Bilaspur High Court: मकान मालिक,किराएदार विवाद: हाई कोर्ट का आया महत्वपूर्ण फैसला

Bilaspur High Court: मकान मालिक किराएदार के बीच विवाद को लेकर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, डिप्टी कलेक्टर रैंक के अफसर को रेंट कंट्रोलर नियुक्ति करना कानूनी रूप से सही है। मकान मालिक के आवेदन पर सुनवाई के बाद रेंट्र कंट्राेलर ने किराएदार को मकान खाली करने का निर्देश दिया था।

Update: 2026-01-26 05:32 GMT

Bilaspur High Court:  बिलासपुर। मकान मालिक किराएदार के बीच विवाद को लेकर हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया है। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, डिप्टी कलेक्टर रैंक के अफसर को रेंट कंट्रोलर नियुक्ति करना कानूनी रूप से सही है। मकान मालिक के आवेदन पर सुनवाई के बाद रेंट्र कंट्राेलर ने किराएदार को मकान खाली करने का निर्देश दिया था।

रेंट कंट्रोल एक्ट के तहत रेंट कंट्रोलर की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है। मामले की सुनवाई जस्टिस रजनी दुबे व जस्टिस एके प्रसाद की डिवीजन बेंच में हुई। डिवीजन बेंच ने कहा, राज्य शासन द्वारा जारी अधिसूचना और जारी गाइड लाइन के अनुसार डिप्टी कलेक्टर रेंक के अफसर को रेंट कंट्रोलर की जिम्मेदारी सौंपना कानूनी रूप से सही है।

कान मालिक दिनकर राव सिल्लेदार और किराएदार दीपक कुमार बधोलिया के बीच विवाद के चलते मकान मालिक ने किराएदार को मकान खाली करने कहा। मकान खाली ना करने पर मकान मालिक ने किराएदार के खिलाफ रेंट कंट्रोलर के पास मुकदमा दायर किया था। मामले की सुनवाई के बाद रेंट कंट्रोलर ने मकान मालिक के पक्ष में फैसला सुनाते हुए किराएदार को मकान खाली करने का निर्देश दिया था। कंट्रोलर ने किराएदार काे परिसर खाली करने के साथ ही बकाया किराया और बिजली बिल भी जमा करने कहा था। रेंट कंट्रोलर के आदेश को चुनौती देते हुए किराएदार बधोलिया ने अपने अधिवक्ता के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में कहा, डिप्टी कलेक्टर ने यह आदेश दिया है, उनकी नियुक्ति छत्तीसगढ़ रेंट कंट्रोल एक्ट, 2011 की धारा 7 के तहत नहीं हुई थी।

सुनवाई के दौरान मकान मालिक के अधिवक्ता और राज्य सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे महाधिवक्ता कार्यालय के विधि अधिकारी ने डिवीजन बेंच को बताया, 11 दिसंबर 2013 को राज्य सरकार ने अधिसूचना जारी कर सभी जिलों के डिप्टी कलेक्टरों को रेंट कंट्रोलर नियुक्त किया था। यह आदेश किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि डिप्टी कलेक्टर पद के लिए था। विधि अधिकारी न नियमों व दिशा निर्देशों का हवाला देते हुए कहा,आदेश तब तक प्रभावी रहता है जब तक इसे बदला न जाए। कलेक्टर ने केवल कार्य विभाजन के जरिए प्रभार सौंपा था।

डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा, राज्य सरकार ने 2013 की अधिसूचना और 2015 के स्पष्टीकरण के जरिए डिप्टी कलेक्टर रैंक के अधिकारियों को रेंट कंट्रोलर नियुक्त करने का अधिकार दिया है। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने एकपक्षीय आदेश रद्द करवाने के लिए जरूरी छत्तीसगढ़ रेंट कंट्रोल एडाप्टेशन रूल्स, 2016 के नियमों का पालन नहीं किया और न ही कोर्ट में गैर हाजिर रहने का कोई ठोस कारण बताया।

ये है छत्तीसगढ़ रेंट कंट्रोल एक्ट

छत्तीसगढ़ रेंट कंट्रोल एक्ट, 2011 को मकान मालिक और किरायेदार के हितों के बीच संतुलन बनाने के लिए लागू किया गया है। इसके तहत हर जिले में रेंट कंट्रोलर की नियुक्ति की जाती है, इसके लिए कम से कम डिप्टी कलेक्टर रैंक का अधिकारी होना चाहिए। इस एक्ट का मुख्य उद्देश्य बेदखली और किराया भुगतान जैसे विवादों का निपटारा करना है। यदि कोई पक्ष रेंट कंट्रोलर के फैसले से संतुष्ट नहीं है, तो उसे रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल में अपील करने का अधिकार दिया गया है।

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