बस्तर से सत्ता की राह तलाशने तीन दिवसीय चिंतन शिविर..सभी सांसद, सभी विधायक और कोर ग्रुप होगा शामिल..संघ और संगठन के क़द्दावर होंगे मौजूद

Update: 2021-08-29 10:40 GMT

रायपुर,29 अगस्त 2021। करीब अठारह बरस बाद यह ऐसा मौक़ा होगा जबकि छत्तीसगढ़ के धूर दक्षिणी क्षेत्र बस्तर में भाजपा के छत्तीसगढ़ से जुड़े हर जवाबदेह शख़्स का जमावड़ा होगा। छत्तीसगढ़ से जुड़े का अर्थ केवल छत्तीसगढ़ भाजपा नही बल्कि छत्तीसगढ़ भाजपा के संगठनसह संगठन महामंत्री, संगठन प्रदेश प्रभारी, सह प्रभारी और भाजपा की मातृसंस्था संघ के भी दिग्गज शामिल होंगे।
बस्तर में आयोजित यह शिविर तीन दिनों का है। प्रसंग अनुरुप इस शिविर का नाम चिंतन शिविर है।31 अगस्त से 2 सितंबर तक आयोजित इस शिविर के अंतिम दिन याने दो सितंबर को, आख़िरी तीन घंटे संभागीय सम्मेलन भी होगा।
2003 से 2018 तक पंद्रह बरसों के शासनकाल के बाद पंद्रह सीट और उप चुनाव में भी करारी हार के बाद सिमट चुकी भाजपा को चिंतन शिविर में सत्ता वापसी की राह तलाशनी है।
इस शिविर में उस संघ की अहम भुमिका है, जिसे लेकर यह माना गया था कि 2018 के चुनाव में उसने एक प्रकार से हाथ खींच लिया था। हालाँकि दिलचस्प यह भी देखना है कि मोबाइल पर मिस्ड कॉल कर जितने प्रदेश में सदस्य बनाने का दावा किया गया था, भाजपा को कुल वोट भी उतने नहीं मिले थे।
पंद्रह साल से सत्ता के सफ़र में कार्यकर्ता विलुप्त होते गए और आरोप लगा कि भाजपा का संगठन जो सत्ता को नियंत्रित करता है, वह सत्ता के ईशारे पर कदमताल करने लगा। कौरवी संग्राम ने अलग ही नुक़सान किया। राजनीति में रुचि रखने वाले यह मानते हैं कि भाजपा का जो चुनावी नतीजा आया उसके पीछे उल्लेखित कारणों के साथ साथ आयातित उन की अहम भुमिका थी जिन्हें चादर बिछाने वाले और कुर्सी लगाने वाले मूलाधार कार्यकर्ता ने कभी पसंद नहीं किया।
अंतिम आहुति कांग्रेस के घोषणापत्र और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के बेहद आक्रामक तेवर ने दे दी।
अब जबकि सत्ता से दूर बेहद मायूस संख्या के साथ भाजपा विधानसभा में है तो भी ऐसा कुछ उल्लेखनीय नहीं है कि यह बताया जा सके कि ढाई बरसों में भाजपा ने ज़मीन पर किसी आंदोलन को छेड़ा और वह जनान्दोलन बन गया। सीमित संख्या जो विपक्ष के रुप में बेहद मायूस करती है उस संख्या के बावजूद यदि भाजपा चर्चाओं में रही है तो उसी कौरवी संग्राम की वजह से, जिससे उसका इत्तिफ़ाक़ 2008 से अनवरत जारी है जो 2013 आते आते सतह पर उछाल मारने लगी।
इन सबके बीच कांग्रेस के भीतरखाने कलह घमासान सरेराह सरे आम है, इसके बावजूद कांग्रेस सरकार के अब तक के काम तो चुनौती हैं ही क्योंकि उसका असर कृषक पर सकारात्मक रुप से अब तक साफ़ दिखता रहा है और राज्य का पिछड़े वर्ग जिसे जातीय जनगणना के आंकड़े के अभाव के बावजूद प्रदेश की सबसे बड़ी आबादी याने मतदाता माना जाता है, उसे कांग्रेस हर संभव कोशिश में है कि ना केवल वह वर्ग जूडे बल्कि साथ बना रहे।
और भाजपा को चिंतन शिविर में इन चुनौतियों से पार पाने और कांग्रेस के चक्रव्यूह को भेदने के लिए चिंतन करना है, ताकि सत्ता हासिल करने की राह तय हो। आप इस चिंतन शिविर को भाजपा की सत्ता वापसी का रोड मैप बनाने की क़वायद कहें तो शायद यह सबसे सही होगा।
लेकिन रोड मैप बनाने के लिए जिस मूलाधार कार्यकर्ता के मानस को जानने समझने की सबसे अहम जरुरत है क्या उसे लेकर कोई तैयारी हो पाई है, तो अब तक इसका जवाब है “नही”। सियासत में एक शब्द होता है जो वोट के स्विंग के समय बहुत इस्तेमाल होता है, वह शब्द है “फ़ेस एलर्जी”.. क्या भाजपा के नीति नियंता उन चेहरों को पहचान पाए हैं जिन्हे मतदाताओं के बीच फ़ेस एलर्जी की तरह माना गया है?
इसका जवाब उस तीन दिनी अधिवेशन में ही मिलेगा। बहरहाल निगाहें इस चिंतन शिविर पर टिकी है कि इसमें क्या निकलकर आता है।
संगठन से जुड़े एक सूत्र ने जानकारी दी है कि, अपेक्षित की सुची में सभी सांसद सभी विधायक, कोर ग्रुप के सभी दस सदस्य और चार महामंत्री शामिल हैं।

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