी देते तो कुछ नहीं होता। मगर सिंहदेव ने नैतिकता के नाते पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद मुख्यमंत्री बने डॉ0 रमन सिंह ने वीरेंद्र पाण्डेय को अध्यक्ष बनाया। वे करीब पांच साल इस पद पर रहे। उसके बाद फिर तीसरे साल में नियुक्ति की परंपरा शुरू हो गई। 2011 में अजय चंद्राकर और 2016 में चंद्रशेखर साहू इस आयोग के अध्यक्ष बनाए गए। भूपेश बघेल सरकार ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए 2022 में सरजियस मिंज की नियुक्ति की थी। चूकि बीजेपी-04 सरकार का तीसरा साल चालू हो गया है, ऐसे में इस आयोग को लेकर पार्टी नेताओं की उत्सुकता बढ़ गई है। इस आयोग का मूल काम राज्य के कुल कर राजस्व में से स्थानीय निकायों को कितना हिस्सा मिले, इसका तरीका सुझाना है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए आय के नए स्त्रोत तलाशने का कार्य भी यह आयोग करता है। चूकि इसमें दिमाग और बुद्धि का काम है, इसलिए नेताओं में भी पढ़े-लिखे बौद्धिक फेस को ही इस आयोग का चेयरमैन बनाया जाता है। बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी कब और किसकी ताजपोशी करती है।

कटप्पा और आईपीएस प्रमोशन

बाहुबली-2 रिलीज होने से पहले पब्लिक डोमेन में ये बड़ा प्रश्न था कि कटप्पा ने आखिर बाहुबली को क्यों मारा? कुछ इसी तरह के यक्ष प्रश्न आईपीएस लॉबी में भी घूम रहे हैं...बैठक में आखिर पेंच लगाई किसने। दरअसल, डीपीसी तक सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। पीएचक्यू ने प्रमोशन का प्रस्ताव तैयार कर भेजा, गृह विभाग ने उसे डीपीसी में सम्मिट किया। बताते हैं, प्रमोशन कमेटी की बैठक जैसे ही शुरू हुई किसी मेंबर ने महादेव ऐप्प का मसला उठा दिया। कहा...6000 करोड़ के स्कैम में तीन अफसरों से पूछताछ के लिए केंद्रीय जांच एजेंसी को 17ए के तहत अनुमति दी गई है, तो फिर प्रमोशन कैसे? इसके बाद पेंच ऐसी फंसी कि हाई लेवल के निर्देश और मार्गदर्शन के बाद भी दूसरी डीपीसी में मामला सुलझ नहीं पाया। विदित है, मुख्य सचिव विकास शील, सीनियर एसीएस के नाते ऋचा शर्मा, एसीएस होम मनोज पिंगुआ और डीजीपी अरुणदेव गौतम मौजूद थे। पुलिस महकमे में सबसे अधिक उत्सुकता यह जानने का लेकर है कि कटप्पा की भूमिका किसने निभाई? और क्यों?

डरे-सहमे मंत्री!

2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सरकार को बड़ा झटका लगा था। भूपेश बघेल के 12 में से नौ मंत्री चुनाव नहीं निकाल पाए। ये चीजें बीजेपी सरकार के कई मंत्रियों को बड़ा परेशान कर रही। लिहाजा, सरकार द्वारा किए जा रहे रिफार्म की कोशिशों से मंत्रीजी लोग घबरा जा रहे। जमीनों के गाइडलाइन की युक्तियुक्तकरण को लेकर कैबिनेट की बैठक में कई मंत्रियों ने कह दिया था, ऐसा रहा तो वे चुनाव हार जाएंगे। और अभी सरकार फर्जी धान खरीदी पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही तो कुछ मंत्रियों ने हाय-तोबा मचा दिया। बता दें, फर्जी धान खरीदी में हर साल करीब 10 हजार करोड़ का खेल किया जाता है। इस खेल के मुख्य खिलाड़ी कई राईस मिलरों पर दबिश बढ़ाई जा रही तो मंत्री समेत पक्ष-विपक्ष के विधायक उससे बेचैन हो रहे हैं।

पोस्टिंग में विलंब

पिछले साल डीएसपी प्रमोट हो जाने के बाद भी 40 से अधिक टीआई को तीन महीने तक थानेदारी करनी पड़ी, तब जाकर पोस्टिंग मिली। कुछ ऐसा ही एडिशनल एसपी प्रमोशन में हो रहा। एक तो कई महीने घूमने-फिरने के बाद प्रमोशन की फाइल क्लियर हो पाई। और अब एडिशनल एसपी बन जाने के बाद भी काम डीएसपी का करना पड़ रहा है। बात छोटी मगर महत्वपूर्ण है। इससे पता चलता है कि सिस्टम कितना चुस्त है।

