आज राम नवमी: कन्या पूजन करना विशेष फलदायी, जानें पूजा महत्‍व व अन्य शुभ कार्य...

Update: 2022-04-09 23:30 GMT

रायपुर 10 अप्रैल 2022. नवरात्रों के 9 दिन माता रानी को समर्पित हैं. रामनवमी वाले दिन लोग मां दुर्गा की पूजा के साथ-साथ भगवान राम की भी अराधाना की जाती है. नवरात्रि के 9 दिन मां दुर्गा के 9 रूपों की पूजा होती है और सबसे आखिर में रामनवमी मनाई जाती है। इस दिन घरों और मंदिरों में पूरे विधि विधान से भगवान राम और माता सीता की पूजा अर्चना होती है। आइए आपको बताते हैं कि कैसे होती है राम नवमी की पूजा, क्‍या है शुभ मुहूर्त और पूजा विधि।

इस साल नवमी रविवार के दिन पड़ रही है। चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि 10 अप्रैल 2022 को है। नवमी तिथि प्रारम्भ - अप्रैल 10, 2022 की रात्रि 01 बजकर 23 मिनट से शुरूनवमी तिथि समाप्त - अप्रैल 11, 2022 को सुबह 3 बजकर 15 मिनट पर समाप्त...

क्या है राम नवमी की महिमा

पौराणिक ग्रंथों के अनुसार चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम का जन्म हुआ था। वहीं शारदीय नवरात्रि के नवमी तिथि के दिन भगवान राम ने समुद्र तट के किनारे देवी भगवती की पूजा कर रावण का वध करने का आशीर्वाद प्राप्त किया था। तथा दशमी तिथि के दिन भगवान राम ने रावण का वध कर तीनों लोक को राक्षसों के अत्याचार से मुक्त किया था। मान्यता है कि इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम और देवी भगवती की पूजा अर्चना करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।

राम नवमी की पूजा विधि

राम नवमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साप कपड़े पहनें. फिर हाथ में चावल लेकर व्रत रखने का संकल्प लें और सूर्य भगवान को जल चढ़ाया जाए. उसके बाद प्रभु श्री राम का पूजन कर गंगाजल, फूल, माला, 5 प्रकार के फल, मिठाई आदि अर्पण करें. अब भगवान राम को तुलसी का पत्ता और कमल का फूल जरूर चढ़ाएं. उसके बाद रामचरितमानस, रामायण या रामरक्षास्तोत्र का पाठ करें. 

श्रीरामचंद्र स्तुति

श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं। नव कंजलोचन, कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं।।

कंन्दर्प अगणित अमित छबि नवनील नीरद सुंदर। पटपीत मानहु तडित रुचि शुचि नौमि जनक सुतवरं।।

भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्यवंश निकन्दंन। रधुनंद आनंदकंद कौशलचंद्र दशरथ नन्दनं।।

सिरा मुकुट कुंडल तिलक चारू उदारु अंग विभूषां। आजानुभुज शर चाप धर सग्राम जित खरदूषणमं।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं। मम हृदय कंच निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं।।

मनु जाहिं राचेउ मिलहि सो बरु सहज सुंदर सांवरो। करुना निधान सुजान सिलु सनेहु जानत रावरो।।

एही भांति गौरि असीस सुनि सिया सहित हियं हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजी पुनिपुनि मुदित मन मन्दिरचली।।

श्रीरामावतार स्तोत्र 

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला, कौसल्‍या हितकारी

हरषित महतारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप बिचारी

लोचन अभिरामा, तनु घनस्‍यामा, निज आयुध भुजचारी

भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभासिंधु खरारी।।

कह दुई कर जोरी, अस्‍तुति तोरी, केहि बिधि करूं अनंता

माया गुन ग्‍यानातीत अमाना, वेद पुरान भनंता

करूना सुख सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिं श्रुति संता

सो मम हित लागी, जन अनुरागी, भयउ प्रगट श्रीकंता

ब्रह्मांड निकाया, निर्मित माया, रोम रोम प्रति बेद कहै

मम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति थिर न रहै

उपजा जब ग्याना, प्रभु मुसुकाना, चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै

कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै

माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा

कीजै सिसुलीला, अति प्रियसीला, यह सुख परम अनूपा

सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना, होइ बालक सुरभूपा

यह चरित जे गावहिं, हरिपद पावहिं, ते न परहिं भवकूपा


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