तरकश: गुमनाम हीरो, मदद के बढ़ते हाथ...

छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित वरिष्ठ पत्रकार संजय के. दीक्षित का 14 साल से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश

Update: 2023-02-12 12:00 GMT

संजय के. दीक्षित

तरकश, 12 फरवरी 2023

गुमनाम हीरो, मदद के बढ़ते हाथ...

वर्ल्ड कप हॉकी के हीरो विसेंट लकड़ा रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के रिमोट गांव सिथारा में गुमनामी का जीवन बिता रहे हैं। क्रिकेट खिलाड़ी होते तो आज किसी मेट्रो सिटी में लग्जरी जीवन यापन कर रहे होते। मगर दुर्भाग्य देश का और हॉकी का...सिस्टम ने देश और छत्तीसगढ़ की शान बढ़ाने वाले इस हीरो का हाल-चाल जानना जरूरी नहीं समझा और न ही रायगढ़ का कोई जिम्मेदार अधिकारी कभी उनकी सुध लेने गया। देश के गुमनाम हीरोज के नाम से यूट्यूब पर विसेंट लकड़ा का भी एक वीडियो है। उसे देखकर सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकील और एनजीओ वाले विसेंट की मदद करना चाहते हैं। इसके लिए विसेंट का कंटेक्ट नंबर वे तलाश रहे।

कलेक्टर बड़ा या कलेक्टर का रीडर

कानून में यह क्लियर है कि आदिवासी की कोई भी जमीन कलेक्टर की अनुमति के बगैर नहीं बेची जा सकती। मगर छत्तीसगढ़ के कुछ कलेक्टर गजबे कर रहे हैं। कई जिलों में आदिवासी लैंड अगर डायवर्टेड है तो कलेक्टर लिख कर दे दे रहे हैं...इसमें कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं है। और कई जिले ऐसे हैं, जहां डायवर्टेड लैंड होने के बाद भी कलेक्टर की अनुमति पाने चप्पल घिस जाते हैं। जाहिर है, अनुमति का प्रोसेस, महीनो की पेशी, बयान, साक्ष्य के बाद पूरा होता है। असल में, कलेक्टरों को आजकल नियम-कायदों की स्टडी होती नहीं। उनका रीडर जो बताता है, उसे वे ओके कर देते हैं। वही कलेक्टर एक जिले में पोस्टिंग के दौरान डायवर्टेड लैंड के मामले में कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं लिखकर देते हैं और दूसरे जिले में जाते हैं तो अनुमति अनिवार्य बताते हैं। दरअसल, 2008 में जब राधाकृष्णन राजस्व बोर्ड के चेयरमैन थे, तब भूमाफियाओं ने उनसे आर्डर करा लिया था कि डायवर्टेड लैंड में कलेक्टर की अनुमति की जरूरत नहीं। हालांकि, डीएस मिश्रा ने चेयरमैन बनते ही उसे समाप्त का दिया था। मगर कलेक्टरों के कई खटराल रीडर राधाकृष्णन के उसी फैसले के आधार पर भूमाफियाओं को उपकृत कर रहे हैं। बहती गंगा में हाथ धोते हुए कई रजिस्ट्री अफसर भी कलेक्टर के ऐसे टीप का सहारा लेकर आदिवासी डाइवर्टेड भूमि का बेरोकटोक रजिस्ट्री कर दे रहे। बता दें, छत्तीसगढ़ में एक महिला कलेक्टर को इसी तरह के केस में डीई का आदेष हो चुका था। मगर आईएएस लॉबी के प्रेशर में मामला रफा-दफा कर दिया गया।

छोटा जिला, छोटे कलेक्टर

छत्तीसगढ़ में कभी सात जिले होते थे। रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, बस्तर, बिलासपुर, रायगढ़ और सरगुजा। अब संख्या बढ़कर 33 पहुंच चुकी हैं। याने एक जिले में पांच-पांच जिला। आलम यह कि जहां कभी एसडीएम बैठते थे, वहां अब कलेक्टर बैठ रहे हैं। जिले छोटे करने का मकसद ये था कि प्रशासन अंतिम व्यक्ति तक आसानी से पहुंच सकें। लेकिन, कलेक्टरों ने खुद को इस कदर सिकोड़ लिया है कि अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की बात तो अलग कलेक्टरों को ढूंढो तो जाने वाला हाल हो गया है। कलेक्टरों के मुख्यतः दो ही काम होते हैं...सरकार के खजाने में अधिक-से-अधिक रेवेन्यू आए और राजस्व मामलों का निबटारा। हर जिले में यही सबसे बड़ी समस्या है। पिछले कलेक्टर कांफ्रेंस में रेवेन्यू नहीं बढ़ाने को लेकर उन्हें आड़े हाथ लिया गया था। और राजस्व मामलों का भगवान मालिक हैं। सालों बाद रायपुर तहसील में राजस्व मामलों के लिए कैंप लगाया गया। वरना, जिलों में पटवारी और भूमाफिया मिलकर राजस्व विभाग चला रहे हैं। कलेक्टरों को डीएमएफ से फुरसत नहीं। आधे-एक घंटे के लिए आफिस पहुंच गए तो बड़ी बात। नहीं तो, बंगले से ही डीएमएफ का खेल। पहले के कलेक्टर आठ-आठ, दस-दस ब्लाकों को दौरे में कवर कर लेते थे। अबके कलेक्टर दो ब्लॉक को ठीक से देख नहीं पा रहे, तो इसका मतलब आप समझ सकते हैं। रायपुर में कलेक्टर एमके राउत और एडिशनल कलेक्टर अनिल टुटेजा हर महीने दो-तीन चौपाल लगा आते थे। मगर अभी के कलेक्टर आफिस में मिल गए तो अपनी किस्मत समझिए। छोटे जिले होने से कलेक्टरों के लिए बड़ा अवसर था...नाम कमा सकते थे। ईश्वर ने उन्हें देश की सर्वोच्च सर्विस के लिए चुना है, वे इसे जस्टिफाई कर सकते थे। मगर मध्यप्रदेश वालों ने गड़बड़ नस्ल के आईएएस अफसरों को छत्तीसगढ़ भेजकर ऐसा नस्ल खराब किया कि अब बेहतर की उम्मीद मुश्किल है। यही हाल पुलिस का भी है। जहां कभी एडिशनल एसपी नहीं होते थे, वहां डायरेक्ट आईपीएस एसपी बने बैठे हैं। मगर जरा पूछिए उनसे आउटकम क्या है।

एसीबी की पोस्टिंग?