सरकार को क्रेडिट नहीं

छत्तीसगढ के सरकारी स्कूलों में 50 लाख से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। सरकार उन्हें मुफ्त में पुस्तकें मुहैया कराती है। याने इन आधा करोड़ परिवारों से सरकार सीधे कनेक्ट होती है। मगर लालफीताशाही के चलते पिछले कुछ सालों में पाठ्य पुस्तक निगम का सिस्टम ऐसा डिरेल्ड हुआ कि दिसंबर तक किताबों का वितरण कंप्लीट नहीं हो पा रहा। आखिर करीब 200 करोड़ रुपए जब इस पर खर्च हो रहा है तो क्या ऐसा नहीं किया जा सकता कि अप्रैल में स्कूल खुलने से पहले किताबें शालाओं में पहुंच जाएं। मगर दुर्भाग्यजनक यह है कि सिस्टम का फोकस स्कूल शिक्षा जैसे विभागों पर नहीं होता। वरना, प्रॉपर मानिटरिंग की जाए तो टाईम पर पुस्तकें स्कूल में पहुंच जाएंगी और सरकार को क्रेडिट भी मिलेगा।

एमडी को डबल चार्ज

सरकार ने जिस तरह हेल्थ को ठीक करने के लिए डायरेक्टर और एनएचएम में अलग-अलग आईएएस अधिकारी बिठाया है, उसी तरह बच्चों को टाईम पर पुस्तकें उपलब्ध हो जाए, इसके लिए समग्र शिक्षा और पाठ्य पुस्तक निगम में अलग-अलग एमडी पोस्ट करना चाहिए। दोनों में एक अफसर को बिठाने का नुकसान यह होता है कि फोकस समग्र शिक्षा पर हो जाता है। सही भी है...समग्र का बजट 2000 करोड़ का है। जाहिर है, बजट बड़ा तो मलाई भी ज्यादा ही होगा। उधर, पापुनि का 200 करोड़ का बजट, उसमें भी कई लेवल की नेतागिरी। हालांकि, पापुनि निर्धनता की केटेगरी में नहीं आता...15 परसेंट के हिसाब से लगभग 30 खोखा का बन जाता है। मगर उसमें चार-से-पांच हिस्से लगते हैं। समग्र शिक्षा में ये हिस्से वाला मामला थोड़ा कम है। इसलिए जरूरी है कि पापुनि के लिए अलग से एमडी बनाया जाए।

पीसीसी चीफ को एक्सटेंशन?

पिछले विधानसभा चुनाव के बाद से पीसीसी चीफ दीपक बैज को हटाने की अटकलें चल रही हैं। एक बार तो बात इस लेवल तक पहुंच गई थी कि लगा कि किसी भी दिन टीएस सिंहदेव का आदेश निकल जाएगा। मगर दीपक ने ढाई साल का टेन्योर पूरा कर लिया। जुलाई 2026 में उनका तीन साल कंप्लीट हो जाएगा। सुनने में आ रहा...दीपक को अगर नहीं हटाया गया तो उनके साथ दो कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति हो सकती है। इसके लिए देवेंद्र यादव, उमेश पटेल, शिव डहरिया और प्रेमचंद जायसी का नाम चल रहा है। हालांकि, भीतर की खबर ये भी है कि उमेश पटेल कार्यकारी अध्यक्ष बनने के लिए तैयार नहीं। जुलाई में अगर दीपक बैच को हटाया गया तो अत्यधिक संभावना है कि टीएस सिंहदेव उनकी जगह लें। कांग्रेस के अंदरखाने में चर्चा इस बात का लेकर भी है कि विधानसभा में पार्टी की आक्रमकता बढ़ाने के लिए उमेश पटेल को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी सौंपी जा सकती है।

