राजस्व मामलों में हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: कहा- खरीदी से पहले जमीन के रिकॉर्ड की गहराई से जांच करना खरीदार की जिम्मेदारी..
Bilaspur High Court: राजस्व मामलों में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जमीन खरीदी-बिक्री और मालिकाना हक को लेकर दायर याचिका पर जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल के सिंगल बेंच ने कहा, खरीदी से पहले जमीन के रिकॉर्ड की गहराई से जांच करने की जिम्मेदारी खरीदार की होती है। इस तरह का प्रकरण अगर कोर्ट में लंबित है तो ऐसी स्थिति में खरीदार को सुनवाई का अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है।
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बिलासपुर। राजस्व मामलों में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जमीन खरीदी-बिक्री और मालिकाना हक को लेकर दायर याचिका पर जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल के सिंगल बेंच ने कहा, खरीदी से पहले जमीन के रिकॉर्ड की गहराई से जांच करने की जिम्मेदारी खरीदार की होती है। इस तरह का प्रकरण अगर कोर्ट में लंबित है तो ऐसी स्थिति में खरीदार को सुनवाई का अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है
सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा है, अदालत में अगर मामला पहले से लंबित है, तो ऐसे खरीददार को मामले में अलग से पक्षकार बनाने या नोटिस जारी कर सुनने की अनिवार्यता नहीं है, क्योंकि वह कानूनी रूप से अपने विक्रेता के अधिकारों का ही उत्तराधिकारी माना जाता है।
पढ़िए क्या है मामला
छत्तीसगढ़ रायपुर के ग्राम टेमरी स्थित तकरीबन 0.376 हेक्टेयर जमीन को दीप्ति अग्रवाल ने नवंबर 2025 में बहुरलाल साहू और यतिराम साहू से 1 करोड़ 20 लाख 28 हजार रुपए में खरीदी थी। इसी जमीन के मालिकाना हक को लेकर संजय कुमार नचरानी और साहू परिवार के बीच राजस्व न्यायालय में विवाद चल रहा था। संजय नचरानी का दावा है, उन्होंने यह जमीन 1997 में ही खरीद ली थी और उनका नाम रिकॉर्ड में दर्ज था, लेकिन तकनीकी गलती से पोर्टल पर पुराना नाम दिखने लगा। इस विवाद के दौरान दीप्ति अग्रवाल ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई और कहा, उनका पक्ष भी सुना जाए। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया, याचिकाकर्ता एक बोनाफाइड परचेजर यानी नेक नीयत खरीदार हैं। उनका कहना था कि राजस्व बोर्ड ने उन्हें बिना पक्षकार बनाए और बिना सुने ही आदेश जारी कर दिया, जिससे उनके कानूनी अधिकारों का हनन हुआ है।
जमीन का सौदा हुआ तब मामला कोट में विचाराधीन था
संजय नचरानी की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया, जब यह सौदा हुआ, तब मामला कोर्ट में विचाराधीन था। विक्रेता खुद सिविल कोर्ट में मालिकाना हक का केस लड़ रहे थे, ऐसी स्थिति में खरीदार को अलग से सुनने की आवश्यकता नहीं है। दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने याचिका खारिज करते हुए कहा, इतनी बड़ी राशि खर्च करने से पहले जमीन के रिकॉर्ड की गहराई से जांच करना खरीदार की जिम्मेदारी थी।
ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट का दिया हवाला
ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 55 के तहत खरीदार को संपत्ति के दोषों और चल रहे मुकदमों की जानकारी खुद लेनी होती है। खरीदार पूरी तरह से अपने विक्रेता के अधिकारों पर निर्भर होता है। यदि विक्रेता कोर्ट में केस हार जाता है, तो खरीदार का दावा भी कमजोर हो जाता है। मुकदमेबाजी के दौरान निजी सौदों के जरिए कोर्ट की शक्ति को कम नहीं किया जा सकता।