लगातार पांच जिलों की क़प्तानी कर राजधानी लौटी डीआईजी पारुल माथुर को सरकार ने एसीबी में पोस्ट किया था। और जाहिर था कि अगले महीने मार्च में डीजी डीएम अवस्थी के रिटायर होने के बाद पारुल एसीबी की कमान संभालती। मगर हफ्ते भर में वे सरगुजा चली गईं। उनकी जगह पर एसपी सीएम सिक्यूरिटी प्रखर पाण्डेय को एसीबी भेजा गया है। डीएम के बाद प्रखर को एसीबी संभालना है, लिहाजा उन्हें किसी अच्छे पंडित को बुलाकर एसीबी में पूजा-पाठ करा लेना चाहिए। क्योंकि, एसीबी में जो भी जा रहा, उसका बहुत अच्छा नहीं हो रहा। या तो वो हिट विकेट हो जा रहा या फिर उसका कैरियर खतम हो जा रहा है। संजय पिल्ले तक सब ठीक था। मगर उसके बाद मुकेश गुप्ता, एसआरपी कल्लूरी, जीपी सिंह, बीके सिंह, पारुल...लिस्ट में कई नाम हैं। बीके सिंह डीजी लेवल के सीनियर आईपीएस थे, अफसरों के साथ उनकी लड़ाई छिड़ गई। जाहिर है, इनमें कई अच्छे अफसर थे, मगर ग्रह-नक्षत्र का खेल देखिए...कई अफसर बियाबान में हैं।

मरकाम को झटका?

पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए एआईसीसी ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अरबिंद नेताम और पीसीसी के संगठन महामंत्री अमरजीत चावला को नोटिस थमा दी है। चूकि यह नोटिस सीएम भूपेश बघेल की शिकायत पर जारी हुई है, सो इस केस में कार्रवाई भी तय समझी जा रही है। नोटिस से पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम को झटका जरूर लगा होगा। खासकर अमरजीत को लेकर। अमरजीत उनके काफी करीबी माने जाते हैं। कुर्मी समाज के खिलाफ वायरल आडियो के बाद अमरजीत को महासमुंद जिला अध्यक्ष से इस्तीफा देना पड़ा था। मरकाम ने उन्हें प्रदेश में दूसरे नम्बर की बड़ी जिम्मेदारी देते हुए संगठन महामंत्री बना दिया था। अब लाचारी यह है कि मुख्यमंत्री की शिकायत पर नोटिस हुई है, इसलिए मरकाम कुछ कर भी नहीं सकते। एक तो हाईकमान सुनेगा नहीं, दूसरा, सूबे के सीएम से पंगा लेने की एक लिमिट होती है। पता चला है, चने के पेड़ पर चढ़ाने वाले कुछ लोगों ने पीसीसी चीफ के खेमे को दिल्ली जाकर बात करने की सलाह दी। पर ऐसा कुछ होगा नहीं। रास्ता निकाले जाने की बात जरूर आ रही है। हो सकता है, संगठन महामंत्री का प्रभार रवि घोष को फिर से मिल जाए।

सियासी भविष्य

अमित शाह के रायपुर दौरे में विधायक धर्मजीत सिंह का बीजेपी प्रवेश होते-होते रह गया था। कहा गया कि टिकिट देने पर कोई बात बनी नहीं। मगर ऐसी सियासी बातों की कोई पुष्टि करता नहीं...पुष्टि हुई भी नहीं। बहरहाल, सवाल तो है कि अब जब विधानसभा चुनाव में छह महीने बच गया है, धर्मजीत का अगला सियासी कदम क्या होगा। जोगी कांग्रेस उन्हें निष्कासित कर चुकी है। कांग्रेस में वर्तमान परिस्थितियों में उनकी इंट्री होगी नहीं। बच गई बीजेपी। बीजेपी नेताओं के वे लगातार संपर्क में हैं। लोकल नेताओं से उनके रिश्ते भी बढ़िया हैं। लेकिन, टिकिट देने का मसला दिल्ली से तय होगा। हालांकि, ऐसा नहीं है कि पार्टी में शामिल होने वाले नेताओं को बीजेपी टिकिट नहीं दी हो। यूपी में तो कई उदाहरण हैं। बताते हैं, धर्मजीत बीजेपी से तखतपुर सीट से चुनाव लड़ना चाहते हैं। उनके करीबी बताते हैं, तखतपुर से अगर बीजेपी की टिकिट नहीं मिली तो लोरमी से फिर निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर हाथ आजमाएंगे।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सारंगढ़ के कलेक्टर राहुल वेंकट के बाद एसपी राजेश कुकरेजा का भी विकेट गिर गया। क्या इससे उस इलाके के एक संसदीय सचिव का प्रभाव और बढ़ गया?

2. क्या एक मंत्री का भतीजा बीजेपी से विधानसभा चुनाव में उतरेगा?

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