Chhattisgarh Loksabha Chunav 2024: CG बड़ी जीत के लिए बदली सीट, मिली बड़ी हार: पढ़ें- कलेक्‍टरी छोड़ राजनीति में आए एक ऐसे नेता की स्‍टोरी, जिनके साथ जुड़े हैं कई बड़े घटनाक्रम...

Chhattisgarh Loksabha Chunav 2024: देश में लोकसभा चुनाव का माहौल चल रहा है। ऐसे समय में हम एक ऐसे नौकरशाह- नेता की कहानी बताने जा रहे हैं जिनका नाम छत्‍तीसगढ़ के पिछले 20 सालों के इतिहास में हुए लगभग हर बड़े सियासी घटनाक्रम में किसी न किसी रुप में आता है।

Update: 2024-03-28 12:40 GMT

Chhattisgarh Loksabha Chunav 2024: रायपुर। आईएएस देश की सबसे प्रतिष्ठित नौकरियों में शामिल हैं। इस नौकरी को हासिल करने के लिए करोड़ों युवा मेहनत करते हैं, लेकिन कुछ गिने चुने युवा ही किस्‍मत वाले साबित होते हैं।ऐसे में इस नौकरी को छोड़कर भला कोई राजनीति में क्‍यों आएगा, लेकिन बदलते दौर में लोगों की सोच बदली है। छत्‍तीसगढ़ में ही इसके कुछ उदाहरण मिल जाएंगे। सबसे ज्‍यादा चर्चा ओपी चौधरी के नाम की होती है। चौधरी रायगढ़ सीट से विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री हैं।

लेकिन हम जिस नौकरशाह- नेता की यहां बात कर रहे हैं उन्‍होंने उस दौर में आईएएस की नौकरी छोड़ी थी जब इस नौकरी को छोड़ने की कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता था। हम जिनकी बात कर रहे हैं उनका नाम अजीत प्रमोद कुमार जोगी है। वही अजीत जोगी जो छत्‍तीसगढ़ के पहले मुख्‍यमंत्री बने और 2000 से लेकर 2020 तक छत्‍तीसगढ़ की राजनीति में जितने भी बड़े घटनाक्रम में हुए उनमें किसी न किसी रुप में उनका नाम आया।

बड़ी जीत के चक्‍कर में बदली सीट, मिली बड़ी हार

अजीत जोगी 1986 में आईएएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए। 1986 से 1998 तक वे कांग्रेस की तरफ से राज्‍यसभा के सदस्‍य रहे। 1998 में जोगी पहली बार चुनावी राजनीति में आए। कांग्रेस ने उन्‍हें रायगढ़ सीट से प्रत्‍याशी बनाया। जोगी का मुकाबला बीजेपी के नंदकुमार साय से था। साय पर जोगी भारी पड़े और वे पहली बार रायगढ़ सीट से सांसद चुने गए, लेकिन जोगी इस जीत से संतुष्‍ट नहीं थे, क्‍योंकि जीत का अंतर महज 4 हजार 3 सौ 82 वोट का था। 1998 के चुनाव में जोगी को कुल 3 लाख 25 हजार 112 वोट मिले थे, जबकि साय को 3 लाख 20 हजार 730 वोट।

संयोग से सालभर के भीतर (1999) आम चुनाव की घोषणा हो गई। जोगी बड़ी जीत चाहते थे, इसलिए उन्‍होंने सीट बदलने का फैसला किया। ऐसे में जोगी ने अपने लिए शहडोल सीट को चुना। कांग्रेस की राष्‍ट्रीय राजनीति में दखल और आलाकमान से जोगी की नजदीकी किसी से छिपी नहीं थी। उन्‍हें 1999 में कांग्रेस ने शहडोल सीट से प्रत्‍याशी बनाया। जोगी की सोच थी कि शहडोल सीट पर आदिवासी आबादी रायगढ़ के मुकाबले अधिक है। साथ ही वह उनके गृह क्षेत्र पेंड्रा से करीब है। इसका फायदा मिलेगा। 1999 में शहडोल सीट पर जोगी का मुकाबला बीजेपी के दलपत सिंह के साथ हुआ। सिंह को कुल 2 लाख 62 हजार 229 वोट मिले, जबकि जोगी को 2 लाख 42 हजार 328। जोगी 19 हजार 901 वोट से हार गए।


भविष्‍य की राजनीति के लिए फायदेमंद साबित हुई शहडोल की हार

1999 के लोकसभा चुनाव में जोगी को मिली हार उनके लिए फायदेमंद साबित हुई, क्‍योंकि इस चुनाव के तुरंत बाद ही तत्‍कालीन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने अलग छत्‍तीसगढ़ का गठन कर दिया। जब छत्‍तीसगढ़ राज्‍य बना तब विधानसभा में कांग्रेस बहुमत में थी। पार्टी के मुख्‍यमंत्री पद के दावेदारों की कोई कमी नहीं थी। वीसी शुक्‍ल, श्‍यामचरण शुक्‍ल, मोतीलाल वोरा सहित कई वरिष्‍ठ नेता उस वक्‍त सक्रिय राजनीति में थे। इन सबको पीछे करते हुए जोगी छत्‍तीसगढ़ के पहले मुख्‍यमंत्री बन गए। राजनीतिक विश्‍लेषक कहते हैं कि यदि 1999 में जोगी शहडोल से सांसद चुन लिए गए होते तो वे कभी भी छत्‍तीसगढ़ के मुख्‍यमंत्री नहीं बन पाते, क्‍योंकि राज्‍य बंटवारा में शहडोल मध्‍य प्रदेश का हिस्‍सा बना। ऐसे में वे एमपी के सांसद कहलाते और सीएम की कुर्सी उनके दूर हो जाती।

20 वर्षों तक उनके ईद गिर्द घुमती रही छत्‍तीसगढ़ की राजनीति

जोगी का निधन 29 मई 2020 को हुआ। इसके पहले तक प्रदेश की पूरी राजनीति उनके ईद गिर्द घुमती रही। प्रदेश के सियासत में होने वाली हर बड़े-छोटे घटनाक्रम में जोगी की भूमिका की चर्चा होती थी। जोगी के सीएम बनने के बाद पहला घटनाक्रम दलबदल का हुआ। बीजेपी के 13 विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद कांग्रेस का विभाजन हुआ। जोगी से नाराज वीसी शुक्‍ला अपने समर्थकों के साथ एनसीपी में शामिल हो गए। 2003 में कांग्रेस प्रदेश की सत्‍ता से बाहर हो गई। इसके बाद लगातार 3 चुनावों में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। कांग्रेसी इस हार के लिए जोगी को जिम्‍मेदार बताते रहे। 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले जोगी ने अपनी अलग पार्टी बना ली। इसके साथ ही कांग्रेस में एक और विभाजन हो गया। जोगी के कांग्रेस छोड़ते ही पार्टी की सत्‍ता में वापसी हो गई।

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