IPS Dharmendra Singh Chhavai: एसपी का विवादित पत्र 16 दिन बाद भी CM विष्णुदेव तक नहीं पहुंचा, सवाल...क्या सरकार को डिफेम करने SP से लिखवाया गया लेटर?

IPS Dharmendra Singh Chhavai: कवर्धा एसपी धमेंद्र छवई ने 27 जनवरी को प्रमोशन में भेदभाव का आरोप लगाते मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को पत्र लिखा था...वह 16 दिन बाद भी सीएम सचिवालय नहीं पहुंचा है। ऐसे में सवाल उठता है कि पत्र को आसमान खा गया, जमीन निगल गई? अगर पत्र मुख्यमंत्री को नहीं भेजा गया, तो फिर उसे लिखने के पीछे मंशा क्या थी? पत्र लीक कैसे और क्यों की गई? एसपी के पत्र और मीडिया को दिए गए बाइट के आधार पर पढ़िये इसका विश्लेषण...

Update: 2026-02-11 08:33 GMT

रायपुर 11 फरवरी 2026। गृह मंत्री विजय शर्मा के गृह जिले कवर्धा के पुलिस अधीक्षक धमेंद्र छवई ने प्रमोशन में भेदभाव का आरोप लगाते हुए 27 जनवरी को मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और डीजीपी को पत्र लिख न्याय का आग्रह किया था। चूकि सर्विस रुल के तहत अफसर सीधे मुख्यमंत्री को पत्र नहीं लिख सकते, लिहाजा एसपी का पत्र वायरल होते ही हड़कंप मच गया।

क्या लिखा था पत्र में?

कवर्धा के एसपी धमेंद्र छवई ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के प्रमोशन का हवाला देते हुए लिखा था कि जब उनके खिलाफ मामले होने के बाद भी उनका प्रमोशन हो सकता है तो मेरा क्यों नहीं? पत्र में लिखा है, मैं 2012 बैच का आईपीएस अफसर हूं। मेरे ही बैच के कई अधिकारियों को डीआईजी बना दिया गया है, लेकिन मुझे प्रमोशन नहीं मिला। इससे मुझे लगता है कि मेरे साथ भेदभाव किया जा रहा है। मेरे बारे में कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश में मेरे खिलाफ एक मामला है। उस मामले में पहले ही खात्मा हो चुका था, लेकिन कोर्ट से उसे मंजूरी नहीं मिली और जांच जारी बताई जा रही है।

किन अफसरों पर लगाया आरोप?

आईपीएस धमेंद्र छवई ने पत्र में एडीजी डॉ. आनंद छाबड़ा, आईजी प्रशांत अग्रवाल, डीआईजी रजनेश सिंह के बारे में लिखा कि उनके खिलाफ अपराध दर्ज होने के बाद भी उनका प्रमोशन नहीं रोका गया। उन्होंने डॉ0 आनंद छाबड़ और प्रशांत अग्रवाल के केस का जिक्र करते हुए महादेव सट्टा को भी अपने पत्र में कोट किया।

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किन नियमों का दिया हवाला?

कवर्धा एसपी धमेंद्र छवई ने लिखा कि भारत सरकार के प्रमोशन नियमों के अनुसार किसी अधिकारी का प्रमोशन तभी रोका जा सकता है, जब वह निलंबित हो। उसके खिलाफ विभागीय जांच चल रही हो या कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल हुआ हो। मैं इन तीनों ही स्थितियों में नहीं आता हूं। इसके बावजूद मेरे तीन प्रमोशन रोक दिए गए हैं। इसी वजह से मैंने यह पत्र लिखा है।

क्या एसपी सीधे सीएम को पत्र लिख सकते हैं?

सर्विस रुल के अनुसार ऑल इंडिया के अफसर क्या कोई भी सरकारी मुलाजिम सीधे मुख्यमंत्री को पत्र नहीं लिख सकता। अगर आईएएस है तो मुख्य सचिव को और आईपीएस है तो डीजीपी को लेटर लिखकर अपनी बात रख सकता है। वो लेटर फिर मुख्यमंत्री तक जाता है क्योंकि मुख्य सचिव और डीजीपी को ऑल इंडिया सर्विस के अफसरों के मामलों का निबटारा करने का अधिकार नहीं। हां, अफसर चाहें तो सीएम से मिलते समय मौखिक तौर पर आग्रह कर सकते हैं अगर उन्हें कोई दिक्कत है तो।

क्या ये घोर अनुशासनहीनता है?

