Freedom Fighters of Chhattisgarh: जानिए छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बारे में

आजादी की लड़ाई में छत्तीसगढ के लोगों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर NPG के इस खास प्रस्तुतिकरण में बताएंगे कि किसका क्या योगदान रहा।

Update: 2023-08-15 08:27 GMT

दिव्या सिंह@npg.news

Freedom Fighters of Chhattisgarh : रायपुर। देश जब पराधीनता के पिंजरे से बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा था और किसी भी तरह बस अंग्रेज़ी हुकूमत को बाहर खदेड़ने पर आमादा था तब हरेक कोने से विद्रोह के स्वर फूट रहे थे। स्वतंत्रता के अभिलाषी मुक्ति का संकल्प लेकर मोर्चा संभाल रहे थे। आन के समक्ष जान की फिक्र उन्हें कतई नहीं थी। ऐसा ही माहौल छत्तीसगढ़ में भी था। छत्तीसगढ़ के वीर सपूतों ने अंग्रेज़ों के बहुत अत्याचार झेले, अनगिनत बार जेल में ठूंसे गए, पर उन्होंने हार नहीं मानी और निरंतर प्रयास करते रहे। स्वाधीनता दिवस के मौके पर छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के प्रयासों पर प्रकाश डालने की कोशिश हम इस लेख के माध्यम से कर रहे हैं।

वीर नारायण सिंह

जमींदार नारायण सिंह को संघर्ष, स्वतंत्रता और लोगों के प्रति अपना फर्ज निभाने की प्रेरणा अपने पिता से मिली थी। उनके पिता और सोनाखान के जमींदार रामराय ने सन 1819 में स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत की थी। रामसाय के पिता फतेनारायन सिंह ने भोंसले के शासन को स्वीकार नहीं किया था। और रामसाय भी अपनी ताकत भर अंग्रेज़ी हुकूमत से संघर्ष करते रहे। उन्होंने जनता का दिल इस कदर जीत रखा था कि लोग अंग्रेजी सत्ता के आदेश का तो उल्लंघन कर सकते हैं पर रामराय का कहा कभी नहीं टालते थे।

वर्ष 1856 में छत्तीसगढ़ में भीषण अकाल पड़ा था। तब जमींदार नारायण सिंह थे। उन्होंने देखा कि प्रजा भूखी मर रही है। पहले उन्होंने अपने गोदाम से अनाज लोगों को बांटा। जब वह कम पड़ा तो माखन नामक व्यापारी से मुफ्त में अनाज देने का आग्रह किया लेकिन उसने नारायण सिंह का आग्रह ठुकरा दिया। नारायण सिंह ने अपने लोगों के साथ उस गोदाम पर कब्जा कर लिया। और अनाज बांट दिया। अंग्रेजी सेना की नज़र उनपर पहले से थी। जैसे ही यह खबर मिली उन्होंने नारायण सिंह को गिरफ्तार कर 24 अक्टूबर 1856 को रायपुर जेल में डाल दिया।

संबलपुर के क्रांतिकारी सुरेंद्र साय और सिपाहियों की मदद से नारायण सिंह जेल से भाग निकले।

सोनाखान पहुंच कर नारायण सिंह ने 500 लोगों की सेना बना ली। रायपुर के असिस्टेंट कमिश्नर लेफ्टिनेंट स्मिथ अपनी सेना के साथ नारायण सिंह को दबोचने निकले। सोनाखान के करीब स्मिथ की फौज पर पहाड़ की ओर से नारायण सिंह ने हमला कर दिया। वे स्मिथ पर भारी पड़ रहे थे। लेकिन स्मिथ के पास कटंगी से अतिरिक्त सैन्य मदद पहुंच गई। भीषण लड़ाई चली आखिर नारायण सिंह को पकड़ लिया गया और रायपुर जेल में डाल दिया गया। उनपर मुकदमा चला और 10 दिसंबर 1857 को उन्हें रायपुर के ही जयस्तंभ चौक पर फांसी दे दी गई। बाद में उनके सम्मान में भारत सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया था।

