Chhattisgarh Tarkash 2026: राजपरिवारों को झटका

Chhattisgarh Tarkash 2026: छत्तीसगढ़ की ब्यूरोक्रेसी और राजनीति पर केंद्रित पत्रकार संजय के. दीक्षित का पिछले 17 बरसों से निरंतर प्रकाशित लोकप्रिय साप्ताहिक स्तंभ तरकश

Update: 2026-03-08 00:00 GMT

तरकश, 8 मार्च 2026

संजय के. दीक्षित

राजपरिवारों को झटका

राज्यसभा में पहुंचने के लिए बीजेपी, कांग्रेस दोनों पार्टियों से जुड़े राजपरिवारों की प्रबल दावेदारी थी। बीजेपी से जशपुर राजपरिवार के रणविजय सिंह पहले राज्यसभा में रह चुके हैं। फिर भी उम्मीदें उन्हें कम नहीं थी। पिछले विधानसभा चुनाव में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रणविजय को कई रोड शो, रैलियों में अपने साथ घुमाया था। मगर सरकार बनने के बाद उन्हें कुछ मिला नहीं। लाल बत्ती की रेवड़ी अब बची नहीं, रही-सही राज्यसभा की आशा भी चली गई। उधर, जगदलपुर पैलेस के कोमल भंजदेव भी इस बार पूरा जोर लगा डाले थे। रमन सिंह के दौर में युवा आयोग के चेयरमैन रह चुके भंजदेव को राज्यसभा की दावेदारी इसलिए जोर पकड़ रही थी, क्योंकि बस्तर लाल आतंक से मुक्त हो रहा तो शायद पार्टी उनके नाम पर मुहर लगा दे। लेकिन, किस्मत से ज्यादा कुछ मिलता नहीं। बीजेपी ने लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा में भेजने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। उधर, कांग्रेस के सौम्य लीडर टीएस सिंहदेव को पार्टी ने वादे के विपरीत मुख्यमंत्री बनाया नहीं, विधानसभा चुनाव हारने से वे अभी किसी पद पर भी नहीं हैं। सो, आस उन्हें भी थी। कई मौकों पर टीएस ने बेबाकी से कहा भी था...पार्टी अगर चाहेगी तो राज्यसभा जरूर जाउंगा। मगर पार्टी ने फूलोदेवी नेताम को राज्यसभा में रिपीट कर दिया।

CM फेस और अलार्म

नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत और पूर्व उप मुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव जैसे दिग्गज नेताओं की दावेदारी को नजरअंदाज कर कांग्रेस पार्टी ने फूलोदेवी नेताम को राज्यसभा में भेजने का फैसला किया है, तो उसके अपने निहितार्थ हैं। दअरसल, फूलोदेवी पीसीसी की पसंद तो कतई नहीं थी। पीसीसी अध्यक्ष दीपक बैज खुद दावेदार थे। मगर फूलोदेवी के नाम को पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी से हरी झंडी मिल गई। उसके बाद कांग्रेस में किन्तु-परन्तु का कोई स्पेस नहीं बच जाता। जाहिर है, छत्तीसगढ़ से लगातार तीन बाहरी नेताओं को राज्यसभा में भेजने का खामियाजा भुगत चुकी कांग्रेस ने इस बार स्थानीय को प्राथमिकता दी। मगर ये भी सही है...फूलोदेवी के चयन ने सूबे के बड़े नेताओं का चैन उड़ा डाला है। दरअसल, फूलोदेवी की गांधी परिवार के इनर सर्किल में इंट्री हो गई है। फिर महिला और आदिवासी भी हैं। जाहिर है, 2028 के विधानसभा चुनाव में सीएम की रेस में फूलोदेवी मजबूत दावेदार होंगी। ऐसे में नेताओं की नींद उड़ेगी ही।

जातिगत समीकरण

लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा सदस्य बना बीजेपी ने जातिगत समीकरण साधने का प्रयास किया है। सरकार के रणनीतिकारों को भले ही लगता है कि कुर्मी समाज का वोट उनके प्रतिद्वंद्वी को ज्यादा मिला। मगर भविष्य को भी देखना जरूरी है। जाहिर तौर पर सरकार में कुर्मी समुदाय का प्रतिनिधित्व कम है। साहू समाज से अरुण साव डिप्टी सीएम हैं और तोखन साहू केंद्रीय राज्य मंत्री। मगर कुर्मी समाज से मंत्रिमंडल में सिर्फ टंकराम वर्मा। विभागों की हिस्सेदारी में भी उनका नंबर उपर से दसवां होगा। लक्ष्मी वर्मा को राज्यसभा में भेज बीजेपी ने नारी शक्ति को साधने के साथ ही जातिगत संतुलन बनाने का प्रयास किया है।

सबसे पावरफुल चेयरमैन!

