CG Pandum Cafe: उम्मीद की नई किरण का नाम है ’पंडुम कैफे’... ’पंडुम कैफे’ के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक बदलाव के नए अध्याय की शुरुआत
CG Pandum Cafe: पिछले दो सालों में बड़ी संख्या में नक्सली हथियार छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ चुके हैं। सरकारी योजनाओं और भरोसे के माहौल ने उन्हें आम जिंदगी अपनाने की नई दिशा दी है। इसी बदलते बस्तर की एक अनोखी तस्वीर जगदलपुर से सामने आई है, जहां पंडुम कैफे की शुरुआत की गई है
CG Pandum Cafe: छत्तीसगढ़ का बस्तर अब तेजी से बदल रहा है। कभी नक्सलियों की गोलियों और भय के माहौल के लिए बदनाम यह इलाका अब विकास की नई इबारत लिख रहा है। पिछले दो सालों में बड़ी संख्या में नक्सली हथियार छोड़कर मुख्यधारा से जुड़ चुके हैं। सरकारी योजनाओं और भरोसे के माहौल ने उन्हें आम जिंदगी अपनाने की नई दिशा दी है। इसी बदलते बस्तर की एक अनोखी तस्वीर जगदलपुर से सामने आई है, जहां पंडुम कैफे की शुरुआत की गई है। खास बात यह है कि इस कैफे को सरेंडर किए हुए नक्सली और नक्सल हिंसा से प्रभावित परिवार संयुक्त रूप से संचालित कर रहे है। ‘पंडुम’ गोंडी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ त्योहार या उत्सव होता है।
यह नाम कैफे की सकारात्मक भावना और नई शुरुआत का प्रतीक है। यह कैफे उन लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण है, जिन्होंने कभी हथियार उठाए थे, लेकिन अब समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर सम्मानजनक जीवन जीने की राह पकड़ ली है। पंडुम कैफे की टैगलाइन है जहां हर कप एक कहानी कहता है। यह उन युवा कर्मचारियों के जीवन परिवर्तन का प्रतीक है, जिन्होंने हिंसा की राह छोड़कर शांति और आत्मनिर्भरता को अपनाया है। एक पूर्व नक्सली कर्मचारी ने कहा, “पहले जीवन अंधकार में था। अब ऐसा लगता है जैसे नया जीवन मिला हो। हथियार छोड़कर मेहनत से कमाना गर्व की बात है।” यदि यह पहल सफल रहती है, तो इसे अन्य नक्सल प्रभावित जिलों में लागू किया जा सकता है। इससे युवाओं को रोजगार, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के नए अवसर मिलेंगे। बस्तर पंडुम को विशेष पहल के साथ शुरू किया गया है। यहां फिलहाल 12 नक्सल प्रभावित लोग काम कर रहे है। यह सभी पब्लिक के लिए ओपन है।
कर्मचारियों में पूर्व नक्सली और हिंसा पीड़ित
कैफे की खासियत यह है कि यहां कार्यरत कर्मचारी कभी नक्सली संगठन का हिस्सा रहे थे या फिर नक्सली हिंसा के शिकार रहे। दोनों वर्ग के लोगों का एक साथ काम करना बस्तर में सामाजिक मेल-मिलाप की दिशा में मजबूत कदम माना जा रहा है। प्रशासन और पुलिस ने इन युवाओं को आतिथ्य सेवा, कैफे प्रबंधन, भोजन सुरक्षा, ग्राहक व्यवहार और उद्यमिता से संबंधित प्रशिक्षण दिया है। यह अब पूरी तरह आधुनिक और व्यवस्थित रूप से संचालित हो रहा है।
कर्मचारियों में पूर्व नक्सली और हिंसा के पीड़ित शामिल
कैफे की खासियत यह है कि यहां कार्यरत कर्मचारी कभी नक्सली संगठन का हिस्सा रहे थे या फिर नक्सली हिंसा के शिकार रहे। दोनों वर्ग के लोगों का एक साथ काम करना बस्तर में सामाजिक मेल-मिलाप की दिशा में मजबूत कदम माना जा रहा है। प्रशासन और पुलिस ने इन युवाओं को आतिथ्य सेवा, कैफे प्रबंधन, भोजन सुरक्षा, ग्राहक व्यवहार और उद्यमिता से संबंधित प्रशिक्षण दिया है। यह अब पूरी तरह आधुनिक और व्यवस्थित रूप से संचालित हो रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने कहा कि पंडुम कैफ़े का शुभारंभ बस्तर क्षेत्र में नक्सलवाद के उन्मूलन की दिशा में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का एक प्रेरक प्रतीक है। उन्होंने कहा कि पंडुम कैफे आशा, प्रगति और शांति का उज्ज्वल प्रतीक है। कैफे में कार्यरत युवा, जो नक्सली हिंसा के पीड़ित तथा हिंसा का मार्ग छोड़ चुके सदस्य हैं, अब शांति के पथ पर अग्रसर हो चुके हैं। जिला प्रशासन और पुलिस के सहयोग से उन्हें आतिथ्य सेवाओं, कैफ़े प्रबंधन, ग्राहक सेवा, स्वच्छता मानकों, खाद्य सुरक्षा और उद्यमिता कौशल का गहन प्रशिक्षण प्रदान किया गया है।
कर्मचारियों से मिले सीएम विष्णु देव साय
