कर्मचारियों की खबर: आरोप पत्र और विभागीय जांच के बिना किसी कर्मचारी को नहीं कर सकते दंडित, हाई कोर्ट ने SP के आदेश को किया रद्द..
Bilaspur High Court: छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट का यह फैसला कर्मचारियों को राहत देने वाली है। एक याचिका की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा...

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बिलासपुर। 1 अप्रैल 2026| छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट का यह फैसला कर्मचारियों को राहत देने वाली है। एक याचिका की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा, आरोप पत्र और विभागीय जांच संस्थित किए बिना किसी कर्मचारी को दंड से दंडित नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने कोरबा एसपी द्वारा जारी एक इंक्रीमेंट रोकने की सजा को रद्द कर दिया है।
कोरबा निवासी केके पांडेय कार्यालय पुलिस अधीक्षक, कोरबा में निरीक्षक के पद पर पदस्थ थे। पदस्थापना के दौरान उन्हें पुलिस अधीक्षक, कोरबा नेआपराधिक मामले के समंस, वारंट तामीली में लापरवाही के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया था। जवाब से असंतुष्ट होकर पुलिस अधीक्षक कोरबा ने असंचयी प्रभाव से एक वेतनवृद्धि रोकने का आदेश जारी करते हुए दंडित किया।
एसपी के आदेश को चुनौती देते हुए इंस्पेक्टर पांडेय ने अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय एवं ऋषभदेव साहू के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका की सुनवाई जस्टिस पीपी साहू के सिंगल बेंच में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला दिया। लाल औधराज सिंह लाल रामप्रताप सिंह विरूद्ध मध्यप्रदेश शासन, ओके भारद्वाज विरूद्ध यूनियन ऑफ इण्डिया एवं अन्य के मामले में दिए गए फैसलों का हवाला दिया।
छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियमों का दिया हवाला
अधिवक्ता पांडेय ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के नियम 16 (1) एवं 16 (2) का हवाला देते हुए कहा है, इसमें राज्य सरकार का प्रावधान है, यदि किसी शासकीय अधिकारी/कर्मचारी के विरूद्ध किसी आरोप पर कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा जाता है और उक्त अधिकारी, कर्मचारी द्वारा अपने ऊपर लगे आरोपों से इंकार किया जाता है,इसके बाद भी अगर अनुशासनात्मक अधिकारी संबंधित कर्मचारी या अधिकारी को छोटी सजा से दंडित करने का आदेश जारी करते हैं तो उनको कारणों का उल्लेख करना होगा। साथ ही सजा देने से पहले विभागीय जांच संस्थित करना होगा।
हाई कोर्ट ने रद्द किया SP का आदेश
अधिवक्ता अभिषेक पांडेय ने कोर्ट को बताया, याचिकाकर्ता के मामले में एसपी कोरबा द्वारा बिना कोई आरोप पत्र जारी किये एवं बिना विभागीय जांच के "एक वेतनवृद्धि एक वर्ष के लिए असंचयी प्रभाव से रोके जाने के दंड से दंडित कर दिया है। याचिका की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने राज्य शासन के प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ एसपी द्वारा जारी वेतनवृद्धि रोकने के आदेश को रद्द कर दिया है।
