Bilaspur Highcourt News: ना तो पीड़िता का बयान विश्वसनीय, ना मेडिकल रिपोर्ट में पुष्टि, 19 साल पुराने दुष्कर्म के मामले में आरोपी की सात साल की सजा रद्द
Bilaspur Highcourt News: दुष्कर्म के मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 7 साल की सजा के 19 साल पुराने मामले में हाईकोर्ट ने गवाहों में विरोधाभास, देरी से एफआईआर और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर सजा रद्द करते हुए आरोपी को संदेह के लाभ में बरी कर दिया है।
Bilaspur Highcourt News: बिलासपुर। 19 साल पुराने दुष्कर्म के मामले में पीड़िता के बयान की पुष्टि नहीं होने और मेडिकल रिपोर्ट में साक्ष्यों के समर्थन में नहीं होने के चलते हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने सत्र न्यायालय द्वारा दी गई 7 साल की सजा को पलटते हुए आरोपी की सजा रद्द कर दी है। पीड़िता ने बयान दिया था कि वह आरोपी को नहीं जानती जबकि आरोपी उसकी पड़ोस का ही रहने वाला था। जस्टिस रजनी दुबे की सिंगल बेंच ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए आरोपी को दोष मुक्त कर दिया है।
पूरा मामला बलरामपुर जिले से जुड़ा हुआ है। 26 फरवरी 2006 की शाम विवाहिता पीड़िता पानी लेकर शौच के लिए गन्ने की खेत गई थीं। यहां आरोपी ओंकार सिंह ने सूनेपन का फायदा उठा विवाहिता के साथ बलपूर्वक दुष्कर्म किया। पीड़िता ने घर लौट कर अपने सास और पति को जानकारी दी। जिसके बाद पति ने थाने ले जाकर घटना की रिपोर्ट दर्ज करवाई। पुलिस ने आरोपी ओंकार सिंह को गिरफ्तार कर विवेचना उपरांत न्यायालय में चालान पेश किया। विशेष सत्र न्यायाधीश एक्ट्रोसिटी अंबिकापुर ने वर्ष 2007 में आरोपी ओंकार सिंह को आईपीसी की धारा 376(1) के तहत दोष सिद्ध पाते हुए सात साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई थीं।
इन आधारों पर सजा रद्द
सजा के खिलाफ आरोपी ओंकार सिंह ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया की घटना की एफआईआर तीन दिन देरी से हुई है। देरी का कोई संतोषजनक कारण पीड़ित पक्ष ने नहीं बताया है। साथ ही पीड़िता की सास ने भी अपने बयान में स्वीकार किया था कि उसी के कहने पर उसकी बहू ने रिपोर्ट करके कराई है। पीड़िता ने अपने बयान में यह बताया था कि आरोपी को वह नहीं जानती और घटना से पहले उसे कभी नहीं देखा था। जबकि सास, पति और अन्य गवाहों ने स्वीकार किया था कि आरोपी उनका पड़ोसी था और उसका उनके घर भी आना–जाना था। मेडिकल जांच में भी पीड़िता के शरीर में किसी भी तरह की आंतरिक या बाहरी चोट नहीं पाई गई। डॉक्टर ने हालिया यौन संबंधों के बारे में कोई निश्चित राय नहीं दिए जाने की बात स्पष्ट की थी। अदालत ने माना कि गवाहों के बयान में गंभीर विरोधाभास है और अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।
कोर्ट का अहम अवलोकन
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि, केवल पीड़िता के बयान के आधार पर सजा तभी दी जा सकती है जब वह पूरी तरह विश्वसनीय और स्टर्लिंग क्वालिटी का हो। इस मामले में पीड़िता का बयान न तो सुसंगत था और न ही अन्य साक्ष्यों से पुष्ट रहा। हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।