Supreme Court News: सुप्रीम फैसला: आपराधिक प्रकरण में प्रोबेशन पर रिहाई से विभागीय सजा कम नहीं की जा सकती, पढ़िए सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया है

Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, किसी कर्मचारी के आपराधिक प्रकरण में प्रोबेशन पर रिहाई से विभागीय सजा को कम नहीं की जा सकती। जिस कर्मचारी के मामले में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, फैसले से पहले कर्मचारी की मृत्यु हो गई। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा सजा में किए गए संशोधन में हस्तक्षेप ना करते हुए याचिका को निराकृत कर दिया है।

Update: 2026-01-23 10:04 GMT

Supreme Court News: दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के डिवीजन बेंच ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है, किसी कर्मचारी के आपराधिक प्रकरण में प्रोबेशन पर रिहाई से विभागीय सजा को कम नहीं की जा सकती। जिस कर्मचारी के मामले में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, फैसले से पहले कर्मचारी की मृत्यु हो गई। इसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा सजा में किए गए संशोधन में हस्तक्षेप ना करते हुए याचिका को निराकृत कर दिया है।

याचिका की सुनवाई जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा व जस्टिस एनवी अंजारिया की डिवीजन बेंच में हुई। मामले की सुनवाई करते हुए डिवीजन बेंच ने साफ कहा, किसी कर्मचारी को आपराधिक मामले में प्रोबेशन (परिवीक्षा) का लाभ मिल जाना, विभागीय कार्यवाही में दी गई सजा को कम करने का आधार नहीं हो सकता। डिवीजन बेंच ने कहा कि प्रोबेशन में रिहाई से दोषसिद्धी खत्म नहीं हो जाती। डिवीजन बेंच ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया जिसमें हाई कोर्ट ने केवल इस आधार पर कर्मचारी की सजा कम कर दी थी कि उसे आपराधिक मामले में प्रोबेशन का लाभ दिया गया है। डिवीजन बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती कर दिया कि कर्मचारी की दोषसिद्धी कोई अयोग्यता नहीं है, केवल इसी आधार पर उसे सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता।

भाई की जगह फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर कर रहा था नौकरी

सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसे कर्मचारी का मामला आया जिसमें उसने अपने भाई की जगह फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी हासिल कर ली थी। शिकायत के बाद शैक्षणिक प्रमाण पत्रों की जांच पड़ताल की गई। विभागीय जांच बैठाई गई थी। विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। बर्खास्त कर्मचारी ने श्रम न्यायालय में मामला दायर किया था। मामले की सुनवाई के बाद श्रम न्यायालय ने बर्खास्तगी की सजा को रद्द करते हुए वेतन में कटौती और तीन वर्षों तक इंक्रीमेंट पर रोक लगाते हुए सेवा में वापस लेने का आदेश जारी किया था। श्रम न्यायालय के फैसले काे चुनौती देते हुए विभाग ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने श्रम न्यायालय के फैसले के पलटते हुए अनिवार्य सेवानिवृति में बदल दिया।

हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अधीक्षण अभियंता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में केंद्र सरकार बनाम बख्शी राम (1990) के फैसले का हवाला देते हुए कहा, प्रोबेशन पर रिहाई से दोषसिद्धि का कलंक खत्म नहीं होता।

डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के तर्कों से सहमति जताते हुए कहा कि जब तक दोषसिद्धि कायम है, तब तक केवल प्रोबेशन का लाभ मिलने के आधार पर बर्खास्तगी जैसी सजा को कम नहीं किया जा सकता। डिवीजन बेंच ने कहा, हाई कोर्ट की यह टिप्पणी कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है और बख्शी राम प्रकरण में तय कानून के अनुरूप नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह ध्यान में रखते हुए कि संबंधित कर्मचारी की मृत्यु हो चुकी है, हाई कोर्ट द्वारा सजा में किए गए संशोधन में हस्तक्षेप ना करते हुए याचिका को निराकृत कर दिया है।

Tags:    

Similar News