यदि आपसे पूछा जाए कि छत्तीसगढ़ के निगम-मंडलों में सबसे जलवेदार चेयरमैन कौन होगा? तो मुंह बिचका जवाब मिलेगा, जलवा तो एमडी काटते हैं। चेयरमैन रबड़ स्टैम्प होते हैं। हां...माईनिंग, ब्रेवरेज जैसे कुछ चेयरमैन होते हैं, जिन्हें हिसाब-किताब के लिए कैलकुलेटर की जरूरत पड़ती है। बाकी तो गाड़ी, पेट्रोल और खर्चे का बिल पास कराने में ही उनका कार्यकाल निकल जाता है। मगर ऐसा नहीं है। एक चेयरमैन हैं, जिनका जलवा सबसे अधिक होगा। वो हैं नागरिक आपूर्ति निगम के चेयरमैन संजय श्रीवास्तव। दरअसल, किसी भी चेयरमैन के पास ट्रांसफर के अधिकार नहीं होते। मगर पिछली सरकार में नॉन के चेयरमैन रामगोपाल अग्रवाल की सरकार में तूती बोलती थी। उन्होंने सरकार से अधिकारियों, कर्मचारियों के तबादले का पावर चेयरमैन के नाम करवा लिया था। दिसंबर 2013 में सरकार बदली। इसके बाद संजय श्रीवास्तव नॉन के चेयरमैन बनें और ट्रांसफर का अधिकार उन्हें मिल गया। संजय पढ़े-लिखे नेता हैं, पर्सनाल्टी भी ऐसी कि नगर निगम में सभापति बने या फिर आरडीए का चेयरमैन, छोटे पदों पर भी उन्हें अपना सिक्का जमाने आता है। नॉन मे ंतो उन्हें ट्रांसफर का अधिकार मिल गया है, फिर समझ सकते हैं, उनका पावर कितना बढ़ गया होगा।

एक DGP, तीन चार्ज

राज्य सरकार ने अरुणदेव गौतम को डीजीपी बनाया मगर पुलिस प्रमुख बनने से पहले जो चार्ज थे, उससे उन्हें मुक्त नहीं किया गया। गौतम के पास अभी भी होमगार्ड, फायर और अभियोजन की जिम्मेदारी है। होमगार्ड और अभियोजन में पूर्व में कई डीजी लेवल के अफसर पोस्ट रह चुके हैं। इसलिए, उसे छोटा नहीं आंकना चाहिए। रही बात डीजीपी की, तो राज्य में चीफ सिकरेट्री के बाद दूसरे सबसे बड़े पद पर बैठे अफसर को अतिरिक्त दायित्व नहीं सौंपना चाहिए। ये तो ऐसा ही हुआ कि किसी आईएएस अधिकारी को चीफ सिकरेट्री बनाकर दो-एक विभाग की जिम्मेदारी दे दो। इससे पहले रमन सिंह की तीसरी पारी में एएन उपध्याय जब 29 साल की आईपीएस की सर्विस में डीजीपी बन गए थे, तब उनके पास प्रशासन का चार्ज था। मगर दसेक दिन के भीतर सरकार ने प्रशासन से उन्हें मुक्त कर दिया था। दरअसल, डीजीपी पद की अपनी गरिमा होती है। एकाध-महीना चलता है। प्रभारी डीजीपी बने, उन्हें 13 महीने हो गए मगर अभी भी तिहरा चार्ज से छुटकारा नहीं पा मिला।

DGP को बोनस

छत्तीसगढ़ बनने के 25 सालों में प्रभारी डीजीपी दो ही आईपीएस बने हैं। पहले अशोक जुनेजा और अब अरुणदेव गौतम। अशोक जुनेजा 11 महीने प्रभारी रहे मगर उसके बाद उनका पूर्णकालिक का आदेश आ गया था। नियमानुसार जिस दिन से मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर पूर्णकालिक डीजीपी बनाने का आदेश देता है, उस दिन से दो साल कार्यकाल मिलता है। जुनेजा को इसीलिए रिटायमेंट के बाद 11 महीने की सर्विस एक्स्ट्रा मिली। अरुण गौतम ने 13 महीने प्रभारी डीजीपी रहकर जुनेजा का रिकार्ड तोड़ दिया है। तुर्रा यह....गौतम घाटे में नहीं हैं, 13 महीने ये उनका बोनस है। जिस दिन वे पूर्णकालिक डीजीपी बनेंगे, उस दिन से उनका दो साल का मीटर घूमना शुरू होगा। मसलन, इस महीने मार्च में यदि वे पूर्णकालिक डीजीपी बन जाते हैं तो फिर वे अगले साल जुलाई 2027 में रिटायर नहीं होंगे। मार्च 2028 तक उनका कार्यकाल रहेगा। याने अरुणदेव नुकसान में नहीं हैं।