पंडित सुंदरलाल शर्मा

छत्तीसगढ़ के गांधी के नाम से विख्यात पंडित सुंदरलाल शर्मा के ज़िक्र के बिना छत्तीसगढ़ के वीर सपूतों का उल्लेख अधूरा है। जन्म 21 दिसंबर 1881 में राजिम के पास चमसूर नामक गांव में हुआ था। वे उच्च कोटि के विद्वान ही नहीं बल्कि नाट्य कला,मूर्तिकला व चित्रकला में भी पारंगत थे। उन्होंने लगभग 18 ग्रंथ लिखे। इन्होंने राजिम में 1907 में संस्कृत पाठशाला और रायपुर में सतनामी आश्रम की स्थापना की। उन्होंने नहर सत्याग्रह की शुरूआत की। साथ ही अंग्रेजों द्वारा लगाए गए सिंचाई कर का भी इन्होंने विरोध किया।1910 में राजिम में प्रथम स्वदेशी दुकान खोली। उन्होंने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया। इस आंदोलन में हिस्सा लेने वाले छत्तीसगढ़ के वह पहले व्यक्ति थे। 28 दिसंबर 1940 को इनका देहांत हो गया।

बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव

बाबू छोटेलाल छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक थे। उनका जन्म 28 फरवरी 1889 को कंडेल के एक संपन्न परिवार में हुआ था। पं. सुंदरलाल शर्मा और पं. नारायणराव मेघावाले के संपर्क में आकर वे राष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़े। उन्होंने किसानों को संगठित किया और प्रसिद्ध कंडेल नहर सत्याग्रह के माध्यम से अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। यह एक अभूतपूर्व प्रदर्शन था। वर्ष 1921 में स्वदेशी प्रचार के लिए उन्होंने खादी उत्पादन केंद्र की स्थापना की। वर्ष 1922 में श्यामलाल सोम के नेतृत्व में हुए सिहावा जंगल सत्याग्रह और रुद्री के नजदीक नवागांव जंगल सत्याग्रह में भी उन्होंने भरपूर सहयोग दिया। अंग्रेज़ी सल्तनत की उनके बढ़ते हौसलों पर नज़र थी। उन्हें जेल में डालकर कड़ी यातनाएं दी गई। बाद में वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी बाबू छोटेलाल ने सक्रिय भूमिका निभाई। उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन वे खुशकिस्मत थे जो देश को आजाद होते देख पाए। कालांतर में कंडेल में ही 18 जुलाई 1976 को उनका देहावसान हो गया।

बैरिस्टर छेदीलाल

ठाकुर छेदीलाल का जन्म 1887 को बिलासपुर जिले के अकलतरा नामक गांव में हुआ था। इन्होंने ऑक्सफोर्ड से बैरिस्टर की शिक्षा प्राप्त की तथा बिलासपुर में वकालत प्रारंभ की। वे हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत में निपुण थे। लंदन में ही वे ‘इंडिया हाउस’ नामक क्रांतिकारी संगठन के संपर्क में आए और फ्रांस में उन्होंने बम निर्माण का प्रशिक्षण भी लिया। 1919 से वे स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। 1928 में उन्होंने गांधी जी से प्रभावित होकर कांग्रेस की ओर रुख किया। उन्होंने रामलीला के मंचन से जागृति लाने का प्रयोग किया। असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में उन्होने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वे 1946 में सविधान सभा के सदस्य भी रहे। 1953 में उनका देहावसान हो गया।

