UGC Equity Regulations 2026: यूजीसी के समानता नियमों पर क्यों उठ रहे सवाल? जानें पूरा विवाद?
UGC Equity Regulations 2026: UGC ने उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव रोकने के लिए नए Equity Regulations 2026 लागू किए हैं। जानिए क्या हैं प्रावधान और क्यों चर्चा में हैं ये नियम।
UGC Equity Regulations 2026: यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नए नियम लागू किए हैं। ये नियम देश भर के सभी विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और मान्यता प्राप्त संस्थानों पर लागू होते हैं। इन्हें Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 के नाम से अधिसूचित किया गया है।
इन नियमों के बैकग्राउंड में दो छात्रों की मौत से जुड़ी घटनाएं हैं। जनवरी 2016 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला और मई 2019 में मुंबई की ट्राइबल छात्र डॉ. पायल तड़वी ने कथित जाति-आधारित उत्पीड़न के बाद आत्महत्या कर ली थी। दोनों के परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसी के बाद कोर्ट ने UGC को सख्त नियम बनाने का निर्देश दिया था।
कितनी गंभीर है समस्या?
UGC के आंकड़े बताते हैं कि 2019 से 2024 के बीच जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2019-20 में करीब 173 शिकायतें दर्ज हुईं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। इस अवधि में कुल 1,160 से अधिक शिकायतें आईं। एक रिपोर्ट के अनुसार, 2019 से 2021 के बीच देश भर के शैक्षणिक संस्थानों में 98 दलित छात्रों ने आत्महत्या की।
नए नियमों में क्या है?
हर संस्थान में एक Equal Opportunity Centre (EOC) बनाना अनिवार्य होगा। यह केंद्र भेदभाव से जुड़ी शिकायतों को देखेगा और वंचित समूहों को शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक सहायता मुहैया कराएगा।
प्रत्येक EOC में एक Equity Committee होगी जिसकी अध्यक्षता संस्थान प्रमुख करेंगे। इस समिति में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है। इसके अलावा Equity Squad, Equity Ambassador और 24 घंटे चलने वाली हेल्पलाइन भी होगी।
शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर समिति की बैठक होनी चाहिए। समिति को 15 कार्य दिवसों में अपनी रिपोर्ट देनी होगी। इसके बाद संस्थान प्रमुख को 7 दिनों में कार्रवाई करनी होगी। गंभीर मामलों में पुलिस को तुरंत सूचित किया जाएगा।
नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों पर सख्त कार्रवाई हो सकती है। UGC उन्हें डिग्री प्रोग्राम चलाने से रोक सकता है, मान्यता रद्द कर सकता है, या योजनाओं से बाहर कर सकता है।
किन बातों को लेकर चर्चा है
कुछ आलोचकों का कहना है कि नियमों में 'भेदभाव' की परिभाषा बहुत व्यापक है। इसमें सीधे भेदभाव के अलावा 'परोक्ष', 'संरचनात्मक' और 'गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला' व्यवहार भी शामिल है। इन शब्दों की स्पष्ट व्याख्या नियमों में नहीं दी गई है।
एक चिंता यह भी जताई जा रही है कि गलत या दुर्भावनापूर्ण शिकायत करने वाले पर क्या कार्रवाई होगी, इस पर स्पष्टता नहीं है। मसौदा नियमों में झूठी शिकायतों पर दंड का प्रावधान था, लेकिन अंतिम संस्करण में यह हटा दिया गया।
Equity Committee में SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है, लेकिन सामान्य वर्ग का कोई विशेष प्रतिनिधित्व नहीं है। कुछ लोग इसे असंतुलन मान रहे हैं।
सोशल मीडिया पर कुछ छात्रों और अभिभावकों ने इन नियमों को लेकर आशंकाएं व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कहीं व्यक्तिगत शिकायतों या अकादमिक मतभेदों को भेदभाव के रूप में नहीं पेश किया जाए।
क्या कहते हैं समर्थक
शिक्षाविद् अनिल चमाड़िया जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि जब हाशिए के समूह अपने अधिकारों की मांग करते हैं तो कभी-कभी प्रभुत्व के खतरे में होने का एहसास भी बढ़ता है। कई शिक्षाविद् और संगठन इन नियमों को सकारात्मक कदम मानते हैं। उनका तर्क है कि 2012 के पुराने नियम सिर्फ सलाह देने वाले थे और उनमें कोई दंड का प्रावधान नहीं था।
आगे क्या होगा
UGC ने एक राष्ट्रीय निगरानी समिति बनाई है जो इन नियमों के क्रियान्वयन की समीक्षा करेगी। यह समिति साल में कम से कम दो बार बैठक करेगी। नियमों का असली असर उनके लागू होने के तरीके पर निर्भर करेगा। संस्थान किस तरह समितियां बनाते हैं, शिकायतों को कैसे संभालते हैं, और निष्पक्षता कैसे बनाए रखते हैं- यह सब आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने एक टास्क फोर्स भी गठित की है जो इन नियमों की समीक्षा करेगी। अगर कमियां मिलती हैं तो उन्हें दूर करने के लिए संशोधन किया जा सकता है।
फिलहाल, ये नियम 13 जनवरी 2026 से लागू हो चुके हैं। अगले कुछ महीनों में यह देखना होगा कि क्या ये कैंपस को वाकई सुरक्षित और समावेशी बनाते हैं, या implementation को लेकर नई चुनौतियां खड़ी होती हैं।