सत्र बाद बड़ी सर्जरी

विधानसभा के बजट सत्र के बाद कलेक्टरों की एक लिस्ट निकलेगी ही, एसपी लेवल पर बड़ी सर्जरी होगी। इसमें करीब आधे दर्जन से अधिक पुलिस अधीक्षकों का ट्रांसफर होगा। सात एसपी के डेढ़ से दो साल पूरे हो गए हैं। उन्हें इधर-से-उधर किया जाएगा। बलौदा बाजार की एसपी भावना गुप्ता प्रायवेट कारणों से लंबी छुट्टी पर जाने वाली है, वहां भी नया एसपी पोस्ट करना होगा। जिन पुलिस कप्तानों के ट्रांसफर की संभावनाएं हैं, उनमें रजनेश सिंह प्रशांत ठाकुर, शलभ सिनहा, सिद्धार्थ तिवारी, गौरव राय जैसे नाम हैं। सरकार को हालांकि, इस पर मशक्कत करनी होगी कि इन अधिकारियों को किस जिले में ट्रांसफर करें। इनमें कुछ नाम अच्छे हैं मगर उनकी सीनियरिटी के लायक जिला इस समय खाली नहीं है। सरकार को उसी में से कुछ गुंजाइश बनानी होगी।

डायरेक्ट IPS, कोपभवन

कप्तानी में कभी डायरेक्ट आईपीएस अधिकारियों का दबदबा रहता था। पिछली सरकार तक दुर्ग से लेकर रायपुर, बिलासपुर, जांजगीर, रायगढ़ तक डायरेक्ट आईपीएस कप्तान रहे। मगर अब सिचुएशन 360 डिग्री में घूम गया है। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, जांजगीर, रायगढ़, जशपुर जैसे बड़े जिलों में प्रमोटी आईपीएस एसपी हैं। यहां तक कि रायपुर पुलिस कमिश्नर की पोस्टिंग से उन्हें काफी उम्मीदें थी। लेकिन, वे हाथ मलते रह गए। इसके बाद असंतोष और गहरा गया है। आरआर याने डायरेक्ट आईपीएस अधिकारियों की इन दिनों बस एक ही गुहार...हमारी उपेक्षा हो रही। रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में चार डायरेक्ट वाले डीसीपी बने हैं, वे भी खुश नहीं। उन्हें लगता है सीएसपी हो गए हैं। जिलों में कप्तान का जो जलवा होता है, वो रायपुर पुलिस कमिश्नरेट में कहां मिलेगा? उपर में संजीव शुक्ला और अमित कांबले जैसे अफसर उपर बैठ गए हैं। फिर कमिश्नरेट वाली ठसन भी नहीं है। छत्तीसगढ़ पुलिस ऐसी डिरेल्ड हुई है कि पहले जैसी ठसन आ भी नहीं सकती। पुलिस में जान फूंकने वाला कोई क्रांतिकारी आईपीएस अवतार लेगा, उसके बाद ही पुलिस का पुराना वैभव लौट पाएगा...मगर वो भी तब जब छत्तीसगढ़ के पॉलिटिशियन चाहेंगे। बहरहाल, इन परिस्थितियों में हो सकता है कि खाली होने वाले दो-एक जिलों में इस बार डायरेक्ट आईपीएस अफसरों को मौका मिल जाए।

नासमझ अफसर!