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने जगदलपुर में ‘पंडुम कैफ़े’ का शुभारंभ करने के बाद ‘पंडुम कैफे’ में कार्यरत नारायणपुर की फगनी, सुकमा की पुष्पा ठाकुर, बीरेंद्र ठाकुर, बस्तर की आशमती और प्रेमिला बघेल के साथ सौहार्दपूर्ण बातचीत की। हिंसा का मार्ग छोड़कर शांति के पथ पर लौटे और कैफ़े में कार्यरत एक महिला ने इस अवसर पर भावुक होकर इस पुनर्वास पहल से हुए बदलाव की बात दोहराई। एक पूर्व माओवादी कैडर ने कहा कि,“हमने अपने अतीत में अंधेरा देखा था। आज हमें समाज की सेवा करने का यह अवसर मिला है, यह हमारे लिए एक नया जन्म है। बारूद की जगह कॉफी परोसना और अपनी मेहनत की कमाई से जीना, यह एहसास हमें शांति और सम्मान दे रहा है।
एक अन्य सहयोगी ने अपनी खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि,“पहले हम अपने परिवार को सम्मानजनक जीवन देने का सपना भी नहीं देख सकते थे। अब हम अपनी मेहनत से कमाए पैसों से घर के सदस्यों का भविष्य संवार सकते हैं। यह सब प्रशासन और इस कैफ़े की वजह से संभव हुआ है।” एक अन्य सदस्य ने समुदाय के सहयोग पर जोर देते हुए कहा कि,“हमें लगा था कि मुख्यधारा में लौटना आसान नहीं होगा, लेकिन पुलिस और जिला प्रशासन ने हमें प्रशिक्षण दिया और हमारा विश्वास जीता। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अब पीड़ितों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे हमें अपने अतीत के अपराधों को सुधारने और शांति स्थापित करने का अवसर मिला है।” उन्होंने यह भी बताया कि ‘पंडुम’ बस्तर की सांस्कृतिक जड़ों को दर्शाता है, और इसकी टैगलाइन “जहाँ हर कप एक कहानी कहता है” इस बात का प्रतीक है कि यहाँ परोसी गई कॉफी सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि साहस, संघर्ष पर विजय और एक नई शुरुआत की कहानी भी अपने साथ लेकर आती है।
बस्तर पंडुम 2026’ से सजेगा आदिवासी कला-संसार
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के दिशा निर्देश पर छत्तीसगढ़ के जनजातीय बहुल बस्तर संभाग की लोक-संस्कृति, परंपरा और विरासत को राष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए बस्तर पंडुम 2026 के आयोजन की तैयारियां शुरु कर दी गई है। छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग द्वारा वर्ष 2026 में “बस्तर पंडुम 2026” का आयोजन जनपद, जिला एवं संभाग स्तर पर प्रतियोगात्मक स्वरूप में किया जाएगा। यह आयोजन बस्तर अंचल की लोककला, शिल्प, नृत्य, गीत-संगीत, पारंपरिक व्यंजन, बोली-भाषा, वेश-भूषा, आभूषण, वाद्य यंत्र, नाट्य एवं जनजातीय जीवन-पद्धति के संरक्षण और संवर्धन का एक भव्य मंच बनेगा।
राज्य शासन ने बस्तर संभाग के सभी सात जिलों-बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर, कांकेर, कोण्डागांव एवं नारायणपुर-में इस उत्सव को व्यापक सहभागिता के साथ आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। इसके अंतर्गत बस्तर संभाग की 1885 ग्राम पंचायतों से जुड़े 32 जनपद मुख्यालयों में 12 विधाओं पर आधारित प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। ग्राम पंचायत स्तर से चयनित लोक कलाकारों और कला दलों को निःशुल्क ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से जनपद स्तरीय प्रतियोगिता में आमंत्रित किया जाएगा। पहले चरण में जनपद स्तरीय प्रतियोगिताएं 10 से 20 जनवरी 2026 के बीच आयोजित होंगी। प्रत्येक विधा से एक-एक विजेता दल का चयन किया जाएगा, जिन्हें 10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी। जनपद स्तर पर आयोजन के लिए प्रत्येक जनपद पंचायत को 5 लाख रुपये का बजट आबंटित किया गया है।
दूसरे चरण में जिला स्तरीय प्रतियोगिताएं 24 से 29 जनवरी 2026 तक आयोजित की जाएंगी। जिला स्तर पर प्रत्येक विधा के विजेता दल को 20 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। इसके लिए प्रत्येक जिले को 10 लाख रुपये की राशि उपलब्ध कराई गई है। अंतिम और सबसे भव्य चरण के रूप में संभाग स्तरीय प्रतियोगिता 2 से 6 फरवरी 2026 तक जगदलपुर, जिला बस्तर में आयोजित होगी। इसमें सातों जिलों से चयनित 84 विजेता दल भाग लेंगे। संभाग स्तर पर प्रथम पुरस्कार 50 हजार रुपये, द्वितीय पुरस्कार 30 हजार रुपये, तृतीय पुरस्कार 20 हजार रुपये तथा शेष 48 प्रतिभागी दलों को 10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि प्रदान की जाएगी।
इस महोत्सव की विशेषता यह होगी कि इसमें केवल वही कलाकार भाग ले सकेंगे, जो बस्तर संभाग के वास्तविक मूल निवासी हैं और जनजातीय लोक कला विधाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। साथ ही, गांवों और कस्बों में अपनी कला से पहचान बना चुके वरिष्ठ कलाकारों के साथ-साथ नवोदित कलाकारों को भी मंच प्रदान किया जाएगा।