शिक्षक की याचिका पर सुनवाई: हाई कोर्ट ने कहा-राजस्व अधिकारी के पास इन प्रमाण पत्रों की वैधता का निर्णय करने का अधिकार नहीं...
Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक शिक्षक की याचिका पर सुनवाई करते हुए फर्जी विकलांग प्रमाण पत्र के आरोप में शिक्षक के खिलाफ आपराधिक प्रकरण चलाने के आदेश पर रोक लगा दी है। सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा है...
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बिलसपुर। 6 अप्रैल 2026| छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक शिक्षक की याचिका पर सुनवाई करते हुए फर्जी विकलांग प्रमाण पत्र के आरोप में शिक्षक के खिलाफ आपराधिक प्रकरण चलाने के आदेश पर रोक लगा दी है। सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा है, विकलांगता प्रमाण पत्र की वैधता की जांच और प्रमाणिक करने का अधिकार चिकित्सा बोर्ड को है। एसडीएम को विकलांगता प्रमाण पत्र की वैधता निर्धारित करने का अधिकार नहीं है।
छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने यह मानते हुए कि केवल सक्षम चिकित्सा बोर्ड ही विकलांगता प्रमाण पत्रों की वैधता निर्धारित कर सकते हैं, एसडीएम के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया था और एक शिक्षक के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश की गई थी। जस्टिस एके प्रसाद ने अपने फैसले में कहा है, राजस्व अधिकारी के पास जिला चिकित्सा बोर्ड द्वारा जारी प्रमाण पत्रों की वैधता का निर्णय करने का अधिकार क्षेत्र और चिकित्सा विशेषज्ञता नहीं है।
पढ़िए क्या है मामला?
महासमुंद जिले के सहायक शिक्षक लखन बिहारी पटेल को 2010 में विकलांग श्रेणी के तहत नियुक्त किया गया था। मेडिकल बोर्ड ने उन्हें 45.4% श्रवण बाधित प्रमाणित किया था। उनके भाई कैलाश चंद्र पटेल ने दिसंबर 2017 में पारिवारिक भूमि विवाद के बाद प्रमाण पत्र में हेराफेरी का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत के आधार पर कलेक्टर ने एसडीएम (राजस्व) को जांच करने का निर्देश दिया। एसडीएम ने 13 अगस्त 2020 को एक आदेश पारित किया, जिसमें याचिकाकर्ता द्वारा धोखाधड़ी से प्रमाण पत्र प्राप्त करने का दावा किया गया और आपराधिक कार्यवाही की सिफारिश की गई।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने एसडीएम के दृष्टिकोण में कई कानूनी खामियां पाईं। अदालत ने कहा कि राजस्व अधिकारी वैधानिक प्राधिकारी या चिकित्सा विशेषज्ञ नहीं हैं, जो विकलांगता का सत्यापन करने में सक्षम हों। साक्ष्य त्रुटिपूर्ण था।
एसडीएम ने 2010 के प्रमाण पत्र को अमान्य घोषित करने के लिए 2018 की ऑडियोमेट्रिक रिपोर्ट पर भरोसा किया। कोर्ट ने कहा, विकलांगता समय के साथ होने वाले बदलाव और स्थिति में सुधार अतीत में हुई जालसाजी का प्रमाण नहीं है।
इस जांच में विकलांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 52 के तहत प्रदान किए गए वैधानिक तंत्र को दरकिनार कर दिया गया।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, याचिकाकर्ता को आरोपों का खंडन करने या स्वतंत्र चिकित्सा साक्ष्य प्रस्तुत करने का उचित अवसर नहीं दिया गया। जस्टिस एके प्रसाद ने इस बात पर जोर दिया, यद्यपि न्यायालय निर्णय लेने की प्रक्रिया की निष्पक्षता की समीक्षा कर सकते हैं, लेकिन तकनीकी आकलन के लिए उन्हें विशेष चिकित्सा बोर्डों की राय पर ही निर्भर रहना चाहिए।
कोर्ट ने एसडीएम के आदेश और आपराधिक कार्रवाई की सिफारिश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने एसडीएम को याचिकाकर्ता का मूल प्रमाण पत्र तत्काल लौटाने का निर्देश दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, अधिकारियों को 2016 अधिनियम के तहत निर्धारित उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए सक्षम चिकित्सा बोर्ड के माध्यम से प्रमाण पत्र का सत्यापन करने की स्वतंत्रता बनी रहेगी।