सेक्स वर्कर को ना कहने का अधिकार, तो एक पत्नी को क्यों नहीं? दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी...

Update: 2022-01-14 06:31 GMT

नईदिल्ली 14 जनवरी 2022. दिल्ली उच्च न्यायालय ने गुरुवार को वैवाहिक बलात्कार पर याचिकाओं के एक बैच की सुनवाई करते हुए कहा कि क्या एक पत्नी को निचले पायदान पर रखा जा सकता है या एक यौनकर्मी की तुलना में कम सशक्त हो सकता है, जिसे किसी भी स्तर पर ना कहने का अधिकार है। अदालत की टिप्पणी तब आई जब उसने बताया कि "कुछ परिस्थितियों" को बलात्कार के दायरे से बाहर करना "अंतर-पक्षीय संबंधों के कारण" समस्याग्रस्त है और वैवाहिक बलात्कार अपवाद की जांच बलात्कार में यौनकर्मियों को दी गई सुरक्षा के आलोक में की जा सकती है।  एमिकस क्यूरी और वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने कहा कि अगर किसी के साथ जबरदस्ती की जाती है तो सेक्स वर्कर को भी उस व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाने का अधिकार है।

दो दिन पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को कहा था कि विवाहित और अविवाहित महिलाओं के सम्मान में अंतर नहीं किया जा सकता और कोई महिला विवाहित हो या न हो, उसे असहमति से बनाए जाने वाले यौन संबंध को 'ना' कहने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि महत्वपूर्ण बात यह है कि एक महिला, महिला ही होती है और उसे किसी संबंध में अलग तरीके से नहीं तौला जा सकता। उच्च न्यायालय ने कहा, 'यह कहना कि, अगर किसी महिला के साथ उसका पति जबरन यौन संबंध बनाता है तो वह महिला भारतीय दंड संहिता की धारा 375 (बलात्कार) का सहारा नहीं ले सकती और उसे अन्य फौजदारी या दीवानी कानून का सहारा लेना पड़ेगा, ठीक नहीं है।'

वैवाहिक बलात्कार को आपराधिकरण करार दिए जाने का अनुरोध करने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए पीठ ने पूछा, 'यदि वह विवाहिता है तो क्या उसे 'ना' कहने का अधिकार नहीं है?' न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत पति पर अभियोजन चलाने से छूट ने एक दीवार खड़ी कर दी है और अदालत को यह देखना होगा कि यह दीवार संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) और 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन की रक्षा) का उल्लंघन करती है या नहीं।

केंद्र सरकार की वकील मोनिका अरोड़ा ने पीठ को बताया कि केंद्र आपराधिक कानून में संशोधन का एक व्यापक कार्य कर रहा है, जिसमें आईपीसी की धारा 375 शामिल है।


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