सुप्रीम फैसला, देश में ऐसा पहली बार: सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की दी अनुमति, 13 साल से कोमा में है बेटा, माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट में लगाई थी गुहार
Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतहासिक आदेश में क 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी है। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर है। वे पंजाब यूनिवर्सिटी के हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। देश में अपनी तरह का यह पहला मामला है।
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दिल्ली।11 मार्च 2026| सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतहासिक आदेश में क 13 साल से कोमा में रह रहे 31 साल के युवक हरीश राणा को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी है। गाजियाबाद के रहने वाले हरीश लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर है। वे पंजाब यूनिवर्सिटी के हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे। देश में अपनी तरह का यह पहला मामला है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने एम्स AIIMS को निर्देश दिया कि हरीश के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए। यह प्रोसेस इस तरह से की जानी चाहिए कि मरीज की गरिमा बनी रहे।
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है कि किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को जिंदा रखने के लिए जो बाहरी लाइफ सपोर्ट या इलाज दिया जा रहा है, उसे रोक दिया जाए या हटा लिया जाए, ताकि मरीज की प्राकृतिक रूप से मौत हो सके।
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला हरीश की मां निर्मला राणा और पिता अशोक राणा की इच्छामृत्यु देने की अपील पर सुनाया।
फैसले पर पिता अशोक ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पिता अशोक ने कहा, हम इसके लिए लंबे समय से लड़ रहे थे। कौन से माता-पिता अपने बेटे के लिए ऐसा चाहेंगे। पिछले 3 साल से हम यह मामला लड़ रहे थे। अब उसे एम्स ले जाया जाएगा। वह पंजाब यूनिवर्सिटी में टॉपर हुआ करता था। हरीश हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरे थे, तब से बिस्तर पर है और कोमा में है।
जानिए कौन है हरीश राणा, किस बीमारी से है पीड़ित
दिल्ली में जन्मे हरीश राणा चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी से बीटेक की पढ़ाई कर रहा था। 2013 में वह हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गया। इस घटना के बाद पूरे शरीर को लकवा मार गया और वह कोमा में चला गया। वह न कुछ बोल सकता है और न ही महसूस कर सकता है। इलाज कर रहे चिकित्सकों ने हरीश को क्वाड्रिप्लेजिया बीमारी से पीड़ित करार दिया। इसमें मरीज पूरी तरह से खाने-पीने की नली और वेंटिलेटर सपोर्ट पर निर्भर रहता है। इसमें रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं होती। 13 साल से बिस्तर पर पड़े होने की वजह से हरीश के शरीर पर गहरे घाव बन गए हैं। उनकी हालत लगातार खराब होती जा रही है।
यह स्थिति हरीश के लिए बहुत दर्दनाक है। परिवार के लिए उन्हें ऐसे देखना मानसिक रूप से बेहद कठिन हो गया है। वेंटिलेटर, दवाइयों, नर्सिंग और देखभाल पर कई साल से इतना खर्च हो चुका है कि परिवार आर्थिक रूप से टूट चुका है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिए ये निर्देश
मरीज को दी जा रही चिकित्सा सहायता को वापस लिया या रोका जा सकता है। इस मामले में सामान्यतः लागू 30 दिन की पुनर्विचार अवधि को इस मामले में माफ कर दिया गया।
एम्स को निर्देश दिया कि मरीज को पेलिएटिव केयर सेंटर में भर्ती किया जाए इलाज रोकने की प्रक्रिया पूरी की जा सके। पैलियेटिव केयर यानी ऐसे मरीजों को आराम देने वाली चिकित्सा, जिनका इलाज संभव नहीं होता।
मरीज को घर से अस्पताल शिफ्ट करने की पूरी व्यवस्था एम्स करेगा।
लाइफ सपोर्ट हटाने की प्रोसेस एक विशेष चिकित्सा योजना के तहत की जानी चाहिए, ताकि मरीज की गरिमा बनी रहे।
इच्छामृत्यु ये तरीके
पैसिव यूथेनेशियाः इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट, वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां रोक दी जाती हैं, ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके। इसमें डॉक्टर इलाज बंद कर देते हैं। मौत का कारण बीमारी ही रहती है।
एक्टिव यूथेनेशियाः इसमें मरीज को मौत देने के लिए डॉक्टर दवाई या इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यह गैर-कानूनी है।