प्रमोशन पॉलिसी में खोट

गुड गवर्नेंस और वर्किंग कल्चर बनाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार कई स्तर पर काम कर रही है। इनमें ई-ऑफिस से लेकर डिजिटल अटेंडेंस तक शामिल है। सरकार को इसके साथ प्रमोशन में विसंगतियों को दूर करने पर भी काम करना चाहिए। खासकर, क्लास टू और क्लास थ्री लेवल पर। प्रमोशन पॉलिसी की विडंबना ही कहें कि मंत्रालय का भृत्य डिप्टी सिकरेट्री तक पहुंच जाता है मगर बाकी जगहों पर बाबू से बडा बाबू और सिपाही से प्रधान सिपाही बनने में सालों लग जाते हैं। कर्मचारियों, अधिकारियों से अगर बढ़ियां काम लेना है तो एचआर पॉलिसी को ठीक करना होगा। प्रमोशन देने से खजाने पर खास भार भी नहीं पड़ता। सीनियरिटी के हिसाब से वेतन लगभग प्रमोशन के रेंज में पहुंच ही जाता है। राज्य के भले के लिए सिस्टम को इस पर काम करना चाहिए।

रेल मंत्री के बैचमेट आईएएस

कचना इलाके में रहने वाले 50 हजार से अधिक लोग पिछले तीन साल से रेलवे ओवरब्रिज की समस्या से जूझ रहे हैं। पीडब्लूडी ने मार्च 24 का टारगेट रखा था। ठेकेदार ने टाईम पर इसे कंप्लीट नहीं किया। उपर से सर्विस रोड की हालत ऐसी दयनीय कि पूछिए मत! पीडब्लूडी के अफसरों ने ऐसा वाला काला चश्मा लगा रखा है कि उन्हें सिर्फ रुपिया दिखता है। आलम यह कि अभी रेलवे साइड का गार्डर लग नहीं पाया है। पूरा मामला इगो का है। रेलवे अधिकारी कोई पाकिस्तानी तो हैं नहीं कि उनसे बात नहीं की जा सकती। अफसर अगर रायपुर डीआरएम या बिलासपुर जीएम से एक बार बात कर लें तो प्राब्लम साल्व हो सकता है। वो भी नहीं तो 94 बैच के कई आईएएस छत्तीसगढ़ में हैं। खुद चीफ सिकरेट्री विकास शील। ऋचा शर्मा और मनोज पिंगुआ भी 94 बैच के हैं। इसी बैच के पूर्व आईएएस रेल मंत्री आश्वनी वैष्णव भी हैं। इन तीनों से रेल मंत्री को एक फोन ही काफी होगा। पीडब्लूडी के अधिकारी अगर लेटर-लेटर का खेल करते रहे तो फिर ये साल भी निकल जाए तो आश्चर्य नहीं।

सीएम, जीएम बराबर

राज्य में जो अधिकार मुख्यमंत्री को होता है, रेलवे में वही औरा जीएम का होता है। जीएम चाहे तो क्षेत्रीय जरूरतों का हवाला देते हुए नई लोकल ट्रेन चलवा सकता है, बाद में बोर्ड से एप्रूवल मिल जाता है। सौभाग्य से देश में सबसे अधिक आमदनी देने वाले रेलवे जोन के जीएम बिलासपुर में बैठते हैं। कोआर्डिनेशन अगर ठीक रहता तो दुर्ग से रायपुर के बीच एक 24 कैरेट वाली ट्रेन तो चल ही सकती थी। 24 कैरेट मतलब जिसकी टाईमिंग पर यात्रियों को भरोसा रहे। जब बिलासपुर रेलवे जोन नही बना था, डिवीजन था, तब का एक वाकया बताते हैं। पूर्व मंत्री और कोटा विधायक राजेंद्र प्रसाद शुक्ल को बिलासपुर से पेंड्रा के बीच ट्रेन शुरू करानी थी। कार्यकर्ताओं को लेकर वे खुद ही डीआरएम से मिलने पहुंच गए। डीआरएम ने इधर-उधर से रैक का इंतजाम कर महीने भर के भीतर बिलासपुर-पेंड्रा के बीच ट्रेन चलवा दी थी।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. दुर्ग आईजी रामगोपाल गर्ग को पुलिस कमिश्नर बनाए जाने की चर्चा से रायपुर पुलिस के लोग क्यों घबराए हुए हैं?

2. क्या आईपीएस अंकित गर्ग और बद्री मीणा में से कोई दुर्ग पुलिस रेंज का आईजी बनेगा?

Sanjay K Dixit

संजय के. दीक्षित: रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से एमटेक करने के बाद पत्रकारिता को पेशा बनाया। भोपाल से एमजे। पिछले 30 साल में विभिन्न नेशनल और रीजनल पत्र पत्रिकाओं, न्यूज चैनल में रिपोर्टिंग के बाद पिछले 10 साल से NPG.News का संपादन, संचालन।

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