हनुमान सिंह

हनुमान सिंह रायपुर में रेजीमेंट के सिपाही थे। छत्तीसगढ़ में सैन्य क्रांति उन्होंने की थी। उनका प्रयास था कि रायपुर में अंग्रेज अधिकारियों की हत्या कर छत्तीसगढ़ में शासन की कमर तोड़ी जाए। हनुमान सिंह ने 18 जनवरी 1858 को सार्जेन्ट मेजर सिडवेल की हत्या की और साथियों के साथ तोपखाने पर कब्जा कर लिया। लेफ्टिनेंट रॉट और लेफ्टिनेंट सी. एच. लूसी स्मिथ और उनकी टुकड़ी के साथ वे छः घंटों तक लड़ते रहे। अधिक देर टिकना असंभव था। आखिर में वे फरार हो गए और अंग्रेजी हकूमत के हाथ नहीं आए।

ठाकुर प्यारेलाल सिंह

ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21 दिसम्बर 1891 को राजनांदगांव जिले के दैहान ग्राम में हुआ था। वे क्रांतिकारी विचारों से ओतप्रोत थे। वे छत्तीसगढ़ में श्रमिक आंदोलन के सूत्रधार तथा सहकारिता आंदोलन के प्रणेता थे। वे 1906 में बंगाल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए और लौटकर क्रांतिकारी साहित्य के प्रचार आरंभ किया। बताया जाता है कि वे विद्यार्थियों को संगठित कर जुलूस निकालते और उनके साथ वन्देमातरम् का नारा लगाते थे। 1909 में उन्होंने सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना की। 1920 में बी एन सी मिल की हड़ताल का सफल नेतृत्व किया। आपने स्थानीय आंदोलनों और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए जन-सामान्य को जागृत किया। वे छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन के जनक कहलाते हैं। छत्तीसगढ़ के बुनकरों को संगठित करने के लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ की स्थापना की ताकि बुनकरों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो। असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इन्होंने छत्तीसगढ़ एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना और छत्तीसगढ़ महासभाा की स्थापना में विशेष योगदान दिया। विनोबा भावे के भूदान एवं सर्वोदय आंदोलन को इन्होंने छत्तीसगढ़ में फैलाया। 20 अक्टूबर 1954 को भूदान यात्रा के समय अस्वस्थता के चलते इनका निधन हो गया।

यति यतनलाल

यति यतनलाल का जन्म तो बीकानेर में हुआ था , लेकिन इनकी शिक्षा -दीक्षा रायपुर में हुई। वे गणित, इतिहास और संस्कृत भाषा का गजब का ज्ञान रखते थे। इन्हें छत्तीसगढ़ में अहिंसा का अग्रदूत कहा जाता है। इन्होने महासमुंद में विवेक वर्धन आश्रम की स्थापना की थी। छोटी सी उम्र में ही वे राजनीति में सक्रिय हो गए थे। यति यतन लाल ने 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।शंकरराव गनौदवाले के साथ इन्होंने महासमुंद में जंगल सत्याग्रह किया । ग्रामोद्योग, दलित उत्थान और हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम करने वाले संत यतिनलाल को स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की वजह से कई बार जेल जाना पड़ा। 19 जुलाई 1976 को इनका देहांत हो गया।

डाॅ. खूबचंद बघेल

इनका जन्म 19 जुलाई ,1900 में रायपुर जिले के पथरी ग्राम में हुआ था। वे गांधी जी के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने वर्ष 1920 में कांग्रेस के नागपुर में आयोजित 35 वें अधिवेशन में चिकित्सा शिविर में वालंटियर के रूप में कार्य किया था। तो वर्ष 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में वे स्वयंसेवकों के कमांडर रहे। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने के कारण इन्हें जेल में भर दिया गया। वर्ष 1950 में आचार्य कृपलानी के आह्यन पर ये कृषक मजदूर पार्टी में शामिल हो गए। इन्हें छत्तीसगढ़ का स्वप्नदृष्टा कहा जाता है। वर्ष 1951 में आम चुनाव में ये विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। साल 1965 में ये राज्यसभा के लिए चुने गए। 22 फरवरी,1969 को इनका निधन हो गया।

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