हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सहमति से सेक्स के बाद ब्रेकअप... फिर रेप का आरोप! कोर्ट बोला- एक बार दी गई रजामंदी वापस नहीं ली जा सकती!

Delhi High Court : दिल्ली हाई कोर्ट ने सहमति से बने संबंधों को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी रिश्ते के खत्म होने या उसमें कड़वाहट आने के बाद उसे रेप या अपराध करार नहीं दिया जा सकता. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच ने एक महिला वकील की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल बदला लेने के लिए नहीं किया जाना चाहिए. कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अगर दो बालिग लोग सालों तक अपनी मर्जी से साथ रहते हैं, तो बाद में सहमति को पीछे हटकर वापस नहीं लिया जा सकता.

Update: 2026-02-19 11:08 GMT

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सहमति से सेक्स के बाद ब्रेकअप... फिर रेप का आरोप! कोर्ट बोला- एक बार दी गई रजामंदी वापस नहीं ली जा सकती!

Consensual Relations Aren't Rape After Breakup : नई दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने शारीरिक संबंधों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि अगर दो बालिग लोग आपसी सहमति से लंबे समय तक रिश्ते में रहते हैं, तो रिश्ता खत्म होने या कड़वाहट आने के बाद महिला अपनी सहमति को वापस नहीं ले सकती और न ही उसे अपराध की श्रेणी में खड़ा कर सकती है. कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून का मकसद असली अपराधियों को सजा देना है, न कि टूटी उम्मीदों या आपसी बदले की आग को शांत करना.

क्या था पूरा मामला

यह मामला एक महिला वकील और उसके पुरुष साथी से जुड़ा है. साल 2022 में महिला ने एक एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें उसने अपने साथी पर आरोप लगाया था कि उसने धर्म छुपाकर और पहले से शादीशुदा होने की बात दबाकर सालों तक उसका यौन शोषण किया. महिला का दावा था कि आरोपी ने उसे शादी के लिए मजबूर किया और अश्लील फोटो के जरिए ब्लैकमेल भी किया. हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने सबूतों के अभाव में आरोपी को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ महिला ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

हाई कोर्ट की दो टूक : 11 साल तक चुप रहना मर्जी का सबूत

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की बेंच ने महिला की याचिका खारिज करते हुए कई गंभीर सवाल उठाए. कोर्ट ने पाया कि यह रिश्ता कोई दो-चार दिन का नहीं बल्कि 11 साल लंबा था. इस दौरान महिला ने कानून की पढ़ाई की, वकालत शुरू की और वह समाज में आरोपी के साथ खुलकर घूमती रही.

अदालत ने कहा कि महिला खुद एक कानून की जानकार है, ऐसे में यह कहना गले नहीं उतरता कि उसे 11 साल तक सामने वाले के धर्म या उसकी शादी के बारे में पता नहीं चला. जब एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति जानबूझकर किसी रिश्ते में आता है और सालों तक उसे निभाता है, तो बाद में रिश्ता खराब होने पर उसे धोखे या जबरदस्ती नही कह सकता.

क्रिमिनल लॉ बदला लेने का माध्यम नहीं 

अदालत ने फैसले में बहुत ही गहरी बात कही. जस्टिस शर्मा ने कहा, आपराधिक कानून को ऐसे रिश्तों से होने वाले बदले, दबाव या निजी स्वार्थ का जरिया नहीं बनने दिया जा सकता जो अब टूट चुके हैं. कानून का काम असली यौन शोषण और अत्याचार से महिलाओं को बचाना है. लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि कानून का इस्तेमाल किसी रिश्ते के इतिहास को फिर से लिखने के लिए किया जाए, जो अपनी मर्जी से शुरू हुआ था और सालों तक समाज के सामने रहा.

कोर्ट ने यह भी कहा कि जब दो वयस्क सामाजिक रीति-रिवाजों और धर्म से हटकर कोई रिश्ता बनाने का फैसला करते हैं, तो उन्हें उसके कानूनी और निजी परिणामों के बारे में भी जागरूक रहना चाहिए. सिर्फ इसलिए कि रिश्ता उस तरह खत्म नहीं हुआ जैसा आपने सोचा था, आप उसे क्राइम नहीं बना सकते.

दिल्ली हाई कोर्ट ने पूर्व में भी ऐसे कई बड़े फैसले लिए हैं 

लिव-इन रिलेशनशिप में बच्चों का अधिकार : दिल्ली हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह साफ किया था कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों से पैदा हुए बच्चों को भी वही कानूनी अधिकार मिलेंगे, जो शादीशुदा जोड़ों के बच्चों को मिलते हैं. कोर्ट ने कहा कि अगर दो वयस्क लंबे समय तक एक साथ रहते हैं, तो उनके रिश्ते को समाज और कानून की नजर में शादी जैसा ही माना जाएगा. इस फैसले ने उन बच्चों के भविष्य को सुरक्षा प्रदान की जो बिना शादी के रहने वाले माता-पिता की संतान थे, खासकर संपत्ति और उत्तराधिकार के मामलों में.

शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध : दिल्ली हाई कोर्ट का एक और चर्चित फैसला शादी के झूठे वादे को लेकर रहा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि हर मामले में शादी का वादा टूटना रेप नहीं होता. अगर महिला को शुरुआत से पता है कि रिश्ता शादी में नहीं बदल सकता फिर भी वह लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए रखती है, तो इसे बाद में रेप नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने माना कि बालिग महिलाओं को अपने फैसलों के कानूनी परिणामों के प्रति जागरूक रहना चाहिए, और कानून का इस्तेमाल किसी को फंसाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.

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