बड़ी खबर: छत्तीसगढ़ के इन गांवों में पास्टर और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक, SC ने ग्राम सभा के फैसले को ठहराया सही, याचिका खारिज
Supreme Court: छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र में फैल रहे धर्मांतरण के जाल और पादरियों व धर्मांतरित हो चुके आदिवासियों के प्रवेश पर बस्तर के ग्रामीण अंचलों के गांव में रोक लगा दी गई है।
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दिल्ली 19 फरवरी 2026, छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल क्षेत्र में फैल रहे धर्मांतरण के जाल और पादरियों व धर्मांतरित हो चुके आदिवासियों के प्रवेश पर बस्तर के ग्रामीण अंचलों के गांव में रोक लगा दी गई है। ग्राम सभा की मीटिंग में फैसला लिया गया और गांव के बाहर इस तरह का बोर्ड लगा दिया गया है। ग्राम सभा का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम सभा के फैसले को सही ठहराते हुए दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी, जिसमें ग्राम सभा द्वारा गांव के प्रवेश द्वारों पर लगाए गए ऐसे होर्डिंग को सही ठहराया था, जिनमें ईसाई पादरियों और धर्मांतरण कर चुके आदिवासी ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद यह फैसला सुनाया है।
ग्राम सभा ने क्यों लिया ऐसा निर्णय?
ग्राम सभा ने यह कदम गांववासियों के जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन को रोकने के उद्देश्य से उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के फैसले के पैरा 34 का उल्लेख किया, जिसमें याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकारी (ग्राम सभा) के समक्ष उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी गई थी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हाई कोर्ट में याचिका सीमित मुद्दों पर दायर की गई थी, जबकि सुप्रीम कोर्ट में कई नए तथ्य और आयाम जोड़े गए हैं। इसलिए याचिकाकर्ता पुनः हाई कोर्ट का रुख कर सकता है।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने कहा कि हाई कोर्ट ने गांव में ईसाई पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक नहीं माना, जबकि मिशनरी गतिविधियों पर बिना पर्याप्त सामग्री के टिप्पणी की गई। सीनियर एडवोकेट ने कहा, देश में प्रार्थना सभाओं के दौरान पादरियों पर कथित हमलों से जुड़े मामले लंबित हैं, धर्मांतरित आदिवासियों की मृत्यु के बाद शव को गांव में दफनाने की अनुमति नहीं दी गई, कुछ मामलों में कब्र से शव निकालकर अन्य स्थान पर दफनाने की नौबत भी आई है।
सीनियर एडवोकेट ने दावा किया कि बीते 10 वर्षों में छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण से जुड़े मामलों में एक भी दोषसिद्धि नहीं हुई है। सीनियर एडवोकेट के तर्कों से असहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, आपको नियमों के तहत उचित प्राधिकारी के पास जाना चाहिए था। शपथपत्र, पेश किए गए दस्तावेज और साक्ष्यों के आधार पर मामले की जांच करते। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, पहले उपलब्ध वैधानिक उपायों का उपयोग किया जाना चाहिए और सीधे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने से पहले संबंधित प्राधिकरण से संपर्क करना आवश्यक है।