Atharva Chaturvedi NEET: बस 10 मिनट चाहिए…19 साल के लड़के ने दी ऐसी दलील, सुप्रीम कोर्ट में जीत गया केस
Atharva Chaturvedi NEET : सुप्रीम कोर्ट में जबलपुर के एक छात्र ने बिना वकील खुद अपनी पैरवी कर एमबीबीएस दाखिले का केस जीत लिया है. चीफ जस्टिस ने छात्र की दलीलें सुन उसे प्रवेश देने का आदेश दिया और आरक्षण नियम न मानने वाले कॉलेजों को बंद करने की चेतावनी दी.
Atharva Chaturvedi NEET: बस 10 मिनट चाहिए…19 साल के लड़के ने दी ऐसी दलील, सुप्रीम कोर्ट में जीत गया केस
Atharva Chaturvedi NEET : नई दिल्ली : देश की सबसे बड़ी अदालत में एक ऐसा नजारा देखने को मिला जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा, जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्य कांत की बेंच अपनी सुनवाई खत्म करने वाली थी, तभी जबलपुर के एक छात्र अथर्व चतुर्वेदी ने बिना किसी वकील के, खुद अपनी पैरवी करने की इजाजत मांगी. चीफ जस्टिस ने न केवल उसे मौका दिया, बल्कि 10 मिनट तक उसकी दलीलें सुनने के बाद छात्र के हक में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुना दिया.
ऑनलाइन पैरवी और छात्र की जीत
जबलपुर के रहने वाले नीट क्वालिफाइड छात्र अथर्व चतुर्वेदी ने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो न्याय मिलकर रहता है. अथर्व ने कोर्ट को बताया कि उसने दो बार नीट की परीक्षा पास की, लेकिन सरकारी नीतियों और निजी कॉलेजों की मनमानी के कारण उसे एमबीबीएस में दाखिला नहीं मिल पा रहा था. आर्थिक तंगी के चलते दिल्ली जाकर वकील करने या वहां ठहरने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए छात्र ने खुद ही अपनी पिटीशन तैयार की, डायग्राम बनाए और ऑनलाइन जुड़कर अपनी बात रखी.
सीजेआई की निजी कॉलेजों को फटकार
सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार ने दलील दी कि निजी कॉलेजों में आरक्षण को लेकर अभी विचार चल रहा है, तो चीफ जस्टिस सूर्य कांत भड़क गए. उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि अगर निजी मेडिकल कॉलेज आरक्षण नीति का पालन नहीं कर सकते, तो उन्हें बंद कर देना चाहिए. कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी प्रशासनिक देरी या कागजी कार्यवाही की वजह से एक होनहार छात्र का भविष्य बर्बाद नहीं होने दिया जाएगा.
मिला एडमिशन का आदेश
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जायमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया भी शामिल थे, ने अथर्व को सत्र 2025-26 के लिए ईडब्ल्यूएस रैंक के आधार पर एमबीबीएस में अस्थायी प्रवेश देने का आदेश जारी किया है. अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी ने बताया कि उनके बेटे ने पूरी कानूनी लड़ाई खुद लड़ी ताकि वह अपने डॉक्टर बनने के सपने को सच कर सके. कोर्ट के इस फैसले ने उन हजारों छात्रों के लिए उम्मीद जगाई है जो व्यवस्था की कमियों के कारण पीछे रह जाते हैं.
सुप्रीम कोर्ट में बिना वकील के खुद अपना केस लड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जबलपुर के छात्र अथर्व का मामला बेहद खास है. भारत का कानून हर नागरिक को यह अधिकार देता है कि वह अपनी बात खुद कोर्ट के सामने रख सके. इससे पहले भी कई बार ऐसा देखा गया है जब आम लोगों ने देश की सबसे बड़ी अदालत में वकीलों के बिना जीत हासिल की है.
इसी तरह शिवांगी मिश्रा के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने एक छात्रा की बात सुनकर शिक्षा के नियमों में सुधार के आदेश दिए थे. अथर्व का मामला इसलिए ऐतिहासिक बन गया क्योंकि उसने घर बैठे ऑनलाइन तरीके से न केवल बहस की, बल्कि एमबीबीएस की सीट भी पक्की कर ली. इससे यह साबित होता हैं कि अगर आपके पास सही तथ्य और हिम्मत है, तो कानून की जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति न्याय पा सकता है.