स्मार्ट सिटी की अंधेरी सड़कों पर दम तोड़ते मानवाधिकार, आखिर रोशनी पर किसका पहरा? क्या हादसों के बाद ही जागेगा प्रशासन?
लोकतंत्र में सड़क, बिजली और पानी को बुनियादी जरूरत माना गया है, लेकिन जब हम सुरक्षा के नजरिए से देखते हैं, तो सड़कों पर पर्याप्त रोशनी (Street Lights) सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि एक अनिवार्य मानवाधिकार (Fundamental Human Right) बन जाती है।
Chhattisgarh Street Light Issue : छत्तीसगढ़ में सिस्टम को लगा ग्रहण : स्मार्ट सिटी की अंधेरी सड़कों पर दम तोड़ते मानवाधिकार, आखिर रोशनी पर किसका पहरा? क्या हादसों के बाद ही जागेगा प्रशासन?
रायपुर : लोकतंत्र में सड़क, बिजली और पानी को बुनियादी जरूरत माना गया है, लेकिन जब हम सुरक्षा के नजरिए से देखते हैं, तो सड़कों पर पर्याप्त रोशनी (Street Lights) सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि एक अनिवार्य मानवाधिकार (Fundamental Human Right) बन जाती है। छत्तीसगढ़ के नगर निगम क्षेत्रों में शाम ढलते ही पसरने वाला अंधेरा अब केवल तकनीकी विफलता का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह सार्वजनिक सुरक्षा के प्रति प्रशासन की आपराधिक लापरवाही का प्रतीक बन चुका है।
1. जीवन का अधिकार और सुरक्षा की संवैधानिक गारंटी
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (Article 21) प्रत्येक नागरिक को गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि सुरक्षित आवागमन और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा प्रदान करना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है। छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों—रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग-भिलाई और अम्बिकापुर—में स्ट्रीट लाइटों का बंद होना इस संवैधानिक गारंटी का सीधा उल्लंघन है। जब सड़कों पर अंधेरा होता है, तो राज्य अनजाने में ही नागरिकों को दुर्घटनाओं और अपराधों की ओर धकेलता है।
2. डार्क स्पॉट्स और बढ़ता अपराध एक गंभीर खतरा
ह्यूमन राइट्स वॉच और कई वैश्विक सुरक्षा पैमानों के अनुसार, स्ट्रीट लाइटिंग और क्राइम रेट के बीच गहरा संबंध है। छत्तीसगढ़ के शहरी इलाकों में जहां स्ट्रीट लाइटें खराब हैं, वहां डार्क स्पॉट्स बन गए हैं। ये अंधेरे इलाके चैन स्नैचिंग, मोबाइल लूट और महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के लिए खाद-पानी का काम कर रहे हैं। रोशनी के अभाव में सीसीटीवी कैमरे भी केवल शो-पीस बनकर रह जाते हैं, जिससे अपराधियों की पहचान करना असंभव हो जाता है। यह स्थिति सीधे तौर पर नागरिकों के सुरक्षित परिवेश में रहने के अधिकार' का हनन है।
3. सड़क दुर्घटनाएं: सिस्टम की लापरवाही का शिकार होती जनता
छत्तीसगढ़ में सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े डरावने हैं। अंधेरी सड़कों पर आवारा मवेशियों का जमावड़ा और बिना लाइट वाले डिवाइडर साइलेंट किलर साबित हो रहे हैं। रात के समय Visibility कम होने के कारण होने वाले हादसों को अक्सर दुर्घटना कहकर फाइल बंद कर दी जाती है, जबकि हकीकत में ये प्रशासनिक विफलताओं के कारण हुई मौतें हैं। सड़क सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानकों (International Road Safety Standards) के अनुसार, समुचित प्रकाश व्यवस्था सड़क मृत्यु दर को 30% तक कम कर सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में मेंटेनेंस के नाम पर केवल खानापूर्ति हो रही है।
4. संवेदनशील वर्गों का सामाजिक बहिष्कार
अंधेरी सड़कें समाज के तीन सबसे संवेदनशील वर्गों—महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों—के लिए अघोषित कर्फ्यू की तरह हैं। शाम के बाद सड़कों पर रोशनी न होने के कारण बुजुर्ग टहलने से डरते हैं और महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं। मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से, यह उनके सार्वजनिक भागीदारी के अधिकार और सामाजिक स्वतंत्रता को सीमित करने जैसा है। स्मार्ट सिटी का सपना दिखाने वाले अधिकारी शायद यह भूल गए हैं कि स्मार्टनेस हाई-टेक गैजेट्स में नहीं, बल्कि सुरक्षित सड़कों में होती है।
5. आर्थिक शोषण: टैक्स पूरा, सुविधा अधूरी
छत्तीसगढ़ का आम नागरिक नगर निगमों को सफाई कर और प्रकाश कर (Lighting Tax) के रूप में मोटी रकम चुकाता है। इसके बावजूद, अंधेरे में डूबे वार्ड और मुख्य मार्ग यह सवाल उठाते हैं कि जनता के पैसे का सही इस्तेमाल कहां हो रहा है? नगर निगम और निजी ठेका कंपनियों के बीच भुगतान के विवादों की सजा जनता क्यों भुगते? यह नागरिकों के उपभोक्ता अधिकार और जवाबदेही के अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है।
रोशनी की मांग एक नैतिक लड़ाई
अब समय आ गया है कि छत्तीसगढ़ के नागरिक अपनी सड़कों पर रोशनी की मांग को केवल शिकायत नहीं, बल्कि मानवाधिकारों की मांग के रूप में उठाएं। प्रशासन को यह समझना होगा कि रोशनी सिर्फ अंधेरा दूर करने के लिए नहीं, बल्कि अपराध रोकने, जान बचाने और लोकतंत्र में नागरिकों का भरोसा कायम रखने के लिए जरूरी है।