शराब से 1200 करोड़ का टारगेट पूरा करने का ये मतलब नहीं की कुछ भी कर दें। होली में शराब दुकान खोलने का मामला लगभग ऐसा ही रहा। जनवरी तक 867 करोड़ का ही रेवेन्यू आया है। दो महीने में 1200 करोड़ पहुंचाना था, बल्कि इससे क्रॉस होता तब वाहवाही मिलती। लिहाजा, होली के दिन दुकान ओपन रखने का आदेश जारी कर दिया। नासमझी की ये चरम स्थिति थी...सालों की सर्विस के बाद अफसरों को ये समझ नहीं आया कि होली और शराब का क्या रिश्ता है। महाराष्ट्र और साउथ के राज्यों में होली नहीं मनती। इसलिए वहां शराब दुकानें खुली रहती हैं। छत्तीसगढ़ में शराब दुकान बंद होने के बाद पुलिस वालों को लॉ एंड आर्डर में पसीना निकल जाता है। हालांकि, भारी विरोध के बाद बैकफुट पर आते हुए अफसरों ने फैसला बदला। मगर दुकानें खुली रहती तो इस होली को खून-खराबे के नाम पर याद किया जाता। क्योंकि, दुकानें बंद होने और पुलिस की तगड़ी चौकसी के बाद रायपुर जिले में शराब के नशे में 4 हत्याएं हो गई। जाहिर है, अफसरों को सिर्फ टारगेट के पीछे नहीं भागना चाहिए। आदेश वापिस लेने से सिस्टम पर भी सवाल खड़े हुए, जो कि सिर्फ अफसरों की वजह से हुआ।

सफलता का क्रेडिट

बस्तर में लाल आतंक के खात्मे का 90 फीसदी क्रेडिट केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को जाता है। उन्होंने जो कहा, उसे करके दिखाया। मगर बचे 10 परसेंट क्रेडिट सूबे में किसे मिलना चाहिए, इस पर असमंजस की स्थिति है। सिस्टम में बैठे अफसर और पुलिस मुख्यालय का यह दायित्व है कि क्रेडिट किसे दिलाया जाए। इसके लिए अहम पदों पर बैठे सरकार के रणनीतिकारों को फ्रंट पर आकर खेलना होगा। सरकार के दो साल पूरे होने के बाद भी अफसर अगर डिफेंसिव रहेंगे तो फिर औरा कायम नहीं हो पाएगा।

गुस्से में CM, और पब्लिक!

मीडिया में खबर है...छत्तीसगढ़ में सड़कों की दुर्दशा पर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय पीडब्ल्यूडी के अफसरों पर बरस पड़े। अब बंद कमरे में क्या-क्या हुआ, इस बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं। मगर ये बात सही है कि सूबे की सड़कों की जर्जर स्थिति से पब्लिक भी खुश नहीं। भर्राशाही का आलम ये है कि सीएम के गृह जिलों की सड़कों पर पीडब्ल्यूडी का कोई ध्यान नहीं। मीटिंग में अफसरों की वर्किंग से सीएम काफी दुखी हुए। पीडब्ल्यूडी की मंथर गति के कई उदाहरण राजधानी रायपुर में भी है। कचना रेल ओवर ब्रिज का घिसट-घिसट कर चल रहे काम से दो लाख से ऊपर लोग तीन साल से त्रस्त हैं। मगर अफसरों की संवेदनशीलता हिलने-डुलने का नाम नहीं ले रही। सवाल उठता है बबूल के पौधे लगाने पर आम कैसे मिलेंगे। पिछली सरकार में जिस अफसर को लोगों का आक्रोश बढ़ने पर सस्पेंड किया गया, इस सरकार ने लाल जाजम बिछा न उसका स्वागत किया बल्कि विभाग का प्रमुख भी बना दिया। पता नहीं, उस अफसर में कौन सी वो खासियत कि पिछली सरकार के भी वे प्रिय रहे और अब इस सरकार के भी। जाहिर है, पिछली सरकार ने चुनाव से कुछ समय पहले दिखावे के लिए सस्पेंड किया था। कांग्रेस सरकार का काम न दिखने का एक बड़ा कारण सड़कों का खास्ता हाल भी रहा। लोगों ने सरकार को विदा कर दिया। बहरहाल, अगले चुनाव में सड़क और लॉ एंड आर्डर बड़ा मुद्दा बनने वाला है। लोगों ने बीजेपी को इसलिए वोट दिया कि इस सरकार में कम-से-कम सड़कों की दशा सुधर जाएगी। मगर आधा कार्यकाल खत्म होने वाला है, मुख्यमंत्री और पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर के जिले में आप जाएंगे तो माथा पकड़ लेंगे। ऐसे में, मुख्यमंत्री को भला गुस्सा क्यों नहीं आएगा। अब बात पब्लिक की...तो वह पांच साल में एक बार गुस्सा दिखाती है।

अंत में दो सवाल आपसे?

1. एक मिनिस्टर का नाम बताइये...बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पेनल में नाम आने के बाद उनका कांफिडेंस काफी बढ़ गया है?

2. लक्ष्मी वर्मा के राज्यसभा सदस्य बनने से राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा खुश होंगे दुखी?

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