कलेक्टर-एसपी कभी मुख्यमंत्री को पत्र नहीं लिखते क्योंकि, वे जिलों में मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर कार्य करते हैं। कलेक्टर-एसपी के साथ ये सहूलियत होती है कि जरूरत पड़ने पर जिले के किसी इश्यू के संबंध में सीधे मुख्यमंत्री से फोन पर बात कर सकते हैं। लिहाजा, कलेक्टर-एसपी को कभी सीएम को पत्र लिखने की जरूरत नहीं पड़ती। ऐसे में, अगर जिले का एसपी मुख्यमंत्री को प्रमोशन में भेदभाव का आरोप लगाते पत्र लिखने लगे तो यह घोर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आएगा।




 क्या आरोप सीधे मुख्यमंत्री पर?

आईएएस, आईपीएस जैसे ऑल इंडिया सर्विस के सारे मामले मुख्यमंत्री के अधीन आता है। इस सर्विस से जुड़े प्रमोशन से लेकर अवकाश तक की फाइलें मुख्यमंत्री के पास आती है। आईएएस, आईपीएस के प्रमोशन की डीपीसी की बैठक भी मुख्यमंत्री की सहमति के बाद ली जाती है। फिर डीपीसी के बाद फाइनल अनुमोदन में मुख्यमंत्री से लिया जाता है। उसके बाद ही प्रमोशन का आदेश जारी होता है। कवर्धा के पुलिस अधीक्षक धमेंद्र सिंह छवई ने अगर प्रमोशन में भेदभाव का आरोप लगाया है तो निश्चित तौर पर यह मुख्यमंत्री के खिलाफ ही आरोप हुआ।

पत्र क्यों नहीं पहुंचा सीएम सचिवालय?

कवर्धा एसपी धमेंद्र छवई ने 27 जनवरी को मुख्यमंत्री को पत्र लिखा था। आज 11 फरवरी है। यह पत्र आज तक मुख्यमंत्री सचिवालय नहीं पहुंचा है। सवाल उठता है, मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र 16 दिन से कहां घूम रहा है। जबकि, खुद एसपी ने मीडिया से बातचीत में पत्र की तस्दीक कर चुके हैं। उन्होंने बकायदा मीडिया को दिए गए बाइट में कहा था कि प्रमोशन में भेदभाव पर उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। फिर प्रश्न है पत्र सीएम सचिवालय पहुंचा क्यों नहीं? और मुख्यमंत्री कार्यालय तक नहीं पहुंचा तो वह बीच में लीक कैसे हो गया?

पत्र क्यों नहीं पहुंचा?

27 जनवरी का एसपी का लिखा पत्र 11 फरवरी तक मुख्यमंत्री कार्यालय नहीं पहुंचा तो फिर सवाल उठेगा ही ऐसा क्यों हुआ? जानकारों का मानना है कि पत्र अगर सीएम कार्यालय पहुंचने का मतलब होता, सरकार के पास कार्रवाई करने का ठोस आधार हो जाता। मामला अगर कोर्ट में जाता तो इसका कोई पुख्ता आधार नहीं होता। अगर पत्र नहीं है तो फिर सरकार कोर्ट में क्या पेश करती। ऐसे में, हो सकता है कि जानबूझकर पत्र को किसी ने लीक कर दिया मगर उसे सीएम तक भेजा नहीं।

तो मंशा क्या सरकार को डिफेम करना?

16 दिन बाद भी जब लेटर मुख्यमंत्री सचिवालय में नहीं पहुंचा तो हो सकता है, उसे भेजा नहीं गया होगा। तो फिर उसे लिखने की जरूरत क्या थी, इसके पीछे कोई छिपी मंशा थी? जानकारों का कहना है कि हो सकता है कवर्धा एसपी का किसी ने उपयोग कर लिया। सरकार को डिफेम करने पत्र लिखवा कर लीक कर दिया गया। क्योंकि, धमेंद्र सिंह छवई करीब ढाई दशक से राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी हैं। इससे पहले दो जिले के एसपी रह चुके हैं। उन्हें इतना तो भलीभांति पता होगा कि मुख्यमंत्री को सीधे पत्र नहीं लिखना चाहिए।

प्रमोशन में भेदभाव तो क्या रास्ता?

किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी को अगर प्रमोशन में लगता है कि भेदभाव किया जा रहा तो उचित माध्यम से उसके लिए लेटर लिखा जा सकता है। उचित माध्यम विभाग के हेड होते हैं। वैसे आमतौर पर अधिकारी कोर्ट की शरण लेते हैं। छत्तीसगढ़ में कई मामलों में कोर्ट ने स्टेट के अफसरों के पक्ष में फैसला भी दिया है।

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