BMC चुनाव 2026: कभी मुंबई के 'डॉन' थे... आज अपनी दोनों बेटियां को नहीं जिता पाए! BMC चुनाव में मिली करारी शिकस्त

BMC Election 2026: बीएमसी चुनाव 2026 में अरुण गवली की दोनों बेटियां गीता और योगिता गवली हार गईं, बायकुला में घटता दिखा गवली परिवार का असर।

Update: 2026-01-16 12:33 GMT

नई दिल्ली, 16 जनवरी 2026। कभी मुंबई की राजनीति और अंडरवर्ल्ड दोनों में मजबूत पकड़ रखने वाले अरुण गवली के परिवार के लिए बीएमसी चुनाव 2026 उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा। BMC चुनाव में उनकी दोनों बेटियां गीता गवली और योगिता गवली हार गई हैं। इसे सीधे तौर पर गवली परिवार के घटते राजनीतिक प्रभाव के तौर पर देखा जा रहा है खासकर बायकुला जैसे इलाके में जहां कभी उनकी पकड़ सबसे मजबूत मानी जाती थी। दरअसल जिस बायकुला में एक दौर में गवली के नाम का दबदबा था वहीं इस बार के नतीजों ने कहानी बदल दी।

कहां-कहां से हारीं गवली बहनें
अरुण गवली की पार्टी अखिल भारतीय सेना की उम्मीदवार गीता गवली को वार्ड 212 (बायकुला) से हार का सामना करना पड़ा। उन्हें समाजवादी पार्टी की अमरीन शहजान अब्रगानी ने शिकस्त दी। वहीं दूसरी ओर योगिता गवली को वार्ड 207 से बीजेपी उम्मीदवार रोहिदास लोखंडे ने हरा दिया। दोनों बहनों की हार को राजनीतिक जानकार डबल झटका मान रहे हैं क्योंकि यह इलाका लंबे समय तक गवली परिवार का गढ़ रहा है।
डॉन की बेटियां नहीं डैडी की बेटियां
चुनाव से पहले गवली बहनों ने अपनी छवि को लेकर खुलकर बात की थी। उनका कहना था कि लोग उन्हें डॉन की बेटियां नहीं बल्कि डैडी की बेटियां मानते हैं। उनका दावा था कि बायकुला की गदड़ी चॉल में आज भी अरुण गवली को लोग भरोसे और उम्मीद के साथ देखते हैं। समर्थक उन्हें प्यार से ‘डैडी’ कहकर बुलाते हैं। 
अंडरवर्ल्ड से राजनीति तक का सफर
अरुण गवली का नाम 1970 के दशक में मुंबई के अंडरवर्ल्ड में उभरा। वह और उनके भाई किशोर बायकुला कंपनी नाम के गिरोह से जुड़े थे जो बायकुला परेल और साट रास्ता इलाके में एक्टिव था। 1988 में गवली ने गिरोह की कमान संभाली। 80 और 90 के दशक में उनकी दाऊद इब्राहिम के गिरोह से दुश्मनी रही जिसने मुंबई की अंडरवर्ल्ड राजनीति को लंबे समय तक प्रभावित किया।
विधायक से जेल तक
1980 के दशक में अरुण गवली को शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे का राजनीतिक संरक्षण भी मिला। हालांकि 1990 के दशक के मध्य में दोनों के रास्ते अलग हो गए। इसके बाद गवली ने अपनी अलग पार्टी बना ली थी। वे 2004 से 2009 तक चिंचपोकली से विधायक रहे। लेकिन 2008 में एक शिवसेना पार्षद की हत्या के मामले में उन्हें जेल भेज दिया गया। करीब 17 साल जेल में रहने के बाद उन्हें पिछले साल सितंबर में जमानत पर रिहा किया गया।
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